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April 14, 2012

भारतीय सेना: गर्व और ग्लानि की कथा

[दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) में 14-04-2012 को प्रकाशित]

व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर चुके इन भ्रष्टाचारी समयों में भी एक पवित्र और ईमानदार संस्थान, या फिर उत्पीड़ित अस्मिताओं के निर्मम शोषण का उपकरण, लोक विमर्श में भारतीय सेना इन्ही दो रूपों में देखी जाती रही है. इन दोनों नजरियों के देश की सीमाओं से दूरी से लगभग समानुपाती अपने भू-राजनैतिक विभाजन भी हैं. लब्बोलुआब यह कि तुलनात्मक रूप से शांत उत्तर या दक्षिण भारत में सेना को जनता का पुरजोर समर्थन मिलता है जबकि राष्ट्रीयताओं के संघर्षों वाले काश्मीर, मणिपुर या नागालैंड जैसे इलाकों की बहुसंख्यक जनता भारतीय सेना को एक आक्रांता और उत्पीडक सेना के बतौर ही देखती है.

फिर भी, भारतीय सेना इस बात के लिए सम्मान की अधिकारी है कि उसने अपने सम्मान और विरोध के इस भू-राजनैतिक विभाजन पर साम्प्रदायिकता की काली छाया कभी नहीं पड़ने दी. इसीलिये, साम्प्रदायिकता के चरम उभार के दौरों में भी आप उत्तर प्रदेश से लेकर आन्ध्र तक तमाम अल्पसंख्यक समुदायों को राज्य-पुलिस/ अर्धसैनिक बल हटाने और सेना बुलाने की मांग करते हुए पायेंगे, तो मणिपुर के हिंदू आपको सेना हटाने की मांग करते हुए मिलेंगे. मूल चरित्र में हिंसक प्रतिगामी विभाजनों से भरे समाज में ऐसी छवि का निर्माण कर पाना आसान काम नहीं है, और सेना की इस बात के लिए सराहना होनी ही चाहिए कि अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि पर किसी भी हमले का उसने तीव्र प्रतिकार किया है फिर चाहे उसे कर्नल पुरोहित जैसे हिंदू-कट्टरपंथियों पर कठोरतम कार्यवाही ही क्यों न करनी पड़ी हो.


ऐसे ही अंतर्विरोध सेना के
नागरिक समाज से अंतर्संबंधों को भी पारिभाषित करते हैं. जमीनी सिपाहियों से लेकर उच्च आधिकारियों तक आप सैनिकों के अंदर ‘नागरिक जीवन’ में व्याप्त अवगुणों जैसे भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता, भाई-भतीजावाद आदि आदि से उपजा ‘सिविलियंस’ के लिए एक वितृष्णा का भाव देखेंगे. पर फिर आजादी के तुरंत बाद हुए जीप घोटाले, बोफोर्स, ताबूत घोटाले से लेकर हालिया टाट्रा ट्रक घोटाले, और इनकी अंतर्कथाओं में अदनान खशोगी जैसे सौदागरों से लेकर चंद्रास्वामी जैसे ‘संतों’ तक की उपस्थिति याद करें तो साफ़ हो जाता है कि सेना का भी एक हिस्सा भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हुआ है तमाम नैतिक दावों के बावजूद सेना के पास भी छिपाने के लिए बहुत कुछ है.

इसीलिये भारतीय सेना को बहुत सारे पुनर्विचारों की जरूरत है. ‘अशांत’ क्षेत्रों में अपने ही नागरिकों के मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपी सैनिकों को बचाने से लेकर भ्रष्टाचारियों पर कड़ी कार्यवाही करने तक सेना को बहुत कुछ साबित करना है. पर इन सबसे कहीं ऊपर, भारतीय सेना का गौरव अपने राष्ट्र-राज्य की लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अक्षुण्ण सम्मान में निहित है. पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से लेकर और तमाम असफल देशों की सेनाओं से ठीक उलट भारतीय सेना ने कभी भी नागरिक प्रशासन से टकराने की कोशिश नहीं की है. ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे कठिन क्षणों में भी धैर्य बनाए रखने से लेकर नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में हस्तक्षेप से इनकार तक में सेना ने सदैव अपनी गरिमा बढ़ाई है.

