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March 22, 2012

जातीय भेदभाव नस्लवाद ही है!


[दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण में 31-03-2012 को प्रकाशित.]
[दैनिक छत्तीसगढ़ में 24/03/2012 को प्रकाशित]
[रविवार में जातीय भेदभाव भी तो नस्लवाद है शीर्षक से प्रकाशित]

जातिवादी भेदभाव के खिलाफ संघर्ष में अभी हाल में मिली एक महत्वपूर्ण विजय में ब्रिटेन जातीय पूर्वाग्रहों को नस्ली भेदभाव का हिस्सा मानने वाला पहला देश बन गया है. ब्रिटेन की संसद के उपरी सदन हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स द्वारा सरकार को जाति को नस्ल के एक पहलू के रूप में स्वीकार करने की अनुमति देने वाले समानता विधेयक को मार्च 2010 में ही पारित कर देने के बाद इस विधेयक के कानून बनने में अब सिर्फ एक सीढ़ी बची है कि यह संसद के निचले सदन हॉउस ऑफ़ कॉमंस द्वारा पारित कर दिया जाय.

भारत सरकार और ब्रिटेन में बसे दक्षिणपंथी हिन्दू समूहों द्वारा इंग्लैण्ड सरकार को इस बिल को कानून ना बनाने के लिए डाले गए दबाव की रोशनी में विभेदकारी जातीय सरंचना के खिलाफ दलित समूहों द्वारा नागरिक समाज संगठनों के साथ लगातार लड़कर हासिल की गयी यह विजय बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए भी क्योंकि यह विजय संयुक्त राष्ट्र संघ के नस्ली, नस्लीय भेदभाव, के खिलाफ डरबन सम्मलेन, जहाँ दलित समूहों और अंतर्राष्ट्रीय समतावादी समूहों के गौरवशाली संघर्ष के बावजूद भारत सरकार जातिगत भेदभाव को एजेंडे से बाहर रखने में सफल रही थी, के ठीक एक दशक बाद मिली है.


तब जाति को भारत का 'आतंरिक मामला' बताते हुए भारत सरकार ने जोर दिया था कि वह इस कुरीति को समाप्त करने के लिए सभी संभव प्रयास कर रही है. यह और बात है कि जाति को अपना 'आतंरिक मसला' बताते हुए भारत सरकार नस्लभेद के खिलाफ महान संघर्ष की अपनी खुद की गौरवमयी परम्परा को ना सिर्फ भूल रही थी वरन उसका अपमान भी कर रही थी.

वैसे भी अगर जाति भारत का आंतरिक मसला है तो नस्लीय रंगभेद दक्षिण अफ्रीका की उस दौर की श्वेत सरकार का आंतरिक मुद्दा क्यों नहीं था? नस्लभेद के खिलाफ वैश्विक जनमत तैयार कर दक्षिण अफ्रीका की सरकार को अलग-थलग करने में केन्द्रीय भूमिका निभाने वाली तत्कालीन भारत सरकार क्या एक संप्रभु देश के आतंरिक मसलों में हस्तक्षेप करने का अपराध कर रही थी? 2001 में इस तर्क का जवाब देने में असफल रही भारतीय सरकार ने जातिगत भेदभाव का अस्तित्व स्वीकार करते हुए भी जाति मुद्दे को अंतर-नस्लीय और अंतर्सांस्कृतिक बताते हुए खारिज करने की कोशिश की थी.

जाति के सवाल को सम्मलेन के एजेंडे से बाहर रखने की सरकारी जिद का बचाव करते हुए तत्कालीन महान्यायवादी सोली सोराबजी ने एक हास्यास्पद तर्क भी गढ़ा था कि इसके पीछे भारत की कुल जमा मंशा यह है कि सम्मलेन मुख्य मुद्दे नस्लवाद से भटक ना जाये. भारत में जातिगत भेदभाव की मौजूदगी स्वीकारते हुए भी उन्होंने जाति और नस्ल के पूरी तरह से अलग होने पर जोर दिया.

