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December 17, 2011

मुक्ति के सपनों का अभिशापित आख्यान: द डर्टी पिक्चर

एक गाँव है, उस गाँव में एक घर है. घर में सीढ़ी पर चढ़ी सपनों से बातें कर रही एक बच्ची है. बच्ची जिसे पता है कि सपनों का पीछा करने वाले रास्ते उसके गाँव से शहर को जाने वाली सड़क से ही शुरू होते हैं. उसे पता है कि गाँवों में सपने देखने की गुंजाइश तो है पर कुछ लोग हैं जिन्होंने हमारे गाँवों को सपनों की कत्लगाह में तब्दील कर दिया है. बच्ची ने बेशक पी साईनाथ को नहीं पढ़ा होगा, बच्ची भारतीय ग्राम्यजीवन के सबसे बड़े संकटकाल से गुजरते होने के तथ्यों से भी अनजान होगी, पर कुछ है जो उसे बता रहा है कि मुक्ति के रास्ते बाहर को खुलते हैं.

यह है द डर्टी पिक्चर. अपने समय के सबसे खुले राजों को परत दर परत उघाड़ते हुए, उनसे लड़ते हुए. और कहते हैं कि जिन चीजों को जानते हुए भी छिपाए रखने पर हुक्मरानों के भीतर आम सहमति हो, उन्हें बेलौस कह देना लड़ने की शुरुआत होती है. गाँवों के मर रहे होने का सच एक ऐसा ही सच है जो हम सब की जिंदगियों में शामिल है. हम सब ने सपनों का पीछा करने वाला सफर हिन्दुस्तान की परिधि पर बसे उन्ही नामालूम से गांवों-कस्बों से शुरू किया था. वह सफर जिसमे लौट आने की ख्वाहिशें हमारे धीरे धीरे महानगरीय होते जाने के साथ क़त्ल हो गयीं और हम इसे नियति मान चुपचाप बैठे रहे.

डर्टी पिक्चर की सच के साथ मुठभेडें यहाँ से बस शुरू होती हैं. रेशमा के सिल्क बनते जाने की कहानी महानगरों में झुग्गी झोपडियों के रूप में उग आये गांवों की कहानी भी है, मर रहे मूल्यों की कहानी भी और पितृसत्ता के प्रेतों के तमाम रूपों में घूमते होने की भी. रेशमा हमारे आम से घरों की बेहद आम सी लड़की है बस इस मामले में अलग कि वह अपने सपनों को अपने दहेज वाले बक्से में बनारसी साड़ियों के नीचे दफ़न करने को तैयार नहीं है. उसे अपने सपने हासिल करने हैं फिर कीमत जो भी हो.

रेशमा एक और रूप में अलग है. वह अपनी यौनिकता के साथ बिलकुल सहज है. बेशक उसने नारीवादी विमर्श नहीं पढ़ा होगा पर उसे पता है कि उसका शरीर उसका अपना है. अपने शरीर पर मालिकाने का यह दावा औरतों को संपत्ति मानने वाले समाजों में किस बगावत से कम है भला? रेशमा जानती तो और भी बहुत कुछ है, जैसे यह कि लड़कों को जो कुछ चाहिए वह उसके पास है तो फिर बड़ा कौन हुआ. पुरुषों की सबसे आदिम इच्छाओं को गुदगुदाते, छिछला मजा देते से इस वाक्य को गौर से देखिये और साफ़ हो जाएगा कि रेशमा हिन्दुस्तान की सारी औरतों की प्रतिनिधि के बतौर हिन्दुस्तान के लगभग सारे मर्दों को कटघरे में खडा कर रही है. उन मर्दों को जो छुट्टी के समय गर्ल्स कालेज के सामने साइकिल/मोटरसाइकिल लगाते हैं, उन मर्दों को जो बसों में, ट्रेनों में, बाजारों में यानी कि हर जगह महिलाओं को ‘छू लेने’ को अधिकार समझते हैं, उन मर्दों को जो आफिसों से लेकर विश्वविद्यालयों तक अपनी स्तिथि का फायदा उठाते हुए अपनी सहकर्मियों को उनकी यौनिकता में समेट देने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं.

बेशक इस वाक्य की भाषा छिछली लग सकती है, बाजारू लग सकती है पर फिर जिन मर्दों को लक्षित करके यह वाक्य बोला गया है क्या उनका व्यवहार ऐसा नहीं है? बेवजह नहीं है कि इस मुल्क में मध्यवर्गीय महिलाओ का ‘ब्लैंक न्वाईज’ नाम का एक कैम्पेन सिर्फ यह पूछने के लिए खड़ा होता है कि ‘आप क्या घूर रहे हैं’ तो बुंदेलखंड की महिलाओं को अपनी रक्षा के लिए ‘गुलाबी गैंग’ बनाना पड़ता है. रेशमा इस व्यवस्था में अन्तर्निहित यौनिक कुंठा को साफ़ साफ़ पहचानती है भले ही इसके लिए उसके पास अकादमिक भाषा के औजार न हों. उसके लिए मुक्ति के रास्ते भी इसी कुंठा के गलियारों से निकलते हैं, पुरुषों की ‘ट्यूनिंग’ की आदिम ख्वाहिशों का अपने हक में इस्तेमाल करने से. इस व्यवस्था की उसकी समझ वहाँ तक जाती है जहाँ वह एक भले से, समझदार से दिखते ‘इब्राहिम’ को ललकारती है कि ‘मुझे ऐसे देख रहे हो जैसे तंदूर मुर्गी को देख रहा है’.

