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June 23, 2011

सिविल सोसायटी के काफिलों की राहों में फारबिसगंज नाम का कोई क़स्बा नहीं पड़ता!

[रविवार में प्रकाशित]

फारबिसगंज! विकास की अंधी दौड़ में सरपट भाग रहे इंडिया से पीछे छूट गए हिन्दुस्तान का एक क़स्बा. इस फारबिसगंज की नियति भी हिन्दुस्तान के तमाम और गाँवों, कस्बों के जैसी ही है, न होने जैसे होने के साथ जीने की नियति. फारबिसगंज भी राही मासूम रज़ा के गंगौली जैसा एक गाँव है जिससे होकर जिन्दगी के काफिले नहीं गुजरते.

इन तमाम जगहों की नियति में कभी भी अच्छे कारणों से चर्चा में न आने का अभिशाप भी जुड़ा होता है. मुफस्सिल हिन्दुस्तान की मिर्चपुर, झज्झर, चकवाड़ा, दुलीना जैसी सारी जगहें चर्चा में बस तब आती हैं जब इनके साथ होने वाली रोज की क्रूरता भी सारी हदें पार कर जाए. जैसे की 3 जून 2011 की उस दोपहर फारबिसगंज में हुआ, जब अपने हक़ के लिए, अपने गाँव तक पंहुचने के अपने रास्ते को एक निजी कंपनी से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे इस कस्बे के 4 बाशिंदे पुलिसिया गोलियों से मारे गए.

फारबिसगंज में चली गोलियों की आवाजें दिल्ली तक तब पंहुचीं थीं, जब इलेक्ट्रोनिक मीडिया के मुताबिक़ सारा देश बाबा रामदेव के अनशन और आन्दोलन के बीच के किसी आयोजन पर हुए 'बर्बर' पुलिसिया दमन से बेहद आहत और स्तब्ध था. अब पता नहीं इस 'देश' में मणिपुर, कश्मीर और छत्तीसगढ़ जैसे 'अशांत' क्षेत्रों में लगभग रोज पुलिसिया दमन की शिकार होने वाली जनता शामिल थी कि नही, पता नहीं पुलिसिया मुठभेड़ों के मामले में शीर्ष पर विराजमान आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की जनता को दिल्ली पुलिस के इस 'कारनामे' में कुछ नया दिखा था या नहीं, पर कुछ लोग सचमुच बहुत दुखी थे. उन्हें आपातकाल याद आ रहा था, नितिन गडकरी जैसे कुछ महान 'लोकतंत्रवादियों' ने तो जून के महीने में भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर लगे उस कांग्रेसी कलंक से जून के महीने में ही हुए इस हमले की तुकबंदी भी शुरू कर दी थी.

पर गुजरात से लेकर उड़ीसा तक अपनी महान लोकतांत्रिक परंपरा के झंडे गाड़ आये गडकरियों और आडवाणियों से अलग सिविल सोसायटी उर्फ़ 'सभ्य समाज' के कुछ रहनुमा भी 'हमले' पर क्रोध और विक्षोभ में दुहरे हुए जा रहे थे. इस सभ्य समाज के एक प्रतिनिधि प्रशांत भूषण को बाबा रामदेव पर हुआ हमला 'लोकतंत्र की हत्या' से कुछ कम नजर नहीं आ रहा था, जबकि इस सिविल सोसायटी के आज के दौर के सबसे बड़े नेता अन्ना हजारे को इसमें 'गोलियों वाले हिस्से को छोड़कर जलियांवाला बाग़ हत्याकांड' याद आ रहा था.

उनका दुःख, गुस्सा और विक्षोभ सब कुछ जायज था. एक मैदान में रात के तीसरे पहर शांतिपूर्ण ढंग से सो रहे पचास हज़ार से ज्यादा लोगों पर इस तरीके का बर्बर हमला न केवल निंदनीय वरन किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए असहनीय भी है. पर फिर भी एक दिक्कत तो थी, यह कि फारबिसगंज से बिलकुल अलग बाबा रामदेव के आन्दोलन पर टूटे इस सरकारी कहर में भी पुलिस ने इतना संयम बरता था कि इस हमले में न किसी की जान गयी और न एक महिला के अलावा कोई भी गंभीर रूप से घायल हुआ. (बावजूद इसके की इससे पुलिसिया बर्बरता की न तो तीव्रता कम होती है न उसकी मंशा, पुलिसिया बर्बरता पर लगातार लिखता भी रहा हूँ पर यहाँ सवाल 'असभ्य और औपनिवेशिक चरित्र वाली पुलिस' का नहीं बल्कि लोकतंत्र के नए पहरुओं यानी कि 'सिविल सोसायटी' और इसके नेताओं का है).

