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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

January 19, 2012

नारा-ए-तकबीर हर हर महादेव

आप चाहें तो इस शीर्षक को ठीक उसी खिलंदड़ई वाले अंदाज में ले ही सकते हैं जिसमे मैंने इसे सुना था. नीलगिरी ढाबे, यानी कि जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी के पेरियार, कावेरी (दोनों ‘पुरुष”) और गोदावरी (महिला) छात्रावासों के मध्य स्थित ढाबे, की उस जगह पर जो शाम ढलने के साथ मार्क्स के लिए कम और शैव और शाक्त परम्पराओं के तमाम व्यसनों में से एक ‘गांजे’ के लिए जाना जाता है. यह और बात कि यह बात शाम ढलने के बाद की नहीं बल्कि अलसुबह(सिर्फ जेनयू के लिए माने दोपहर के 12 बजे के बाद) की है. हुआ यूँ था कि दशकों (माने उम्र के तीन में से दो दशक) बाद एक लंबा वक्त अपने गाँव में बिता कर, मैं फिर से दिल्ली वापस आया था और इरादतन कम आदतन ज्यादा जेनयू में नमूदार हो गया था.

अब दोपहर के 12 बजे का वक्त भी चूंकि जेनयू के लिए अलसुबह होता है जब गंगा ढाबा पूरी तरह से सो रहा होता है और केसी (उर्फ कमल काम्प्लेक्स: पूरा नाम तुम्हे याद हो के न याद हो) चौधरी साहब की चाय, पूड़ियों और आमलेट के साथ अलसाई आँखों के साथ आपको उलाहने भरी नजर से देखता है कि मियाँ थोड़ा आराम (और देर) से नहीं आ सकते थे? तो और करते भी क्या वाले अंदाज में मैं नीलगिरी ढाबे की तरफ बढ़ निकला था और वहाँ (अल्लाह करम करे) वाले अंदाज में सरफराज़ अलीग उर्फ पंडित उर्फ जाने क्या क्या से टकरा गया.

अब यह सरफराज़ मियाँ भी जरा दिलचस्प आदमी हैं. जेनयू, यानी कि उस जगह जहाँ ब्राह्मणवादी/सामंती संस्कृति का जिक्र भी ‘पाप’ जैसा होता है , साहब मुझे देख लेते हैं हैं तो दौड़ा के पाँव छूते हैं, वह भी इस तर्क के साथ की आप बड़े भाई हैं तो मेरा हक़ बनता है और आप रोकने की कोशिश करें तो मैं नाराज हो जाऊँगा. अब ऐसे (प्यारे) शख्स का आप कर भी क्या कर सकते हैं, सो मैंने भी अपनी मार्क्सवादी शान में ये गुस्ताखी 'कबूल है, कबूल है, कबूल है' वाल्रे अंदाज में कबूल कर ली है. तिस पर तुर्रा यह कि सरफराज़ साहब उस दिन टकराए भी तो अपनी शरीक-ए-हयात नुसरत के साथ. मामला अब यह कि उन पर गुस्सा करें भी तो कैसे, कि भावज भी साथ है.

तो उन्होंने अपने अंदाज में पहले तो पाँव छुए और फिर विवेक शुक्ला ( कायदे से यानी फिल्म 'दिल दोस्ती इट सिट्रा'वाले अंदाज में कहें तो सुक्ला जी) को फोन लगा दिया कि दादा बैठे हैं ‘चले आओ’. फिर क्या.. विवेक बाबू भी चले आये.. अब उनकी सरफ़राज़ बाबू से कोई पुरानी नाराजगी थी (जो संभव नहीं है) या बीती रात का ही कोई झगड़ा था, कि आते ही सरफराज़ साहब पर पिल पड़े. फिर क्या.. जाने अलीग उर्फ पंडित उर्फ सरफराज़ साहब मेरे लिहाज में थे या मेरी भावज उर्फ उनकी अपनी पत्नी के, थोड़ी देर चुप जरूर रहे. पर 'सुक्ला' जी थमने का नाम ही न लें, तो उन्होंने भी जवाबी नारा बुलंद किया.

