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June 25, 2011

जनलोकपाल बिल है अरब विद्रोहों का असली हल- अन्ना हजारे!

भारत में आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे श्री अन्ना हजारे ने आज अरब देशों में संघर्षरत जनता का क्रांतिकारी अभिवादन करते हुए उनके संघर्षों को समर्थन देने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि वैसे तो वह काफी पहले से ही इन संघर्षों को समर्थन देने के बारे में सोच रहे थे पर अभी तक उनको पता नहीं चल पाया था कि इन संघर्षों के पीछे कौन है. इसीलिये आज जैसे ही उन्हें पता चला कि इन संघर्षों के पीछे 'सोशल मीडिया' से लैस 'सिविल सोसायटी' ही है और इनमे किसी राजनीतिक प्रक्रिया या दल का कोई हस्तक्षेप नहीं है उन्होंने आपात प्रेस कांफ्रेंस बुला कर इन संघर्षों का समर्थन करने का निश्चय किया. कुछ पत्रकारों द्वारा इन संघर्षों में से कुछ में मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे धार्मिक संगठनों की भागीदारी का सवाल उठाये जाने पर श्री हजारे ने कहा कि उनका विरोध सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक प्रक्रिया से है न कि किसी किस्म के धार्मिक अतिवाद से. बात को और स्पष्ट करते हुए उन्होंने इशारा किया कि उनके खुद के आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता राम माधव से लेकर श्री श्री रविशंकर जैसे तमाम धर्मगुरुओं की उपस्तिथि से स्पष्ट है कि दक्षिणपंथी राजनीतिक/धार्मिक समूहों से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि वह तो उनके साथ हमेशा से खड़े रहे हैं.

हालांकि उन्होंने उसी प्रेसवार्ता में यह भी साफ़ कर दिया कि तमाम अरब देशों में हो रहे इन विद्रोहों में जनलोकपाल की मांग के शामिल नहीं होने से वह आहत और स्तब्ध हैं. उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि यह कैसे आन्दोलन हैं जो जनलोकपाल के बिना ही एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर रहे हैं? श्री हजारे ने कहा कि उनको लगा था कि उनके हालिया बयान कि 'भ्रष्टाचार भारत के लिए पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है' के बाद इन जनविद्रोहों के नेता शायद समझ पायेंगे कि उनके देशों में 'भ्रष्टाचार तानाशाही से बड़ा खतरा है' पर अभी तक ऐसा न हो पाने से उन्हें गंभीर निराशा हुई है. इस बात पर आगे रोशनी डालते हुए उन्होंने बताया कि इसी वजह से वह अरब देशों में हो रहे इन विद्रोहों को 'आजादी की लड़ाई न मानकर बस व्यवस्था परिवर्तन (रेजीम चेंज) की लड़ाई मान रहे हैं (यह कहने के ठीक बाद श्री हजारे ने अपनी एक पुरानी प्रेस कांफ्रेंस की तरह ही अपने सर में भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान 'पाकिस्तान द्वारा दी गयी चोटें' दिखाते हुए कहा कि पाकिस्तान का समर्थन करने वाले इन देशों के लिए इतना परिवर्तन भी कम नहीं है).

प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि अभी तक उन्हें यह जानकारी नहीं मिल पायी है कि इन विद्रोहों को कौन प्रायोजित कर रहा है और इसीलिए वह थोड़ा चिंतित हैं. पर उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि निश्चय ही इन देशों के उद्योगपति और कारपोरेशन्स अपनी पूरी ताकत के साथ इन विद्रोहों के पीछे खड़े होंगे, ठीक वैसे ही जैसे उनके आन्दोलन के आयोजकों में जिंदल, और इनफ़ोसिस जैसे बड़े कारपोरेट घराने शामिल थे. समर्थन देने की इस कार्यवाही से एक कदम आगे बढ़ते हुए उन्होंने अरब विद्रोहों के नेताओं को खुला न्योता देते हुए कहा कि अगर वह चाहें तो वह फिक्की से लेकर जिंदल समूह तक से यह आग्रह कर सकते हैं कि वह इन अरब देशों के उद्योगपतियों से बात कर इन जनविद्रोहों की कारपोरेट स्पोंसरशिप की व्यवस्था करें.

प्रेस कांफ्रेंस के आखिर में अन्ना ने बताया कि जन लोकपाल की मांग और कारपोरेट प्रायोजित न होने की वजह से अरब विद्रोहों को उनका अभी का यह समर्थन सशर्त है और इन शर्तों को पूरा न करने की स्तिथि में वह यह समर्थन वापस भी ले सकते हैं.