मतलब यह कि फारबिसगंज की तुलना में देखें तो यह हमला 'गांधीवादी अहिंसा के पुलिसिया पाठ' जैसा कुछ लगेगा उससे ज्यादा कुछ नहीं. और फिर भी 'सिविल सोसायटी' के इन रहनुमाओं को फारबिसगंज पर कुछ भी बोलना गवारा नहीं हुआ. वह भी तब, जब फारबिसगंज हत्याकांड बाबा पर हुए 'हमले' के 24 घंटे से भी ज्यादा पहले घटित हो चुका था.

कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो भट्टा पारसौल में हुए प्रशासनिक तांडव पर भी सिविल सोसायटी के इन नेताओं की खामोशी इतनी ही गहरी थी. पर इस खामोशी के कुछ तो कारण होंगे! फारबिसगंज पर तो फिर भी नीतीश कुमार को (नरेन्द्र मोदी के साथ) 'सुशासन' का प्रमाणपत्र दे चुके अन्ना हजारे का चुप रहना समझ आ सकता है पर फिर भट्टा पारसौल को कैसे समझा जाए? (यह समझना थोडा आसान हो सकता है अगर हम याद करें कि इस 'सिविल सोसायटी' के कई रहनुमाओं को बिलकुल ठीक, पारदर्शी और ईमानदार प्रक्रिया के तहत मिले फ़ार्म हाउस उत्तर प्रदेश की सीमा में आते हैं, और वह फ़ार्म हाउस भी तो किसानों की ही जमीन लेकर बने होंगे!) पर तमाम आसानी के बावजूद यह छोटा सा तथ्य खामोशी की तफसील तक नहीं ले जाता.

पर सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध आखिरी-सी जंग लड़ रहे 'सिविल सोसायटी' के इन रहनुमाओं के लिए हर मुद्दे पर बोलना क्यों जरूरी है, आखिर को उनका आन्दोलन 'मुद्दा आधारित' आन्दोलन है. पर यह सफाई तब नाकाफी हो जाती है जब हम गौर करते हैं कि खुद अन्ना हजारे के शब्दों में यह लड़ाई भारत की 'दूसरी आजादी' की लड़ाई से कुछ कम नहीं है. और फिर दूसरी आजादी की कोई लड़ाई गरीबों, मजलूमों, किसानों, दलितों और तमाम अन्य वंचित अस्मिताओं की आकांक्षाओं को, मुक्ति के उनके सपनों को साथ लिए बिना पूरी नहीं हो सकती.

यहाँ से देखें तो भूमि अधिग्रहण के, भुखमरी के, बंद होती मिलों के, बेराजगार होते मजदूरों के तमाम सवालों पर 'सिविल सोसायटी' की चुप्पी की वजहें साफ़ दिखने लगती हैं. यह, कि इस सिविल सोसायटी के विकास की दृष्टि भी विकास के सरकारी नजरिये से कुछ ख़ास अलग नहीं है. यह कि इस तथाकथित 'सिविल सोसायटी' को टीना (There is no alternative उर्फ़ कोई विकल्प बाकी नहीं बचा है) का तर्क समझ में आता है और वह यह मानने लगी है कि आर्थिक विकास का रास्ता ही सब कुछ ठीक कर देगा. सिविल सोसायटी के स्वयंभू नेताओं की तो बात ही छोड़िये, शीर्ष से आधार की और विकास के टपकने (trickle down) के सिद्धांत से सहमत हुए बिना कोई भी ईमानदार नागरिक इतने बुनियादी सवालों पर चुप रह नहीं सकता.