नारा भी क्या खूब था. ‘नारा-ए-तकबीर’. पर ये लीजिए जनाब.. जवाब आया तो ‘सुक्ला’ जी की ही तरफ से! ‘नारा-ए-तकबीर’ का जवाब था ‘हर हर महादेव’! आप चाहें तो अब मुझे, मेरी भावज और वहाँ मौजूद चंद और लोगों को बेवकूफ, या चाहे जो कुछ भी मान लें, नारे और उसके जवाबी नारे की वजह से नीलगिरी ढाबे की सुबहों को उदास रहने वाली जगह में एक ऐसी हंसी बिखर गयी थी जिससे ज्यादा खूबसूरती का दावा कुदरत भी नहीं कर सकती थी. एक ऐसी खूबसूरती जो सिर्फ दोस्ती से निकलती है, वह दोस्ती जो गैर-बिरादारान-ए-मजहब लोगों के लिए इस मुल्क में मुहाल में है.

जब साथ रहेंगे ही नहीं तो यह दोस्तियां कहाँ से होंगी? जब साथ जियेंगे ही नहीं तो एक दूसरे के साथ मुहब्बतों भरा ये रिश्ता कहाँ से कायम होगा? ज़रा सोचिये, कि जेनयू जैसी जगह पंहुचने के पहले आपके कितने दोस्त थे जो ‘गैर’ मजहब के थे? साथ होने के किस्से अब या तो गंगाजमनी तहजीब की अपीलों में मिलते हैं या बीत गए से वक्त की खुशनुमा यादों की तरह प्रेमचंद की कहानियों से कोई जुम्मन काका अचानक हमारी जिंदगियों में शरीक हो जाते हैं. पर इन कहानियों से, अपीलों से परे देखें तो हमने पूरे मुल्क को ही घेट्टो बना डाला है. ऐसा घेट्टो जहाँ साथ रहने की, जीने की, साझेदारी की गुंजाइश जाने कैसी तो सुरक्षा के लिए 'अपनों' के साथ रहने/बसने की ख्वाहिशों के नीचे दफ़न हो जाती है.

फिर ये हादसा भी उसी मुल्क में होना था जहाँ एक आम हिन्दू ताजियों के जुलूस में होता था और एक आम मुसलमान अपने बच्चे को चेचक हो जाने पर देवी माँ को 'कढ़ाई' चढाता था. उस मुल्क में जहाँ मुहर्रम के मातम की जंजीरें हिंदुओं का सीना भी चाक करती थीं और बनारस का कोई दशहरा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के बिना कहाँ पूरा होता था. उस मुल्क में भी जहाँ उस्ताद अलाउद्दीन खान को सुनने के लिए मैहर में माँ दुर्गा को उतरना पड़ता था तो अमरनाथ की यात्रा में छड़ी मुबारक के साथ सबसे आगे मुस्लिम चलते थे. अब सोचिये कि ये हादसा हुआ क्यों!

मैं इस सवाल का जवाब जानता हूँ. यह भी कि विवेक और सरफराज़ की चुहल भरी झड़प आपके लिए जो भी हो, मेरे लिए इस देश की फिरकापरस्ती का जवाब है. यह भी कि जब तक ऐसे दोस्त ज़िंदा रहेंगें, गंगाजमनी तहजीब भी ज़िंदा रहेगी..

4 comments :

  1. bahoot mazedar hai samar bhai.....kash hamere mulk ke har hindu aur muslman "sarfarz ji aur shukla ji"ki tarah dost ban jate.... aur naraye taqbeer -har har mahadev buland karte.....waise aap ki lekhan ki kya tarif karo samar bhai suraj ko diya dikhna jaisa hoga ......

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  2. बेमिशाल ! सभी पढ़ें और जरा सोचें...

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  3. Beautiful! Kaash ki wo log bhi isey padh paate jinhe isey padhne ki sabse zyada zaroorat hai.

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  4. Beautiful! Kaash ki wo log bhi isey padh paate jinhe isey padhne ki sabse zyada zaroorat hai.

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