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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 12, 2011

हम जो अन्नावादी नहीं हैं, अपराधी है..

यह हमारे अपराध, हमारी ऐतिहासिक भूल का कुबूलनामा है. हम जो अपनी तमाम जनपक्षधरता के बावजूद अन्ना के न हो सके, हम जिन्होंने देश की ‘दूसरी आजादी’ की लड़ाई इस दूसरे गांधी के नेतृत्व में लड़ने से इनकार कर दिया. हम अपराधी हैं कि उस वक्त जब भारत की ‘सबसे सही लाइन’ वाली एक कम्युनिस्ट पार्टी भी मुक्ति के, लिबरेशन के रास्ते अन्ना के आन्दोलन के कनातों के नीचे से गुजरता हुआ देख रही थी, हम अपनी इंकलाबी रूमानियत की बेवकूफाना गलियों में भटकते अन्ना के इतिहास और वर्तमान के अंतर्संबंधों की पड़ताल में लगे थे.

हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि अन्नावादी उन्माद के इन समयों में क्रान्ति से लेकर सामाजिक बदलाव के दरवाजे ‘मैं भी अन्ना’ नाम की जादूई चाभी से खुलते हैं. यूँ भी, जब तमाम मार्क्सवादी-लेनिवादी अपनी पार्टी के नाम में अन्नावादी जोड़ लेने पर गंभीर विमर्श में लगे हों तो ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ के हथियारों से अन्ना के आंदोलन को समझने की हमारी कोशिश भोथरी साबित होनी ही थी. हम ‘शराबियों’ पर बरसते अन्ना के कोड़ों को, पाकिस्तान से लड़ने और लड़ते रहने की उनकी दहाडों को, उत्तर भारतीयों पर राज ठाकराना हमलों के उनके समर्थन के तथ्यों से उनके नेतृत्व के ‘वर्ग चरित्र’ को समझने की कवायद करते रहे, यह समझे बिना कि अब मसला वर्ग से बहुत आगे चला गया है.

इतना आगे कि अब प्रतिबद्धताएं आंदोलनों से नहीं अन्ना के समर्थन या विरोध से तय होनी थीं, और यहाँ कोई भी सवाल उठाना अपराध होना था. बस हमारा अब तक का संघर्ष खारिज ही होना था. हम जिनके लिए क्लर्क के ऊपर का कोई भी अधिकारी ‘व्यवस्था’ का हिस्सा था, उस व्यवस्था का जिससे हम लड़ते ही रहे थे. हम जो खानदानी नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी के खिलाफ खड़े रहे थे, और हम जो भाजपा की संघवादी साम्प्रदायिकता को व्यवस्था में लगा कांग्रेस से भी बड़ा घुन मानते रहे थे. और हम, जिनके लिए कांग्रेस और भाजपा का यह फर्क ‘व्यवस्था’ के हमारे प्रति बरताव में प्रतिबिंबित नहीं होता था. हमारे हर प्रदर्शन, धरने और मोर्चों पर पुलिसिया लाठियां एक सी बरसतीं थीं, इस बात का फर्क किये बिना कि जहाँ बरसीं वहाँ सरकार किसकी है.

हमारे जेहन में तो बात बहुत साफ़ हो चली थी. मसला अब दलों और उनकी स्वघोषित विचारधाराओं का नहीं, जनता के बरअक्स सरकारों का था. हमें साफ़ साफ़ दिखने लगा था कि पैदावार के तीन महीने बाद कृषिमंत्री शरद पवार का खाद्यान्नों के दाम बढ़ने का ऐलान किसानों के हित में नहीं बल्कि जमाखोरी करने वाले व्यापारियों के लिए ही होता था कि गोदामों का मुंह कुछ दिनों के लिए और बंद रखो कि मुनाफा और बढ़ेगा. हमें दिखने लगा था कि भाजपानीत एनडीए सरकार द्वारा खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाने की नीति कांग्रेसनीत यूपीए शासन में क्यों लागू होती है.