बात साफ़ है, बाबा रामदेव के आन्दोलन पर हुई 'बर्बर' पुलिस कार्यवाही की निंदा करते हुए भी फारबिसगंज पर सिर्फ वही लोग चुप रह सकते हैं, जिनके 'इण्डिया' में फारबिसगंज और उसके सरोकार शामिल नहीं हैं. और इसीलिये सबसे दिलचस्प हो जाता है यह देखना कि इस तथाकथित सभ्य समाज के रहनुमाओं को प्रायोजित करने वाले और फारबिसगंज में गोली चलाने वाले लोग एक ही हैं, कम से कम एक ही वर्ग, यानी की उद्योगपतियों के वर्ग से हैं. फारबिसगंज में आन्दोलनकारियों के सीने के ऊपर गोली मारने वाली पुलिस स्थानीय फैक्ट्री मालिकान, और भाजपा नेता अग्रवालों के इशारे पर काम कर रही थी, और इन्ही फैक्ट्री मालिकानों के आला संगठन फिक्की से शुरू करके देश के सबसे बड़े निजी उद्योग घरानों में से एक जिंदल समूह, और अन्य कई पूंजीपति भ्रष्टाचार के विरुद्ध 'देश की दूसरी आजादी' की लड़ाई को प्रायोजित कर रहे थे. अब शायद और भी परतें खुल रही होंगी कि अन्ना हजारे और उनके प्रतिनिधियों वाली यह सिविल सोसायटी सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़ कर बोलते हुए भी उस भ्रष्टाचार के असली लुटेरे पूंजीपतियों के खिलाफ क्यों कर चुप रहती है?

ध्यान दीजिये कि अभी-अभी सामने आये कृष्णा गोदावरी बेसिन गैस घोटाले, जिसमे रिलायंस समूह के मालिक मुकेश अम्बानी का नाम आ रहा है, के बारे में सिविल सोसायटी के इन रहनुमाओं ने अपने होंठ सिल रखे हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपने चार दिनी अनशन के दौरान राडिया काण्ड में शामिल बरखा दत्तों को देखना यह लोग भूल गए थे. ध्यान दीजिये कि लगभग हर साल सरकारी बैंकों द्वारा टाटा, बिड़ला और अम्बानी घरानों जैसे बड़े पूंजीपतियों को 'ईमानदार और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत' दी जाने वाली 88000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की कर्ज माफी इस सिविल सोसायटी और इसके आकाओं के लिए कोई मुद्दा नहीं बनती. और फिर इन्ही रहनुमाओं को इसी दिल्ली शहर में मारुती उद्योग के मजदूरों की अपनी ट्रेड युनियन बनाने की कोशिश कर रहे मजदूरों का उत्पीडन करती पुलिस नहीं दिखती, इन्हें रायपुर में सरकार द्वारा घर तोड़े जाने का विरोध करती औरतों पर बरसती लाठियां नहीं दिखतीं, इन्हें चंदौली में अपनी जमीन के अधिग्रहण का विरोध करते हुए सामूहिक आत्महत्या का निर्णय ले लेने वाले किसान नहीं दिखते.

पर इस सिविल सोसायटी को तो इरोम शर्मीला भी नहीं दिखीं. इन्हें तो अन्ना हजारे के ही महाराष्ट्र में बीते एक दशक में आत्महत्या करने वाले लाखों किसान नहीं दिखे. इन्हें मिर्चपुर, दुलीना, गोहाना में जलाए जाते दलितों के घर नहीं दिखे. फिर इन्हें फारबिसगंज क्या दीखता? इनका लोकतंत्र रामलीला मैदान की रामदेव लीलाओं में बसता है, उन लीलाओं में जहाँ साध्वी ऋतंभरा जैसे महान 'गांधीवादी' और अल्पसंख्यक हितों के रक्षक मंचासीन होते हैं. आप अभी भी इण्डिया अगेंस्ट करप्शन के द्वारा लगातार भेजे जा रहे सन्देश देखिये, उनमे रामलीला मैदान है, फारबिसगंज नहीं है.