फिर कुछ कुछ सभ्य सा दिखता यह इब्राहिम भी दिलचस्प किरदार है. उसे पता है कि वह निर्देशक है ‘दलाल’ नहीं, कि उसे फ़िल्में बनानी हैं सेक्स नहीं बेचना है. पर वह भी आखिर को पुरुष ही है, अपने भीतर रह गए पितृसत्ता के तमाम अवशेषों से लड़ने की उसकी कोशिशें कम दिखती हैं ज्यादा दिखती है वह नफरत जो अब सिल्क बन गयी रेशमा जैसी लड़कियों के लिए उसके दिल में पलती है. ‘तुम दुनिया की आखिरी लड़की होती तो मैं नसबंदी करवा लेता’ कहते हुए इब्राहिम के चेहरे पर वह तमाम घटियापन छलक छलक आता है जो उसके जैसे मर्द अक्सर बस छिपा पाते हैं, उसे खत्म नहीं कर पाते. नसबंदी का प्रेम से, सेक्स से क्या रिश्ता है इस बेवकूफी को छोड़ भी दें तो जो सवाल बचता है वह यह कि यह सिर्फ इब्राहिम नहीं है. तमाम मुखौटों के पीछे हम जैसे तमाम लोगों के अंदर भी थोड़ा थोड़ा इब्राहिम बसता ही है जिससे लड़ने की हम कोई कोशिशें नहीं करते.

इस फिल्म में इब्राहीम के बराबर खड़े और मर्दों को देखें तो फ़िल्मी दुनिया के रूपहले परदे के पीछे का अँधेरा साफ़ नजर आता है. सूर्या के सच में सिर्फ उसका सच नहीं इस दुनिया की खुद से मुठभेड़ का सच है. उस दुनिया का जहाँ नायक के अलावा सब कुछ अतिरिक्त है. उतने सारे मर्दों में देखें तो बस एक ‘कीड़ादास’ है जिससे थोड़ी सी सहानुभूति होती है क्योंकि उसे साफ साफ़ मालूम है कि उसे करना क्या है. वह समीक्षाओं को ठेंगे पर रखता है क्योंकि उसे मालूम है कि कीमत उस कागज़ की होती है जिस पर ‘टिकट’ छपता है उनकी नहीं जिन पर समीक्षाएँ छपती हैं.

सिल्क की ख्वाहिशें, मगर, अभिशप्त ख्वाहिशें हैं. बिना पितृसत्ता को चुनौती दिए यौनिकता को, अपने शरीर के मालिकाने को हासिल करने की कोशिशों की नियति है हार जाना. ठीक उसी तरह जैसे पूंजीवाद में एक व्यक्ति तो गरीबी से भाग सकता है, साम्राज्य खड़े कर सकता है पर गरीबों का एक वर्ग के बतौर भागना संभव नहीं है. सिल्क तब तक जी सकती थी जब तक वह सोचे ना, जब तक वह अपनी दुनिया के एक छोटे से हिस्से में अपनी आजाद ख्वाहिशों का एक छोटा सा घर बना उससे आगे बढ़ने की कवायद में न लगे.

वजह बहुत साफ़ है कि यौनिकता का उत्सव मनाने वाली लड़कियों के लिए इस घुटन भरी दुनिया में और चाहे जो हो प्यार की गुंजाइशें नहीं हैं. यह वह जगह है जहाँ इतिहास आज तक कोई सेंध नहीं लगा पाया. यहाँ कतरा कतरा मुक्ति तो संभव है पर बीबियों और प्रेमिकाओं के लिए ठीक उलटी मरदाना ख्वाहिशों के दोहरेपन में यहाँ कोई सिल्क खप ही नही सकती.

पर सिल्क प्यार करने से बच भी कहाँ सकती थी. पितृसत्ता की दुनिया अपने तर्कों पर चलती है और फिर उन तर्कों को हेजेमनी के हथियारों से आम तर्क बना देती है. प्यार करना सिल्क का चुनाव नहीं था, उसने तो अपने लिए बस ‘ट्यूनिंग’ की थी. अब सोचिये कि यह ट्यूनिंग सिर्फ सिल्क के लिए, स्त्रियों के लिए प्यार में क्यों बदल जाती है? सिल्क की मौत यहीं से निर्धारित होती है और होती रहेगी जब तक पुरुष और स्त्री के लिए प्यार के मायने अलग अलग रहेंगे. और इसीलिये, डर्टी पिक्चर में जो डर्टी है वह सिल्क नहीं समाज है.