दिल्ली से हमारे वरिष्ठ संवाददाता ने इस विषय पर कहा की अन्ना हजारे तो वैसे भी सशर्त समर्थनों के लिए जाने जाते रहे हैं और पिछले दिनों में उनके द्वारा किये गए तमाम समर्थनों के साथ कोई न कोई शर्त कारपोरेट कंपनियों द्वारा अपने उत्पादों के साथ दिए जाने वाले मुफ्त उपहारों की तरह चिपकी पायी गयी है. उन्होंने याद दिलाया कि श्री हजारे ने दूसरी आजादी की लड़ाई की पहली किश्त के ख़त्म होते ही नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के ग्रामीण विकास के 'मॉडल' की तारीफ़ करने के एक हफ्ते के अन्दर ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका वह समर्थन भी सशर्त था और वह सिर्फ ग्रामीण विकास की तारीफ़ कर रहे थे न कि साम्प्रदायिक असहिष्णुता की. उसके बाद बाबा रामदेव के आन्दोलन पर हुए 'बर्बर' हमले की निंदा करते हुए भी 'टीम अन्ना' ने स्पष्ट किया था कि बाबा को उनका समर्थन सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष पर तक सीमित है और वह बाबा के मंच पर साध्वी ऋतंभरा जैसे 'साम्प्रदायिक' लोगों की उपस्थिति के साथ नहीं हैं.

जैसी की उम्मीद थी श्री हजारे की इस प्रेस कांफ्रेंस के तुरंत बाद प्रतिक्रियायों की बाढ़ आनी शुरू हो गयी है. 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' ने फेसबुक पर स्टेटस मैसेज अपडेट करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में अरब देशों की जनता का समर्थन मिलने की उम्मीद जाहिर की है. हमारे संवाददाता इस विषय पर कोंग्रेस नेताओं के साथ साथ, अरब देशों के तानशाहों और अमेरिकन राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा की प्रतिक्रिया लेने की लगातार कोशिश कर रहे हैं, उपलब्ध होते ही हम आपको सूचित करेंगे.

(श्री हजारे की यह प्रेस कांफ्रेंस बस उतनी ही सच है जितना कि यह कि श्री हजारे भारत की आम जनता के नेता हैं).

5 comments :

  1. अच्छा लगा आपकी सक्रियता. खास कर अपेक्षाकृत जल्दी आयी आपकी टिप्पणी. अन्ना साहब के सरोकार पर किसी को सन्देह नहीं है लेकिन उनके साथ कुछ हायली प्रोफेशनल लोग जुड गए हैं उन पर हमें शुरू से ही संदेह है.जैसे 'गलती' से गुजरात की तारीफ़ कर दिए जाने से हुए क्षति को पाटने के लिए अन्ना को तुरत गुजरात दौड़ा दिया गया. दारू बहुत बेचने के लिए मोदी जी की आलोचना भी करा दिया गया. हा हा हा ...उसी तरह शायद यहां अधर्म-सापेक्ष दिखाने के फिराक में उनसे ये बयान दिलाया गया होगा अन्यथा मुझे नहीं लगता है कि अन्ना को अरब देशों के बारे में ज्यादे कुछ जानकारी होगा. कम से कम इतना तो नहीं ही कि उसके लिए उन्हें तुरत प्रेस वार्ता लेनी पड़े...खैर.
    पंकज झा.

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  2. lokpaal bill ke pass hote hi bharat se sara corruption america chala jayega,,,,parantu aik chinta jo mujhe sata rahi hai ki wo ye hai ki bill pass hone ke baad ANNA BECHARE to berozgaar ho jayeenge,,wai bhi unke jan andolan ka adha credit Ramdev ji le ja chuke hai jinhone aapna intejaam pahle se kar liya hai.............dusri baat ki arab vidrohiyo ko bhi DD NEWS dekna chahiye aur andolan ke khatam hote lokpaal pe vichar karna chahiye......(afroz khan)

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  3. अच्छा व्यंग्य है.पर कहीं कहीं काफी अन-रियलिस्टिक प्रस्तुति लगी जैसे, अन्ना जैसे कूप-मंडूक (क्षेत्रवादियों के लिए और कोई प्यारा शब्द नही मिलता मुझे) को विश्व के अन्य देशों में चल रहे उठा पटक की जानकारी होगी और वो प्रेस के प्रतिप्रश्नों का उत्तर अपने पोलिसी-मेंटर अरविन्द केजरीवाल की अनुपस्थिति में दे रहे होंगे,ये बातें जमती नहीं.
    परन्तु बाकी सारी पंक्तियाँ मजेदार लगीं.अरब देशों में 'एक तानाशाह' को हटाकर 'दूसरा लोकपाल' लाने का समर्थन अन्ना जैसा व्यक्ति ही कर सकता है.

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  4. प्रिय वनमानुष--
    शुक्रिया. व्यंग में यह बिलकुल पहली कोशिश थी तो आप की टिप्पणी आगे प्रयास करने के लिए उत्साह बढाती है. बाकी व्यंग ऐसी विधा है जहाँ आप थोड़ी स्वतंत्रता लेते ही हैं, जैसे की यह कि अन्ना हजारे तानाशाही का अर्थ जानते होंगे, जबकि रालेगन सिद्धि में वह जो करते हैं वह तानाशाही से कम नहीं है. (उस पर एक बहुत अच्छा लेख है, Making of Anna Hazare, कभी वक्त मिले तो देखिएगा)
    बस इसीलिए थोड़ी स्वतंत्रता ले ली.. आगे से और ख्याल रखूँगा. हाँ, साथी लेख पढने/पसंद करने और यहाँ तक कि इस पर टिप्पणी करने का समय निकालने के लिए धन्यवाद.. आगे भी राय देते रहें, आभारी रहूँगा..

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