सवाल और भी बहुत सारे थे. जैसे कि यह कि अन्ना के आंदोलन के पीछे तमाम कार्पोरेशंस अपनी तिजोरियां लेकर खड़े थे. शायद इसलिए, कि उन्हें जनता को लूटने के लिए भी सरकार को घूस देना गवारा न था. शायद इसलिए भी कि अन्ना के जनलोकपाल में और सब कुछ था, कार्पोरेशंस का जिक तक ना था. अब कोई कंपनी अरबों का फायदा हुए बिना किसी मंत्री को करोड़ों क्यूँ देगी यह सवाल अपने मन में उठना लाजमी था. यह भी कि जनलोकपाल के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वही जगहें क्यों हैं जहाँ सकारात्मक विभेद की कल्याणकारी नीतियों के चलते दलित वंचित समुदायों के लोग पंहुच पाए हैं. संसद और नौकरशाही, आज के भारत में शायद सिर्फ यही दो जगहें हैं जहाँ उत्पीडित आदिवासियों, जातियों और समुदायों की भागीदारी है. इसके उलट ‘इंडिया इंक’ के नाम से जाने जाने वाले उद्योगपतियों के जमावड़े या एनजीओ क्षेत्र को एक नजर देख भर लेने से इनका उच्च वर्गीय/उच्च जातीय चरित्र साफ़ साफ़ दिख जाता है. शायद इसीलिये, जनलोकपाल के दायरे से एनजीओ क्षेत्र को मिलने वाला देशी/विदेशी अनुदान भी गायब था.

देश की ‘दूसरी आजादी’ की इस लड़ाई से गायब तो और भी बहुत सारी चीजें थीं. उस देश में जहाँ हजारों लोग हर बरस भूख से मर जाते हों, और कुछ हजार फर्जी पुलिसिया मुठभेड़ों में, निजी क्षेत्र को बिलकुल छोड़ कर सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मुद्दे को और किसी मुद्दे के ऊपर रख देने की राजनीति परेशान करने वाली थी. उससे भी ज्यादा परेशान करने वाला वह समर्थन था जो इस आंदोलन को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने दिया था. उसी मीडिया ने जो मजदूरों की रैली की खबर शहर की जनता को हुई दिक्कतों के, ट्रैफिक जामों के सन्दर्भ से देता है.

राजनीति आखिरको तमाम ख्वाहिशों को नीतिनिर्माण के केंद्र में ले आने की जद्दोजहद का नाम है. बेशक अन्ना ही नहीं कोई भी भ्रष्टाचार के सवालों को और सवालों से ऊपर रख सकता है पर फिर और लोगों के सवालों को खारिज करने का हक इसमें शामिल नहीं है. जैसे कि उन्होंने अपनी ही ‘टीम अन्ना’ के एक सदस्य के काश्मीर के सवाल पर दिए गए बयान के साथ किया. जैसे उन्होंने इरोम शर्मीला द्वारा उनको लिखे गए पत्र के साथ किया. वैसे ही जैसे उन्होंने खुद को भारत की सारी जनता का ‘संविधानेतर’ मसीहा घोषित कर दिया और एक दूसरे ‘संविधानेतर’ युवराज गांधी पर तमाम दोष मढते रहे.

इस देश के लोकतंत्र का यह अद्भुत क्षण है जब लोकतंत्र के ऊपर दो दो संविधानेतर सत्ताएं बैठी हों और देश का मध्यवर्ग उन्ही में अपना भविष्य देख रहा हो. पर उससे भी अद्भुत यह है कि मार्क्सवादी होने का दावा करने वाली कुछ पार्टियां और कुछ लोग भी अन्ना में अपना भविष्य ढूंढ रहे हों. काश वह समझ पाते कि उधार के सपनों से न क्रान्ति की जमीन बनती है न उधार की भीड़ से इन्कलाब के हरावल पैदा होते हैं. पर वह यह समझने को कहाँ तैयार हैं. मोदी और नीतीश की तारीफ़ करने वाले अन्ना, शिवसेना की गोद में बैठने वाले अन्ना, विश्व हिन्दू परिषद के दुलारे अन्ना उन्हें अपने, अवाम के साथी लगते हैं.

उन्होंने तो सारी लड़ाई बस कांग्रेस और अन्ना के बीच समेत कर रख दी है. बावजूद इस सच के अपने मूल चरित्र में दोनों बस बिलकुल एक से हैं. बावजूद इस सच के भी कि खानदानी मालिकाने वाली कांग्रेस के विरोध का मतलब अन्ना के साथ जा बैठने को मजबूर नहीं कर देता. पर यह आप उन्हें कैसे समझायेंगे जो स्मृतिभ्रंश का शिकार हैं.जिनके लिए इतिहास सीखने की नहीं, भूलें करने और माफी मांगने की चीज है.