3 comments :

  1. बहुत खूब...फिल्म देख कर आने के बाद मैंने इसे एक डिसेंट फिल्म की संज्ञा दिया था. निश्चित ही यह तथाकथित सभ्यों की असभ्यता को सरेआम कर देने वाली भद्र फिल्म है. लेकिन अंत तो अंततः वही होना था जो नियति बनायी है अहम पुरुषों ने ? आपने गौर किया या नहीं कि पीढ़ियों से 'सदा सुहागन'बने रहने की कृतिम तृष्णा से ही तो हारी या हारी जाती दिखाई गई....! खैर ...फिल्म देखने के बाद फेसबुक स्टेटस के माध्यम ये सोचा था मैं :.
    अभी एक डिसेंट फिल्म देख कर आ रहा हूं. नाम उसका इसलिए 'डर्टी पिक्चर' है क्यूंकि सिल्क की तरह ही निर्माताओं को भी फिल्म का पैसा वसूलने के लिए डर्टी दर्शक ही चाहिए होता है. ज़ाहिर है जब कोई निर्देशक खुद का ही फिल्म देखते-देखते सो जाय तो आखिर दर्शक से कैसे उम्मीद किया जा सकता है कि वह झेले किसी 'आर्ट' जैसी फिल्म को? फिल्म के अंत में जब सिल्क सजी-धजी-छली मरी -गिरी-पडी- रहती है तब भी मैंने 'आगे' के दर्शकों को ताली बजाते, सीटी मारते हुए ही सुना. बस लोचा यहीं है कि जब आप जीवन भर डर्टी लोगों की ताली, डर्टी चीज़ों के लिए ही मरते रहे हों तब आपको मरने के बाद भी उनसे संवेदना-सहानुभूति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. यह न केवल फिल्म, अपितु राजनीति (मारन-कलमाडी), पत्रकारिता (जिगना वोरा), अध्यात्म ( चिदर्पिता) और हर चीज़ पर लागू हुआ करती है.
    पंकज झा.

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  2. बहुत अच्छा लिखा है समर...बधाई

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  3. बाज़ारवादी समाज में सभी यह सोचते हैं 'मेरा हिस्सा कितना है ? मुझे कितना मिलेगा ? या फिर किसी के हक या पसीने की मेहनत कैसे सस्ते में लूट ली जाए...यहाँ नैतिकता और मोरल को सिर्फ शाब्दिक ही साथ मिलता है...यहाँ जिसको तुम अपना और सीधा-साधा सा समझो वह वैसा नहीं है,वह भी बाज़ारवाद से अनछुआ नहीं. नैतिकता और मोरल जैसी मानवीय भावनाएं तिजारती समाज में शंका या दया के दायरे में ही रहती है और ना ही उसे पुरष्कृत किया जाते हैं.

    'ध डर्टी पिक्चर' देखी नहीं है...टोकीज़ में दो घंटा बैठने के ख्याल भर से ही भीतर कोफ्त-सी होने लगती है...(टी.वी. पर अब के नई फिल्में दो-चार महीनों में आ ही जाती है... यह ख्याल भी फिल्म देखने को टालता है किबाद में जल्द ही टी.वी.पर देख लेंगे).

    तुमने बिल्कुल ही सही सूत्र पकड़ा है समर कि 'स्त्री का ट्यूनिंग प्यार में बदलते ही उसकी मृत्यु या पराजय निर्धारित होती
    जाती है', और यह निर्धारित होती रहेगी जब तक पुरुष और स्त्री के लिए प्यार के मायने अलग-अलग रहेंगे. स्त्री-विमर्श के लिए भी तुम्हारा यह यह सूत्र नवीन ही है...

    फिर यह तो जरुरत का ही बाजार है. किसी को शरीर की, किसी को पैसों की, किसी को महत्वाकांक्षा/अहं पूर्ति की...कोई मजबूर है तो कोई मजे ले रहा है...कोई (ज्यादातर स्त्रीयाँ) फँस जाने की भयप्रद मानसिकता में है...साथ-साथ ही समाज में सेक्स और संयम की शिक्षा भी चलती रहती है...पर कोई भी सेक्स की थाह नही पा रहा है...या फिर थाह पाने के तरीके ही स्पष्ट न हो...कुमार साहनी की एक फिल्म थी 'तरंग' जिसमें सेक्स की उत्कटता और उसकी प्राप्ति के छलावे का सटीक निरूपण था(यहाँ सेक्स की मानसिक मांगों का ही जिक्र था शायद, शरीर की सहज मांग की अवमानना
    का नहीं).

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