सवाल जाति और नस्ल के पूरी तरह से अलग होने का नहीं है. आखिरकार दुनिया में सामाजिक श्रेणीबद्ध विभेदन की कोई भी दो संरचनाएं पूरी तरह से समान नहीं हो सकती हैं. इन सरंचनाओं के पैदा होने से लेकर समाज में स्थापित होने तक की प्रक्रिया में उस समाज विशेष में मौजूद राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक कारक अपनी भूमिका निभाते हुए ख़ास किस्म की शक्ती विभाजन वाली संरचनाएं पैदा करते हैं. इसीलिये, अलग अलग समाजों में पैदा हुई संरचनाएं अपनी आंतरिक बुनावट में एक दूसरे से बिलकुल अलग हो सकती हैं. मगर मसला यहाँ इनके बीच अंतरों का नहीं वरन सामाजिक श्रेणीबद्धता को पैदा करने और बनाये रखने में उनकी सफलता का है.

इस सन्दर्भ में अपने ही समुदाय के ताकतवर सदस्यों द्वारा अन्यों को अमानवीय स्थितियों में रखने वाली जाति-व्यवस्था निस्संदेह सामजिक श्रेणीबद्धता की सफलतम और निर्ममतम संरचनाओं में से एक है. शोषित और वंचित तबकों को मानवीय गरिमा से वंचित कर जानवरों की तरह केवल श्रम के संसाधनों में तब्दील कर देने वाली ऐसी किसी व्यवस्था का अस्तित्व दुनिया में शायद ही कहीं और हो.

जाति को नस्लीय भेदभाव के अन्दर वर्गीकृत ना करने के समर्थन में भारत सरकार का दूसरा तर्क है कि संरक्षणात्मक कानूनों एवं सकारात्मक भेदभावपूर्ण नीतियों द्वारा जातिप्रथा के उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर रही है. सरकारी आंकड़ों की रोशनी में ही देखें तो यह तर्क भरभरा के ढह जाता है.

उदाहरण के लिए, गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले नेशनल क्राइम रिकोर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक बीते साल से 2 प्रतिशत की वृद्धि के साथ अनुसूचित जातियों के खिलाफ हुए अपराधों की कुल संख्या 33615 तक पंहुच गयी है. यह आंकड़े सत्य से कितने कम हैं, यह जानने के लिए इसमें यह भी जोड़ लें कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) क़ानून के प्रावधान सामान्य घटनाओं को तो छोड़ें ही खैरलांजी जैसी लोमहर्षक घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधियों पर भी लागू नहीं किये जाते.

भारतीय सरकार का तीसरा तर्क, जिसका समर्थन कुछ महत्पूर्ण समाजशास्त्री भी करते हैं, वह यह है कि क्योंकि नस्ल भारतीय संदर्भों में एक अर्थपूर्ण जैविक श्रेणी नहीं है और भारत में समुदायों का नस्लीय आधार पर प्रोफाइल बनाने की तमाम कोशिशें नाकामयाब साबित हुई हैं, इसीलिये जाति नस्ल का एक एक पहलू नहीं हो सकती.

यह तर्क दावा करता है कि अगर जाति की उत्पत्ति मूलवंश की अवधारणा में है भी तो आज के सन्दर्भों में यह नस्ल से पूरी तरह से अलग हो चुकी है. पर असली मुद्दा यह है कि अगर दलितों के खिलाफ होने वाला भेदभाव अंतरनस्लीय भी हो तो भी इसके परिणाम नस्लवाद की तुलना में दलितों के लिए कम बर्बर नहीं होते. उससे भी ज्यादा बुनियादी स्तर पर, 'वैज्ञानिक' प्रमाण की अनुपस्थिति से नस्ल की अनुपस्थिति तो साबित हो सकती है पर 'नस्लवाद की नहीं.

नस्लवाद अपने मूल में एक विचारधारात्मक सरंचना है जो जन्म, मूलवंश या उत्पत्ति के आधार पर कुछ लोगों का अन्यों की तुलना में उच्च होने और उन्ही आधारों पर 'अन्यों' के नीचा होने का दावा करने से बनती है. भारत में नस्ल के वैज्ञानिक आधार के प्रमाण हों या ना हों, श्रेणीगत विभाजन पर आधारित भेदभाव की इस संरचना के लगातार मजबूत होने के प्रमाण रोज सुबह के अखबारों में भरे मिलते हैं. ऊपर से, इस 'कुरीति' को ख़त्म करने की पुरजोर कोशिशों के दावे के बावजूद जमीनी स्तर पर इस मुद्दे पर सरकारी अकर्मण्यता इसके अगंभीर रवैये का ही सबूत देती है.