और फिर शायद हम सब समझ पायेंगे कि भूमिसुधार जैसे आमूलचूल परिवर्तनों को केंद्र में रखे बिना सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार को दूर कर भारत को हासिल दूसरी आजादी से भी भारत के आम नागरिक वैसे ही जलावतन रहेंगे जैसे कि पहली में थे. यह भी कि समावेशी भारत बनाने की कोई भी लड़ाई दिल्ली से नहीं फारबिसगंज से ही शुरू हो सकती है, उसी फारबिसगंज से जहाँ से सिविल सोसायटी के काफिले आज भी नहीं गुजरते.

14 comments :

  1. I think we are over intellectuals, criticism is good but somehow over criticism can a kill a movement. No doubt, every concerned citizen if one think of himshelf as a just human will be against this barbaric act. Some how my concept of "Civil Society" extends to both who are against Ramleela and Farbishganj incident. Those who feel their is a democracy in India can only support these incident. But it will overcrticism if I ask to you where are you when people are just thrown away from train by a police. There are thousands of these cases in our so called democracy. For sure as a Human has not multiple hands,brains one can fight for few issues and no doubt corruption is an important issues but not the single one. If I am utilizing my energy for a issue, then you should not ask that where I am at other issues. Then I can also ask to you about 1000 of cases and ask you to take a stand.

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  2. and ultimaely it will be "We the people" who are going to suffer together and collectively.

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  3. Dear Manish, It's not about I am expecting everyone or anyone to speak on anything/everything. But then, TEAM ANNA is not just a group of some individuals!
    This group is unashamedly calling itself the voice of India and is asserting that it is fighting the second struggle of Indian independence!
    And yet, they keep silent on POSCO, Forbisganj, Lakhimpur, in short any and every matter of importance for average Indian citizen. This is what makes me feel sick towards them..

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  4. samar bhai
    farbisganj me jo hua galat hua aur use shayad hi koi sahi thahara sake.is mamle me aap bilkul theek hain. lekin jis tareeke ka sheershak apne apne lekh ka diya hai meri apatti us tareeke ko le kar hai.
    kai baar sahi tark aur baat galat uddeshya se kee jati hai.apki baat bilkul waise hi hai.duniya me aisa kaun sa admi hoga jo har mudda uthane ki kubbat rakhta hoga?kya aap aisa kar sakne ka dam bhar sakte hain? mai kah sakta hu ki apke lekh me apke ghar ke bilkul bagal ki ghatna ka ullekh nahi hai.abhi kuchh dino pahle mau nath bhanjan me police ne ek khomche wale ko sirf is liye maar maar k adhmara kar diya kyonki usne lai-chane k paise maang liye the.uski ek aankh fut gayi hai lekin uske liye ladne wale na aap hain aur na mai.kyon ki media ex poser nahi hai.bhai ek aur mudda pakistan ka bhi hai jahan peshawar me police ke ek sipahi ne media ke samne ek ladki ke sath rape kiya.
    mudde aur bhi hain.famous hona hai to alag alag kism ke mudde uthate rahiye.sabse mahatwapurn baat yahi ho sakti hai ki ham jahan bhi hain aur jo bhi galat baat aankhon ke samne se gujre ham iska virodh karein.dusron ko ye na batayein ki usne kaun sa mudda chhod diya.

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  5. आनंद जी
    आपने भी लगभग वही सवाल उठाया है जो इसके ठीक पहले मनीष जी ने पूछा था. फारबिसगंज में जो हुआ, लखीमपुर खीरी में, भट्टा पारसौल में, दुलीना में, मिर्चपुर, मऊनाथ भंजन में. और ऐसी तमाम जगहों में जो खबर तक नहीं बनीं, बहुत गलत हुआ इस बात पर किसी की कोई आपत्ति नहीं है. हो भी नहीं सकती. अब आयें आपकी दूसरी बात पर की हर कोई हर विषय पर नहीं बोल सकता.
    पर अन्ना हजारे और उनकी टीम कोई आम टीम नहीं है. यह सिविल सोसायटी के स्वयंभू नेताओं की टीम है जो अपने आन्दोलन को दूसरी आजादी की लड़ाई बता रही है. अब इतने बड़े दावों पर तो सवाल लाजमी बनते हैं न?
    आगे भी देखें, इसी लेख में यह सवाल भी है की अभी सामने आये कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस घोटाले जिसमे कथित रूप से रिलायंस और मुकेश अम्बानी शामिल हैं, उस पर भी यह 'टीम अन्ना' चुप है? क्यों भाई? यह मुद्दा तो भ्रष्टाचार का ही है?
    मेरे सवाल इसीलिये इस टीम की चुनिन्दा खामोशियों और चुनिन्दा शोर पर है..बहुत साफ़ नजर आ रहा है की इस टीम के असली इरादे क्या हैं..
    आखिर में, प्रसिद्धि ऐसे लोगों के साथ खड़े होकर मिलती है आनंद भाई, इनके खिलाफ होकर नहीं, इनके खिलाफ होने पर तो अपने दोस्त भी आपको उस कांग्रेस का साथी बताना शुरू आकर देते हैं जिसके खिलाफ आप सारी जिन्दगी लड़ते रहे हैं!
    पर फिर, कुछ लोगों को तो अपनी चेतना बचाकर उसे हथियार बना कर आन्दोलनों को हडपने की नियत वाले इन स्वयंभू मसीहाओं के असली चरित्र की तरफ इशारा करना ही होगा.. मुझे उनमे से ही एक मानें!

