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June 20, 2011

अपनी अपनी पितृसत्ताओं की सुरक्षित कैदों में


[20 जून २०११ को 'पितृसत्ताओं की सुरक्षित कैदों में' शीर्षक से जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित]


उत्तर भारत में शादियों के इस मौसम में आज अचानक फिल्म गंगा जमुना सरस्वती का यह गाना साजन मेरा उस पार है मिलने को दिल बेकरार है पहले जेहन में और फिर यूट्यूब पर सामने आया और मन करीब १८ साल पीछे अपने गाँव लौट गया. गाँव में एक शादी थी, किस चाचा की नहीं याद पर शादी के पहले हुई गरमागरम बहसें स्मृतिपटल पर दर्ज हो गयी किसी तस्वीर की तरह बिलकुल ठीक ठीक याद हैं. खाने में क्या क्या बनेगा, तिलक चढाने जितने लोग आयेंगे उसके दस गुना बाराती जायेंगे से लेकर बारात में बंदूकें कितनी जायेंगी. आज भी समझ नहीं आता कि शादी-ब्याह जैसे सामाजिक अवसर पर बंदूकों को इतनी इज्जत क्यूँ दी जाती थी कि निगाहें बंदूकधारियों पर नहीं वरन बंदूकों पर टिकती थी. याद तो खैर और भी बहुत कुछ है, जैसे बाबा लोगों (उन दिनों परिवार ज्यादातर संयुक्त होते थे और इसीलिये सारे रिश्ते बहुवचन में) के द्वारा बताया जाना कि 'उ बारात ससुर कौन बारात है जेहमा इतना गर्दा ना उड़े कि घरातियन (वधूपक्ष) का देखाब बंद ना होई जाय' या कि चाचा लोगों को याद दिलाना कि घरातियन अगर एक गोली दगीहैं तौ जवाब मा कमसेकम १० दगिहा, हल्लुक नै पड़ेका चाही'. जैसे कि मसला शादी का ना होकर दंगल का हो.

पर सबसे जरूरी बात आयी सबसे आखिर में.. दादा ने पूछा था ' रंडी कै नाच कौन चले हो'! रंडी माने एक गाली जो सामंती भाषा में तवायफों, माने जीती जाती औरतों के लिए प्रयोग की जाती है. बारात के साथ उनका चलना और 'शुभ' अवसरों पर उनका नृत्य करना शान समझा जाता था. आज भी भौहें उठाये हुए बड़े बाबा का चेहरा बिलकुल साफ़ याद है.. 'बयाना बट्टा जल्दी दैदा बढ़िया रंडी का नाच ना होए ता इज्जत मिटटी में मिल जाए'. ये कैसी इज्जत थी जो अपने घर की महिलाओं को कड़े परदे के भीतर रखने को सांस्कृतिक अस्मिता का सबसे बड़ा प्रतीकचिन्ह मानने वाले समाज में एक विवश महिला को उसी समाज में सबके सामने नाचने पर मजबूर करके बढ़ती थी. (मसला नृत्य का नहीं, नृत्य करने के चुनाव की आजादी का था).

अब सोचता हूँ तो याद आता है दादी भी पीछे पड़ीं थी की नहीं होना ही चाहिए, 'इज्जत हईहै शगुनौ होत है'. शायद एक सामंती समाज की मूल्यचेतना ही एक बेबस महिला के नृत्य को इज्जत और शुभ शगुन से जोड़ सकती है. और दादियाँ भी? स्त्रीजाति के सामूहिक अपमान पर टिकी दादा लोगों की यह इज्जत दादियों की इज्जत कैसे बन जाती थी. पितृसत्तात्मक मूल्यों का ऐसा सघन आंतरीकरण ऐसा आसान तो नहीं होगा. कितनी सदियाँ लगी होंगी दादियों को दादा जैसे सोचना सिखाने में. खैर इस पर विस्तार से कभी और, विषय पर लौटते हुए, शादी हुई. रंडी भी आई. उस दौर में और उनके साथ शुरू हुआ लोगों का शगल. वही लोग जो पास आने पर घटिया मजाक और घटिया बातें करते हुए भी उनको 'बाईजी' कहकर संबोधित करते दो कदम दूर जाते ही अश्लीलता की उल्टी करने लगते. साजन मेरा उस पार है गाने पर नाच रही 'बाईजी' पर नजर पड़ते ही दुनिया का सारा संभव घटियापन उनके चेहरों पर उतर आता और आँखों में वह चमक उठती कि चमक से नफरत हो जाए. पर मर्दों के इशारे छोड़ ही दें, वो तो होते ही हैं हर समाज में.

जो बात ज्यादा खटकी थी वह थी घर की स्त्रियों का व्यवहार. घर की अपेक्षाकृत युवा स्त्रियाँ चाहे चाची हों या बुआ, बाईजी के पास जाने से बचने की पूरी कोशिश करतीं पर फिर चाची लोग एक एक कर बुलातीं और बाईजी को बुआ बुलाने को कहतीं. इसके उलट बुआयें बुलातीं और बाईजी को मौसी बुलाने को कहती. तब नहीं समझ आयी थी पर बात सीधी थी कि एक घनघोर पितृसत्तात्मक समाज में बाईजी होना बुरा होना था, और इस बुराई को चाचियाँ बुआ कहलाकर अपने पतियों के परिवार पर थोपना चाहती थीं जबकि बुआयें मौसी कहलाकर चाचियों के मायके से. आज सोचता हूँ कि उनमे से किसी ने बाईजी से पूछा होगा कि वह क्या कहलाना चाहती हैं या कुछ भी कहलाना चाहती हैं या नहीं? या यह कि वह नाचना चाहती भी हैं या नहीं. आज इतने दिन बाद पीछे मुड़कर सोचता हूँ कि अगर बाईजी ने घर की किसी स्त्री से कहा होता कि मैं नहीं नाचना चाहती मुझे बचा लो तो क्या कोई स्त्री उनके साथ खड़ी होती?