खैर, समझ पाते तो वह समझते कि चंद्रबाबू नायडू के दमन से त्रस्त होकर 'उदार' कांग्रेस के पक्ष में माहौल बंनाने का अंजाम तेलंगाना के माओवादियों ने कैसे भुगता था. यह भी कि ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की किशन जी और उनकी पार्टी सीपीआई माओवादी ने कितनी बड़ी कीमत अदा की है. इतिहास से सीखते तो शायद वह समझ पाते कि मसला मुद्दों का नहीं राजनीति का होता है. भ्रष्टाचार के सवाल पर अन्ना के साथ जाने से उनकी कोई जनता आपके और मुद्दों पर आपके साथ नहीं आने वाली. क्रांतिकारियों को अपनी जनता खुद गढ़नी होती है, और यह गढ़ना जनसंघर्षों से लेकर जनता के जीवन के हर मुद्दे पर उनके साथ क्षैतिज साझीदारियाँ खड़ी करने, उनके सुख-दुःख का हिस्सा बनने से ही हो सकता है.

हम अपराधी हैं कि हम अन्ना के साथ नहीं हैं, पर हम शर्मिंदा नहीं हैं. हमें गर्व है कि हारी हुई लड़ाइयों में ही सही हम तमाम सोनी सूरियों के साथ हैं, शर्मिलाओं के साथ हैं, हिन्दुस्तान के आम अवाम की लड़ाइयों के उनके संघर्षों के साथ हैं. फिर आप बेशक अन्ना को दूसरा गांधी ही नहीं, तीसरा जेपी, चौथा मार्टिन लूथर किंग, पांचवा मंडेला या छठवां मार्क्स ही क्यों न घोषित कर दें.

5 comments :

  1. हालांकि लेख की कई बात से सहमत लेकिन दुःख एक ही बात का कि लाख चाहने के बाद भी हम अपने कुछ मित्रों को उनके यूटोपिया से बाहर नहीं ला पायेंगे.पता नहीं जर्मनी की पानी में ऐसा क्या खास है जो अपना बोरिंग पम्प इन्हें रास नहीं ही आता.कुछ अपनी बात कहना चाहेंगे तो वो भी जर्मनी से ही उधार का मार्क्स लेकर. अगर फलते-फूलते लोकतंत्र को गाली भी देंगे तो उसे वहीं के हिटलर का उदाहरण देकर. भाई साहब ...अपने आस-पास भी काफी कुछ अच्छा है ...क्यूं खुद की जनता चुन लेने को बेताब हैं? गिने-चुने जनता ही यहां अरब हैं..उन्ही से काम चलाइए ....छोडिये उला-ला-ला, उला ला पत्रकारिता का फैशन. खैर....सुन्दर शब्द कौशल...अच्छा शिल्प.
    पंकज झा.

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  2. कितनी ही बार हम इन मुद्दों पर बहस कर चुके हैं, पर शायद एक दूसरे के नज़रिए को अब तक समझ नहीं सके. समझना सहमत होना नहीं है. समझदार असहमति नासमझ सहमति से लाख गुने बेहतर है.
    मेरे ख़याल से आप की नाराज़ी सब से ज़्यादा अन्ना आन्दोलन को दिए गए लिबरेशन के समर्थन को ले कर है .यहाँ एक बात बिलकुल साफ़ हो जानी चाहिए कि सांगठनिक स्तर पर लिबरेशन का अन्ना आन्दोलन से कोई रिश्ता नहीं है. हाँ , पार्टीकर्मी स्वतंत्र रूप से उस में शामिल होते रहे हैं, क्योंकि पार्टी ने जनलोक पाल की मांग का समर्थन किया है . वैसे ही जैसे , कई अन्नाकर्मी हमारे आन्दोलनों और मंचों पर आते रहे हैं.लेकिन आप जानते ही हैं कि अनेक बार पार्टी प्रतिनिधियों को उन्होंने अपने मंच पर आने से रोका भी है . आप ने गौर किया होगा कि हालिया जंतरमंतरी महाडिबेट में लिबरेशन शामिल नहीं था.
    दूसरे , लिबरेशन- भ्रष्टाचार मिटाओ, लोकतंत्र बचाओ , भूमि बचाओ --इन तीन नारों के साथ अन्ना आन्दोलन के बहुत पहले से देश भर में अपने अभियान चलाता आ रहा था. वो अब भी जारी है . दिल्ली में बहत्तर घंटे का संसद घेराव और पटना की विराट रैली इसी अभियान का अंग थी.
    यानी लिबरेशन अपनेही अजेंडे पर चल रहा है . अन्ना का अजंडा लिबरेशन का अजंडा नहीं है . लिबरेशन भ्रष्टाचार विरोध को परिवर्तन के एक व्यापक अभियान के हिस्से के रूप में देख रहा है , न कि उसे ही परिवर्तन की बुनियाद मान कर चल रहा है .
    यह एक मुद्दा- आधारित समर्थन है .यह महसूस किया गया कि जलोपा की मांग भ्रष्टाचार- विरोधी हमारे अभियान के अनुकूल है. लेकिन उन के आंदोलन में जहां कहीं हमें गडबडियां दिखाई दीं, वहाँ हम उन की कठोर सार्वजनिक आलोचना से कभी पीछे नहीं हटे. ताज़ा उदाहरण उत्तराखंड का है .