    सादर

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  6. आपने जितनी गिनाई है, उसमे कल गुवाहाटी में हुई घटना और जोड़ लीजिए, ३ लाशें वहाँ भी गिर गई हैं... इसके बारे में न तो कोई सोचने वाला है न समाधान ढूँढने वाला...
    ये समस्याएं भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करने से ही दूर होंगी, जिसका अन्ना से दूर-दूर का वास्ता नहीं है.

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  7. कृष्णा-गोदावरी बेसिन गैस घोटाले?
    ये घोटाला नहीं है भाई. जब कोई कानून टूटता है, तब घोटाला होता है... घोटाला, भ्रष्टाचार तो रिक्शा वाला, ऑटो वाला, किराने वाला, पान वाला करता है. जो ड्राइविंग लाइसेंस बनवाता है वो करता है... जो क़ानून और संविधान से ऊपर हो, उसपर कैसे आरोप?
    ये नमूना भी देख लीजिए, प्रोजेक्ट पास करने के लिए क़ानून ही बदल दिया जाएगा.. अगले महीने पास होने वाला है. कैसे होगा घोटाला? इसमें मुकेश साब ने नियमों को ताख पर रखकर परियोजना के लिए मंजूरी मागी थी, अब आखिर में मिलने वाली है..
    he government is set to give its final go-ahead to the Navi Mumbai Special Economic Zone (SEZ) by the middle of next month.

    After a formal approval to the project, the construction of this SEZ had been stalled for over four years since it failed to comply with the contiguity norms of the SEZ policy.
    The go-ahead would be given at the upcoming meeting of the commerce ministry’s Board of Approval (BoA), chaired by Commerce Secretary Rahul Khullar.

    At the meeting, likely to take place on July 15, the panel constituted to examine the issue was expected to grant its final approval and allow the units present there to operate, commerce ministry officials told Business Standard.

    The panel had representatives from the Commerce Department, Department of Revenue, Department of Economic Affairs, Central Board Of Excise and Customs (CBEC) and Central Board of Direct Taxes (CBDT). The team visited the site last week for a final examination.

    Navi Mumbai SEZ (NMSEZ) Pvt Ltd, promoted by Mukesh Ambani Ambani and his associate Anand Jain, had proposed splitting the 1,233-hectare multi-product SEZ into five separate SEZs after it failed to comply with the contiguity rules.

    “This would save our cost estimates by as much as Rs 100-150 crore. Earlier, if we were to keep it as one composite zone and build flyovers or underpasses, we would have incurred a total cost of around Rs 400 crore. So, this proposal was much more cost-efficient. Besides, it is not feasible for anymore to maintain a huge SEZ, as the concept has lost the exuberance,” said a senior NMSEZ official who refused to be named.

    The official, however, also said that even after the final approval it would take the company at least a year to start operations. Since the company had proposed to split the SEZ into five zones, there would now be a multi-product SEZ, a light engineering SEZ, two ITeS SEZs and a warehousing zone, the official said.