जातिगत भेदभाव को नस्लवाद के एक पहलू के रूप में स्वीकार किये जाने के प्रति भारत सरकार का जबरदस्त विरोध किसी लापरवाही या जमीनी सच्चाइयों को ना समझ पाने की असफलता से नहीं उपजता. इसके ठीक उलट, यह सरकार और अभिजनों की मानसिकता और मानस का ही सबूत है. इस मुद्दे पर सरकारी नजरिया उसी पूर्व आधुनिक, बर्बर और प्रतिगामी जातिसंरचना से निकलता है जो तमाम लोकतान्त्रिक छद्म के भीतर मौजूद सत्ता को नियंत्रित करती है.

संतोषजनक बात सिर्फ यह है कि, इस छलावे को ज़िंदा रखने की तमाम कोशिशों के बावजूद न्यायपालिका सहित सरकारी तंत्र के सभी अवययों की गतिविधियों से यह मुखौटा जब-तब सरक जाता है. मध्यवर्ग के हितों की सबसे बड़ी रक्षक के रूप में उभरी न्यायपालिका को त्रुटिहीन मानने वाले शायद ही इस बात पर विश्वास करें पर न्यायपालिका के निर्णयों पर एक सरसरी निगाह भी इसके अभिजात्यवर्गीय चरित्र और मानसिकता दोनों को उजागर कर देती हैं.

बात चाहे मथुरा बलात्कार मामले (तुकाराम विरुद्ध महाराष्ट्र सरकार, एआईआर 1979 सुप्रीम कोर्ट 185) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये मिसोजायनिस्ट यानी स्त्री द्वेषी) और जातिवादी पूर्वाग्रहपूर्ण फैसला की हो, जहाँ उसने बॉम्बे उच्च न्यायालय का दो पुलिसकर्मियों को मथुरा नाम की नाबालिग के बलात्कार का दोषी ठहराते हुए सजा देने का फैसला यह तर्क देकर उलट दिया था कि पीडिता 'एक अनपढ़ और अनाथ आदिवासी लड़की' है और इसी कारण चरित्रहीन होगी. या फिर खैरलांजी मामले में महाराष्ट्र उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए हालिया फैसले का जहाँ दलित उत्पीड़न की धाराएँ लगाने से इनकार करते हुए सामूहिक हत्या और बलात्कार के उस मामले को बदले के इरादे से किया गया अपराध बताने तक की, न्यायपालिका का मूल चरित्र बार-बार उजागर होता रहा है.

कुछ मामलों में तो न्यायपालिका ने सारी सीमायें पार करते हुए जातिगत उत्पीड़न के दोषियों के मददगार की जगह खुद को ही खड़ा कर दिया है. उदाहरण के लिए भंवरी देवी बलात्कार मामले में न्यायाधीश का अभियुक्तों को रिहा करने के लिए यह तर्क देना कि चूँकि हिन्दू धर्मग्रन्थ उच्चजातीय लोगों को एक 'नीची जाति' की महिला को छूने का अधिकार नहीं देते, अभियुक्त पीड़िता का बलात्कार कर ही नहीं सकते थे, इस परम्परा का शायद गलीजतम उदाहरण होगा. साफ है कि जातिप्रथा के उन्मूलन के सवाल पर पर सरकारी तंत्र की अकर्मण्यता का निदान न्यायपालिका की सक्रियता में भी नहीं है. बावजूद इस तथ्य के कि इस मुद्दे पर संवैधानिक समझदारी बिलकुल साफ है.

वस्तुतः नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन 1969 ने पहले ही अपनी सामान्य सिफारिश संख्या 29 के तहत 'मूलवंश' शब्द के अर्थ को विस्तृत करते हुए उसमे 'जाति के आधार पर भेदभाव' को जोड़ दिया गया था. 170 अन्य देशों के साथ उस कन्वेंशन की हस्ताक्षरी होने की वजह से यह मूलवंश का यह अर्थ भारत सरकार पर भी लागू होता है. इसीलिये, पहले तो जाति के सवाल को 'वैज्ञानिक' और 'सांस्कृतिक' पहलुओं में बाँटना और फिर वैज्ञानिक पहलू पर जोर देकर जाति को नस्ल से अलग साबित करने का प्रयास ना केवल गलत है वरन भारतीय संविधान की अगर शब्द नहीं तो कम से कम आत्मा के उल्लंघन का कपटपूर्ण प्रयास भी है.