अफ़सोस, कि पहले जन्म-तिथि विवाद में वर्तमान सेनाध्यक्ष के अड़ियल रवैये और फिर सेना की लड़ाकू टुकड़ियों के बिना अनुमति युद्धाभ्यास ने इस गौरवशाली परंपरा को कड़ी चुनौती दी है. किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पदासीन सेनाध्यक्ष का नागरिक प्रशासन के खिलाफ न्यायालय जाना अपने आप में में एक गंभीर विचलन है. फिर अगर सेनाध्यक्ष के अनुसार इस विचलन के पीछे सेना के ही कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ हथियार-लाबी की संलिप्तता है तो सवाल बनाता है कि उनकी नाक के नीचे ऐसा संभव कैसे हुआ? आखिर को हथियार लाबी और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मिलीभगत किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरे की घंटी है. 


इस खतरे में अगर हम बिना अनुमति युद्धाभ्यास को भी शामिल कर लें तो खतरा और बड़ा हो जाता है. बेशक, सबसे नकारात्मक नजरिये में भी इस अभ्यास में सरकार को लज्जित करने से ज्यादा का कोई इरादा नजर नहीं आता, और तख्तापलट के कयास कोरी बकवास से ज्यादा कुछ नहीं साबित होते हैं. पर फिर उस दौर में जब सेनाध्यक्ष स्वयं मानते हों कि उन्हें रिश्वत देने की सीधी कोशिश पर भी वह कोई कार्यवाही नहीं कर सके थे, कोई नहीं कह सकता कि सरकार को लज्जित करने के ऐसे प्रयास कब तख्तापलट की कोशिशों में बदल जाएँ. आज बात इसलिए संभल गयी है कि सेनाध्यक्ष की कुर्सी पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जिसकी व्यक्तिगत ईमानदारी और राष्ट्र के साथ साथ लोकतंत्र में निष्ठा सवालों के दायरे के परे है, पर क्या इस आधार पर हम कल के लिए आश्वस्त हो सकते हैं?

शायद यही समय है कि हम सेना और नागरिक प्रशासन के अंतर्संबंधों को मजबूत करने के साथ साथ सेना के भीतर मौजूद लोकतंत्र विरोधी तत्वों और हथियार लाबी को ध्वस्त करने की दिशा में कड़े कदम उठायें वरना कल खतरा सर पर आ जाएगा. साथ ही अब सेना को भी यह सोचना होगा कि क्या इस तरह के तत्वों की उत्पत्ति सीमावर्ती क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को छिपाने और दोषी सैनिकों को बचाने की कोशिशों से तो नहीं जुड़ी है? आखिरकार, अगर आप अपने ही राष्ट्र के नागरिकों पर जुल्म कर बच सकते हैं तो फिर आप उसके भी आगे बढ़ने की कोशिश क्यों नहीं करेंगे? क़ानून क़ानून होते हैं और आप अगर उन्हें उत्तर-पूर्व में तोड़ सकते हैं तो फिर वे उत्तर प्रदेश में भी सुरक्षित नहीं हैं. शायद यही अवसर है कि सेना अपने सिपाहियों से लेकर उच्चाधिकारियों तक का लोकतंत्र, मानवाधिकार और क़ानून के शासन आदि विषयों पर संवेदीकरण करे. इससे न केवल भारतीय सेना की आक्रांता छवि टूटेगी बल्कि उसका सम्मान भी बढ़ेगा.

3 comments :

  1. जानकारी पूर्ण और विश्लेष्णात्मक आलेख है. बधाई .

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  2. सुन्दर लेख, अच्छा विमर्श. प्रकाशन हेतु भी बधाई. लेखक ने सही कहा है सेना ने हर परिस्थिति में सर्व-धर्म-समभाव का अपना चरित्र कायम रखा है, यह उसकी एक बड़ी उपलब्धि भी है. लेकिन यह कहते हुए कर्नल पुरोहित का उदाहरण कुछ जमा नहीं. किसी एक व्यक्ति पर कोई कारवाई कभी हमारी इतनी महान सेना की चर्चा लायक उपलब्धि नहीं हो सकता. इसके उलट हम ये कह कर शायद विषय को जस्टिफाय कर सकते हैं कि खच्चर कमिटी द्वारा सेना में भी धर्म आधारित गिनती को सेना ने दो टुक ठुकराते हुए कहा था कि हमारे यहाँ बस एक ही धर्म के लोग हैं और वह है भारत धर्म. ये उदाहरण ज्यादे मुफीद होता और लेखक को पूर्वाग्रह दोष से भी बचा कर रखता. खैर...अच्छा लेख..बढ़िया विश्लेषण.

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