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  3. जलोपा का मुद्दा क्या है ?राष्ट्रीय स्तर की एक स्वायत्त , सक्षम और प्रत्येक नागरिक के प्रति उत्तरदायी जांच एजेंसी.आप इसे इस तरह सोच कर देखिये. जब क्रांतिकारी नेताओं की हत्या होती है , जनता पर जुल्म ढाए जाते हैं , संगीन अपराध होते हैं , तो हमारी सब से बड़ी मांग क्या होती है ? सी बी आइ की जांच से ज़्यादा हम क्या मांग पाते हैं. उसी के लिए लंबा आन्दोलन करना पड़ता है . और अक्सर उस जांच में भी लीपापोती के सिवा कुछ नहीं होता. क्यों ? क्योंकि एजेंसी सीधे सरकार के नियंत्रण में काम करती है . आप देखिये, सब कुछ होते हुए भी न्यायपालिका अनेक गंभीर मुद्दों पर बेहतर ढंग से काम कर पायी है , क्योंकि वह सरकार द्वारा नियंत्रित नहीं है. लेकिन उसे भी पुलिस और सी बी आइ जैसी एजेंसियों की जांच से जुटाए सबूतों के आधार पर ही काम करना पडता है , जिस के चलते वे कई बार जानते हुए भी मुज़रिम को सजा नहीं दे पाते . अब सोचिये कि अगर प्रत्येक नागरिक की सीधी पहुँच किसी ऐसी स्वायत्त सक्षम उत्तरदायी जांच एजेंसी तक हो जाए , तो क्या इस से हालात पे कुछ भी फरक नहीं पड़ेगा ?
    यह तर्क अपनी जगह है कि आर टी आइ से कितना फर्क पड़ा, न्यायपालिका से भी कितना पड़ा , या हमारे लोकतंत्र से ही क्या हुआ. लेकिन क्या हम चाहेंगे कि वे खत्म हो जाएँ ? जो भी जितना है , बहुत कुर्बानियों से मिला है , उसे छोड़ा नहीं जा सकता. उसे बेहतर बनाने के लिए लड़ा जा सकता है.
    कहा जा रहा है कि जलोपा में मीडिया , एन जी ओ और कारपोरेट क्यों नहीं हैं ? वे हों . हमें कोई आपत्ति नहीं है .
    लेकिन सचाई यह है कि इन तीनों का भ्रष्टाचार हमेशा सरकारी मिलीभगत से ही होता है .उस के बिना नहीं हो सकता .इस लिए सरकार अगर जलोपा में शामिल है , तो वे भी शामिल हैं. सरकारी मिलीभगत को खत्म कर दीजिए . वे सब औकात में आ जायेंगे .
    यह एक भ्रम है कि ये तीन ही इस आंदोलन को प्रायोजित कर रहे हैं .वे तो कभी जलोपा नहीं बनने देना चाहेंगे. भली ही जन दबाव को बरगलाने के लिए वे उस का दिखाऊ सर्थन उसी तरह कर रहे हों , जैसे भाजपा और कांग्रेस भी कर ही रही है. आप उन के पक्षधर विश्लेषकों के लेखों को ध्यान से पढ़िए . वे कह रहे हैं कि जलोपा से भ्रष्टाचार मिटेगा नहीं , और बढ़ जाएगा. उन का तर्क यह है कि भ्रष्टाचार का स्रोत राज्य का ताकतवर होना है. जलोपा उसे और ताकत देगा , और इस तरह और भ्रष्टाचार बढ़ाएगा. देखिये , २७ अगस्त को ओपन में छपे एक लेख ( हू किल्ड द रिफॉर्म्स रैबिट ) में मध्य वर्ग को गरियाते हुए आलम श्रीनिवास क्या कहते हैं -
    ''Given this sorry state of affairs, middle-class folk feel obliged to voice their anger. They have chosen the easy way out in supporting Hazare’s cause. In doing so, they fail to understand the obvious: that heavyhanded policing is rarely if ever a solution. To quell corruption, Indian governance needs transparency, but far more critically, it also needs to contain the exercise of arbitrary authority. A supercop is not the answer.''