बात साफ़ है कि नस्ल के शुद्ध जीववैज्ञानिक (और ब्राह्मणवादी सन्दर्भों) में ना भी सही तो तो कम से कम नस्लवाद के सन्दर्भ में जाति नस्लीय भेदभाव का एक पहलू तो है ही. और भारत के करीब 20 करोड़ नागरिकों का जीवन नस्ल और जाति के अंतर्विरोधों पर बौद्धिक विमर्श का नहीं, वरन सरकार द्वारा जातीय अत्याचार के सभी रूपों पर निर्णायक हमले पर निर्भर करता है. इसीलिये जाति को अपना आतंरिक मुद्दा बताना भारत राज्य के धर्मनिरपेक्षता दावे के नकार के साथ-साथ हिन्दू धर्म से सम्बंधित किसी भी चीज को आंतरिक कहने और मानने के हास्यास्पद दावे जैसा है. या भारत सरकार अब सचमुच ही धर्मनिरपेक्षता से ऊब कर हिन्दू राष्ट्र बनाने के संघी रास्ते पर निकल पड़ी है?

यही कारण है कि हम सब को ब्रिटेन में जाति के महाराक्षस के खिलाफ हासिल की गयी इस जीत के साथ खड़ा होकर, भारत सरकार द्वारा इसके 'आतंरिक मुद्दे' में दखल ना देने के नाम पर ब्रिटेन पर इस कानून के खिलाफ बनाये जा रहे दबाव के खिलाफ लड़ना चाहिए. वैसे भी, जाति आधारित अत्याचार जाने कब से भारत राज्य भौगोलिक सीमाओं से बाहर निकल चुके हैं. ब्रिटेन और कनाडा से लगातार आ रही सम्मान हत्यायों को एक बार अनदेखा भी कर दें तो हाल में ही ऑस्ट्रिया के विएना में एक रविदासी (दलित) सिखगुरु की हत्या भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर जातिवाद के अस्तित्व पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती.

भारत सरकार को समझना चाहिए कि कोई भी सभ्य समाज और सरकार जाति के नाम पर किये जा रहे अपहरणों, जबरन विवाहों,गैरकानूनी कैदों और हत्याओं पर निकम्मी बैठ नहीं सकती. यह भारत सरकार है, जो जाति के महाराक्षस को मारना तो दूर उसे नियंत्रित करने तक में नाकाम साबित हुई है. इसे एक आजाद और संप्रभु देश ब्रिटेन से उसके नागरिकों के अधिकारों और जीवन के प्रति अवहेलना और उपेक्षा की मांग करने का कोई हक नहीं है. वैसे भी, ब्रिटेन अपने नागरिकों को प्रभावित करने वाले एक मुद्दे पर क़ानून बना रहा है और 'धर्मनिरपेक्ष' भारत 'गणराज्य' को एक संप्रभु राज्य के 'आन्तरिक' मुद्दे में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है.

यही जोतिबा, बाबासाहेब, और भगत सिंह के जातिविहीन भारत के सपने में हमारा योगदान भी होगा और उनकी स्मृति को हमारी श्रद्धांजलि भी.

2 comments :

  1. सही दिशा में लिखा गया लेख. वास्तव में जाति आज भी एक सच्चाई है और शायद आगे भी रहने वाली है. फिलहाल तो ज़रूरत शायद केवल इस बात की है कि जाति को अब कम से कम जाती दुश्मनी का सबब न बनने दिया जाया. बाकी जो भी परिवर्तन होने हैं उसके लिए हमें पीढियां खर्च करने को तैयार होना चाहिए. एक झटके में आ गया या लायी गयी क्रांति तो हमेशा 'एनीमिया' ही पैदा करता है. क्यूंकि रगों में जिस लहू को बहना चाहिए वो तब सड़कों पर बहने लगता है...अच्छा लेख.

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  2. thank you for this news and special thanks for the way you served it.sharing on my wall:)

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