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July 30, 2011

उर्दू: खूबसूरत जुबानें हमेशा जिन्दा रहती हैं!

उसकी आवाज में एक चहक थी, खुशबू की तरह हवाओं में बिखरती जा रही एक अल्हड़ खुशी थी. और हाँ, एक खनक भी थी, कुछ गुनगुनाने की सी खनक, वो भी ऐसी मीठी सी जो आपको भी अपने आगोश में ले ले. और उसके बाद की बात तो फिर क़यामत-- Did you hear this song Sam? This is so brilliant, so haunting. बहुत अच्छा है समर. और फिर इयरफोन का एक हिस्सा मेरी तरफ.

मैंने थोड़े अचरज से उसे देखा था. उसे, मतलब मेरी बहुत प्यारी दोस्त श्रेया को. गाने उसको पहले भी अच्छे लगे थे (सबको लगते हैं) उसने कई बार बताया भी था. पर उन तमाम बार में ये वाली खनक कम ही सुनाई दी थी. और इस अचरज और खनक के बीच की किसी जगह से निकलती आवाज थी.. बेक़रां है बेक़रां.. आँखें बंद कीजे ना.. माने कि फिल्म सात खून माफ़ का एक बहुत खूबसूरत नगमा. अबकी इस गाने की सचमुच बेहद खूबसूरत आवाज की मिठास के साथ मेरे मन में बहुत सारे सवाल बिखर गए थे. उसे इतना अच्छा क्या लगा था इस गाने में? क्या उसे इसके बोलों में छुपे मायने समझ भी आये थे? पर उसने कहा तो था-- This song is so soulful!

कैसे छू लिया इन लफ़्ज़ों ने उसे, कैसे उतर गए वो उसकी रूह में ख़ास कर के तब जब हकीकतन बंगाली, पर नोर्थ-ईस्ट (उत्तर-पूर्व) में पली बड़ी इस लडकी को उर्दू तो छोडिये खांटी उत्तर भारतीय हिन्दी समझने में भी दिक्कत होती है. हिन्दी मतलब वह खूबसूरत और (और आसान) 'हिन्दुस्तानी' जबान नहीं जो अदब, इंसानी रिश्तों और फिल्मों के रास्ते हमारी जिंदगियों का हिस्सा हो गयी है. हिन्दी मतलब वह हिन्दुस्तानी जुबान नहीं जो हमें हमारे अपनों और जिन्दगी की सड़कों पे टकरा जाने वाले गैरों से बातचीत का रास्ता देती है.

हिन्दी मतलब वह जुबान जो 'शुद्धि' के झंडाबरदारों द्वारा 'भाषा' बना दी गयी है. वह भाषा जिसे सुनकर तो बारहा अंगरेजी ही आसान लगने लगती है. वह हिन्दी जिसे उस 'उर्दू' से आजाद करने की तमाम कोशिशें कामयाब सी नजर होती आती हैं जो इस मुल्क की मिट्टी की पैदाइश है. इस हद तक कि तमाम बार उर्दू के मर रही जुबान होने के ऐलान होने लगते हैं. पर फिर उर्दू न कोई संस्कृत हैं न फारसी कि हुक्मरानों के साथ हवा हो जाए.

शायद इसीलिये ठीक इन्ही ऐलानों के वक्त एक बंगाली लड़की 'बेक़रां है बेक़रां' सुनना शुरू करती है. डूबने लगती है उस गाने की रूह में. बेशक यह डूबना ठिठक ठिठक के होता है, बेशक उसे कुछ अलफ़ाज़ के मायने तलाशने होते हैं पर कुछ तो होता है वहाँ जो उसे वहाँ ले जाता है जहाँ शायद तनहा अलफ़ाज़ के मायनों की जरूरत ख़त्म हो जाती है. फिर कुछ अजनबी, अनचीन्हा नहीं रह जाता. वहां शायद डूबने से बचने के लिए साँसों की जरूरत भी नहीं होती.

'बेक़रां' सुनती, समझती उस बंगाली लड़की को देख फिर कहीं कुछ बरसता है, सराबोर कर देता है. मन में कुछ है जो बहुत गहरे तक बहुत अन्दर तक भीग जाता है. इक इनायत होती है जहाँ तस्लीम करने को कुछ समझना नहीं होता, आँखें खुदबखुद तस्लीम में झुक जाती हैं. यहाँ मन नहीं अटकता बस बोल जेहन में अटके रह जाते हैं. और साथ रह जाता है एक यकीन, कि, मुल्क तकसीम हो सकते हैं, रवायतें मर सकती हैं पर कोई जुबानों का क्या कर लेगा? खासतौर पर उन जुबानों का जो अपने वक्तों के हुक्मरानों से टकरा के पैदा हुई हैं. वो जुबानें जिनको न सम्राटों की सरपरस्ती चाहिए थी न सल्तनतों की. वो जुबानें जिनका स्याह सफ़ेद सबकुछ रंगरेजों से, मनिहारों से, किसानों से, जुलाहों से, यानी की मेहनतकश अवाम से पैदा हुआ है.

और इसीलिये ये जुबानें फ़ैल जाती हैं बंगाल से बलूचिस्तान तक, सबकुछ अपने में समेटे हुए. खामोश ऐलान करते हुए कि अवाम की जुबानें कभी नहीं मरतीं, वह हमेशा जिन्दा रहती हैं, हमारे भीतर. और उन्हें समझने को अलफ़ाज़ नहीं अहसास चाहिए होते हैं.