    मज़े की बात ये कि जलोपा के खिलाफ अनेक जनपक्षधर बुद्धिजीवीयों का तर्क भी तकरीबन ऐसा ही है .
    अगर जलोपा राज्य को लोकतांत्रिक दिशा में मज़बूत बनाने वाला है तो उस से उत्पीडित अवाम को कुछ राहत मिलेगी , या उस का और अधिक उत्पीडन होगा? उत्पीडन राज्य की संस्थाओं , कानूनों, प्रक्रियाओं को अधिक लोकतांत्रिक बनाने से बढ़ता है , या उसे अधिक सरकार -नियंत्रित करते जाने से ? सरकारें क्या कर रही हैं ?वे चुनावों की ओट में संस्थाओं का रहा सहा लोकतांत्रिक अवकाश भी खत्म कर देने पर तुली हैं. एकल पहचानपत्र परियोजना इसी मुहिम अंतिम चरण है. जो नागरिक से भी उस का लोकतांत्रिक अवकाश छीन लेगा.

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  4. जलोपा सर्वग्रासी सरकारी चंगुलकशी के खिलाफ एक छोटा सा कदम है . आगे अनगिनत लड़ाइयां पडी हैं. सच है .लेकिन जब तक अंतिम लड़ाई नहीं लड़ ली जाती , तब तक किसी भी तरह की लड़ाई न लड़ी जाए , यह कैसी क्रांतिकारी दृष्टि है ?
    जो बात सब से ज़्यादा समझ से बाहर है , वह यह कि आखिर जलोपा , अगर वह बन ही जाए , किस तरह दलितों -पिछडों -अल्पसंखयकों के हितों के खिलाफ काम करेगा. जलोपा में इन वर्गों का अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व हो , इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए . लेकिन उस की तो सब से ज़्यादा जरूरत इन्ही वर्गों को है. और इसीलिये नेताओं के खुले विरोध के बावजूद वे भारी संख्या में इस आंदोलन में मौजूद है .

    आप के इस लेख में सब से मार्के की बात इन नेताओं के विरोध की पीछे की मूल वज़ह की ओर आप का इशारा है .
    आप ने लिखा है --
    ''जनलोकपाल के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वही जगहें क्यों हैं जहाँ सकारात्मक विभेद की कल्याणकारी नीतियों के चलते दलित वंचित समुदायों के लोग पंहुच पाए हैं. संसद और नौकरशाही, आज के भारत में शायद सिर्फ यही दो जगहें हैं जहाँ उत्पीडित आदिवासियों, जातियों और समुदायों की भागीदारी है.''

    इस का मतलब तो यह हुआ , कि अब जब हमें भ्रष्ट होने के वास्तविक अवसर मिले हैं , तभी भ्रष्टाचार मिटाया जाने लगा है .इसी रूप में यह एक सवर्ण षड्यंत्र है ! इसी लिए हम ऐसा नहीं होने देंगे. अगर भ्रष्टाचार ही नहीं कर सके तो सकारात्मक विभेद ( आरक्षण ?) का फिर लाभ ही क्या हुआ ?
    कामरेड , ये सब बातें कहने की नहीं होतीं . लेकिन आप के साहस को सलाम .आप मन की बात साफ साफ़ कह देते हैं. और लोगों की तरह लंबी लंबी नहीं फेंकते.