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  8. इस तरह का ये देश का इकलौता सेज होगा... विभागों को डर था कि इसमें कर की चोरी होगी, तस्करी को बढ़ावा मिलेगा. आखिर में वित्त मंत्रालय ने आश्वासन दिया कि ऐसा कुछ नहीं होगा...

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  9. सत्येन्द्र जी..
    आपने असहमति की कोई जगह ही नहीं छोड़ी है.. इसीलिए आप जो कह रहें हैं उन सब बातों से पूरी सहमति है..
    बस यह कि इस देश के तमाम सेज बस ऐसे ही हैं.. जरा जरा से अंतर के साथ..

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  10. apka bahut dhanyawad jo anna ki sacchayi sabke samne laye,,,,hum bhartiya kab samjhe ki humare liye kya theek hai aur kya sahi.....jane kab tak bhed chal chalte rahenge...koi bhi anna jaisa gadariya ayenga aur sab ek hi bina dimag wali bhedon ki tarah galat disha mein chalte rahenge aur jo sahi marg hai kab ka peeche choot jayenga aur is baat ka punjipati humesha fyada uthate rahenge....

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  11. Samar Bhai please see one more heinous act of police I got to know through 'Tehelka'. i didn't find this news in mainstream media and I'm sure the so called self declared "civil society members" would not open his mouth on this barbaric act.
    "Beat a man to death. Then jump on him. That’s what these cops did in Bihar
    There is chilling video evidence of how Mustafa was killed. And photographs of three other villagers brutally murdered."
    Here is the link:
    http://www.tehelka.com/story_main50.asp?filename=Ne020711Beat.asp

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  12. समर जी,
    आपने बहुत सही मुद्दा उठाया है.फारबिसगंज के मुद्दे पर मनीष शांडिल्य द्वारा लिखी गयी रिपोर्ट पढ़ के और फिर उसका विडियो देखकर दिल दहल गया.कैमरे के सामने अगर देश के अल्पसंख्यकों के साथ हमारी पुलिस अगर इतनी अमानवीय हो सकती है तो जाने देश के दूसरे कोनों में दलितों आदिवासियों का क्या हश्र करती होगी.
    दिलीप मंडल जी के लेख ने बिहार मीडिया की फारबिसगंज मुद्दे पर कलई खोल के रख दी.
    दिल्ली के रामलीला मैदान के जो हुआ (पुलिस ने लाठीचार्ज किया या नही वो तो सुप्रीम कोर्ट ही बताएगी) को जलिया वाला बाग़,लोकतंत्र का काला दिन बताने वाले लोग फारबिसगंज पर मुंह में दही जमाये बैठे हैं.इस लेख के द्वारा आपने उनकी जो असलियत उजागर की है उसके लिए धन्यवाद.

    मनीष जी की रिपोर्ट
    http://mohallalive.com/2011/06/14/fraudism-of-sushasan-in-bihar-in-the-context-of-forbisganj-firing/

    दिलीप जी का लेख
    http://mohallalive.com/2011/06/13/dilip-mandal-react-on-farbisganj-syndrom-in-bihar-media/

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  13. दोस्त, आलोचना इस दुनिया का सबसे आसान काम है. आपका दुख है कि अन्ना और उनकी टीम स्वयंभू वॉईस ऑफ इंडिया बनने की कोशिश कर रहे हैं, तो फिर वे दूसरे नेताओं की तरह हर टॉपिक पर मुंह क्यों नहीं मार रहे हैं.
    कृपया ध्यान से देखें तो आपको नजर आयेगा कि टीम अन्ना के सदस्य टीका टिप्पणी से दूर होकर अपना कार्य करने में विश्वास रखते हैं. शायद इसलिये ही आज वे पूरे देश में समर्थन जुटा पाये हैं. बाकी मुद्दों पर रोने के लिये हमारे नेता ही काफी हैं.
    बाबा रामदेव जैसे ड्रामेबाजी से दूर रहकर अन्ना आज नवें दिन भूखे यदि रामलीला मैदान में बैठे हैं तो हमें उन पर गर्व होना चाहिये और उनके साथ खड़े होकर भ्रष्टाचार की इस लड़ाई में शामिल होना चाहिये.

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  14. http://musings.anandjain.com/post/9325775467/jan-lokpal-bill-one-step-ahead-for-the-indian-society

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