    बातें बहुत सारी हैं. होती रहेंगी .चलते चलते केवल यह कि लाला लाजपत राय अपने राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में खासे साम्प्रदायिक हो चले थे . भगत सिंह ने उन पर एक बेहद तीखा लेख लिखा था - द लॉस्ट लीडर. धज्जियां उड़ा दी थीं . लेकिन उन पर अंग्रेजों की लाठियां पड़ीं तो भगत सिंह ने ही इसे राष्ट्रीय अपमान करार दिया , बदला लेने का संकल्प लिया , बदला लिया , और शहीद हुए . यही नहीं , गांधीजीके आंदोलन की कठोरतम आलोचना करने के बावजूद वे राष्ट्रीय आंदोलन में उन के महत्तर योगदान की सराहना करने में कभी नहीं हिचके , न उन्हे राष्ट्रपिता कहने में

    क्या भगत सिंह साम्प्रदायिक हो गए थे ?अंधराष्ट्रवादी हो गए थे ? मैं जानता हूँ कि आप का उत्तर वही है , जो मेरा है .'' नहीं''.

    क्रांतिकारी अंतर्दृष्टि संघर्षों की जटिलताओं से मुंह नहीं मोड़ती .वह सरलीकृत सूत्रों , श्रेणियों और समाधानों में निहित खतरों की ओर से बराबर सचेत रहना क्रांतिकारी उद्यम का जरूरी हिस्सा मानती है .--

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  5. पाणिनि आनंद ने एक कविता लिख मारी है, इसी को पढकर मैं अभी आनंदित हो रहा हूँ :)

    मैं अन्ना हूं

    मैं ओम, निःश्रेयस, अभ्युदय हूं
    मैं सूर्य हूं, मैं ही उदय हूं
    मैं शिवाजी की तलवार हूं
    मंच पे सवार हूं
    गांधी का लंगोट हूं
    मैं आर्मी का फटा हुआ कोट हूं
    मैं 121 करोड़ का ठेकेदार हूं,
    मैं भले ही एक वोट हूं

    मैं मिथ्या का श्रम हूं
    मैं गांधी आश्रम हूं,
    मैं शराब के खिलाफ हूं
    पर नशे में हूँ, भ्रम हूं
    मैं समाजसेवियों का सिकंदर हूं
    मैं बेड़ों के लिए पोरबंदर हूं

    मैं एक गांव का हेडमास्टर हूं
    मैं पैर का कटा हुआ प्लास्टर हूं
    काला जूता हूं, सफेद मोजा हूं
    मैं ही व्रत हूं, मैं ही रोज़ा हूं
    मैं ब्रह्मचर्य की मूर्ति हूं
    मैं वीर्यवान हूं, स्फूर्ति हूं
    मैं ही दिया हूं, मैं ही बाती हूं
    मैं योग हूं, कपालभाती हूं

    मैं मध्यवर्ग का बवाल हूं
    मैं किरण हूं, केजरीवाल हूं
    मैं यूपीए की पीड़ा हूं
    मैं बीजेपी की ढाल हूं
    मैं दिग्विजय का दुस्वपन हूं
    शरद पवार का गाल हूं.
    मैं राहुल के लिए गांधी हूं
    मैं गांव फूंक चली आंधी हूं

    मैं राम हूं, लंका कांड हूं
    मैं इंडिया का लेटेस्ट ब्रांड हूं
    मैं अपने मद में चूर हूं
    मैं मरे किसानों से दूर हूं
    मैं राज ठाकरे का दोस्त हूं
    मैं महाराष्ट्र का नूर हूं

    मैं एरोम को अभी तक नहीं जानता
    मैं एएफएसपीए को सही मानता
    मैं मीडिया का मैनेजमेंट हूं
    मैं आईएसी प्रेसिडेंट हूं
    मैं भीड़ की हरियाली में अंधा हूं
    मैं टोपियों का, तिरंगों का धंधा हूं
    मैं राष्ट्रवाद की अफीम हूं
    मैं ही फांसी का फंदा हूं

    मैं अनुशासन का टोप हूं
    मैं वेटिकन का पोप हूं
    मैं मिसगाइडेड मिसाइल हूं
    मैं एटम बम हूं, तोप हूं
    मैं व्यापारी का दोस्त हूं
    मैं मिडिल क्लास का टोस्ट हूं
    मैं पेप्सी हूं, मैं कोला हूं
    मैं अल्ट्रा व्हाइट लैम्प पोस्ट हूं

    मैं भारत मां का बेटा हूं
    मैं मंच पे आकर लेटा हूं
    मैं पंचवटी का डमरू हूं
    मैं लैपटॉप हूं, डेटा हूं
    मैं बेदी हूं, मैं शर्मा हूं
    चोपड़ा, कपूर हूं, खन्ना हूं
    मैं झाड़ी हूं, झड़बरी हूं
    मैं बांस हूं, मैं गन्ना हूं

    मैं अन्ना हूं

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