अब लगता है कि इन जैसे बहुत थोड़े से अवसरों पर आमने सामने पड़ जाने के बाद दोनों तरफ की स्त्रियाँ क्या सोचती रही होंगी, या क्या कुछ भी सोचती रही होंगी? बाईजी की असुरक्षित ही सही आजादी को देख क्या परदे के भीतर खड़ी सुरक्षित पर गुलाम स्त्रियों के मन में कोई सपने जागते रहे होंगे? और बाईजी क्या सोचती रही होंगी? स्त्री की गुलामी के रूमानीकरण से पैदा हुई विवाहसंस्था और उसके दमघोंटू रिश्तों को देख क्या उनके मन में कोई चाहत उठी होगी? क्या कभी उन्होंने अपनी जिन्दगी से कहीं बहुत दूर भागकर इस वाली जिन्दगी में लौट आने के सपने देखे होंगे?

या फिर दोनों तरफ की स्त्रियाँ एक दूसरे को देखकर नजरें बचाने की कोशिश करती चुपचाप खड़ी रही होंगी, अपनी अपनी पितृसत्ताओं की सुरक्षित कैदों में

11 comments :

  1. अद्भुत ...कोई टिप्पणी नहीं...शब्द नहीं अपने पास....लेकिन एक-एक हर्फ़ से सहमत.
    पंकज झा.

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  2. जबरदस्त लिखा है समर...इसे और विस्तार दिए जाने की ज़रूरत है.

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  3. बहुत अच्छा आलेख है। अपने आस-पड़ोस की हालातों को सजीव चित्रण। लेकिन भाई इस आलेख के लिए आपका ग्रामीण परिवेश का होना जरुरी है अच्छा लगा भाई.. बहुत दिनों बाद फिर से कुछ लिखा है...

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  4. Shat pratishat haqiqat hai. Samarji Inqlab to kafi padh sun liye hum, ab kuch ishq k bare mein bhi sunaiye......

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  5. Samar Bhai, bilkul sahi likha hai aapne.
    Mujhe to lagta hai dono taraf ki auraton me koi bahut antar nahi hai.
    ek taraf ki aurat ko poora samaj apni property samjhata hai wahi doosri taraf ki aurat ko uska pati jo ki usko ek jhhoothe sanskar ke bandhan me bandhkar...

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  6. indisputably an impeccable approach

    santosh singh

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  7. अभी पढ़ा आपका लेख. अपने परिवार का ही दृष्टान्त देते हुए आपने इस अपसंस्कृति को जिस तरह आड़े हाथो लिया.. बहुत अच्छा लगा. लेख के अंत में जो प्रश्न उभरे हैं... सोलह आने सच हैं. क्या कभी उत्तर मिला कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की स्वतंत्रता और बंधन पर वास्तव में क्या सोचते हैं.

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  8. Bhaiya Ji ( Age Me Aapse Chota Hun Issliye ) Aapki,aap biti padha maine aur padh ke ek bahut bada message mila usi ke bare me jaha se ham hai . ( samaj se ) , mujhe hi nahi waran iss lekh ko padhne wale sabhi ko aur bahut accha laga ki koi hai hamame se jo samaj ko samaj se aur samaj ke liye hi ek message dena chahta hai , Par Adhura hi kyun . aapke iss lekh ko padh ke ye to pata chal hi jaata hai ki . Ye Kya Hai , Kyun Hai Aur Kaise Hai Aur Lekh Se kuch ho na ho ye to jahir hai ki logo ke adhure view jarur milenge . Coz Aapki Likhawat me hi Jaadu Hai, Ki Log Lekh Ko Dil Se Padhane me gum, Aur aap apne Dil ke sms ko deliver karne me gum . par kya aapne ya phir padhne wale Deviyon Aur Sajjano Ne Ye Socha , Ki Ye Kab Se Hai , Aur Kiske Liye Hai, Aur Kab Tak Rahega , Rahega Ya Nahi Aur Yadi Nahi To Kaise . Mere Anusar Ye bhi Pura Hona Jaruri Tha, Gar meri ye Choti Si Thinking Sahi Hai To, Please Proceed with this, and Please try to complete this . Because If we belong to society , So this is our first Responsibility to try to collect these answers .

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  9. Bhaiya Ji ( Age Me Aapse Chota Hun Issliye ) Aapki,aap biti padha maine aur padh ke ek bahut bada message mila usi ke bare me jaha se ham hai . ( samaj se ) , mujhe hi nahi waran iss lekh ko padhne wale sabhi ko aur bahut accha laga ki koi hai hamame se jo samaj ko samaj se aur samaj ke liye hi ek message dena chahta hai , Par Adhura hi kyun . aapke iss lekh ko padh ke ye to pata chal hi jaata hai ki . Ye Kya Hai , Kyun Hai Aur Kaise Hai Aur Lekh Se kuch ho na ho ye to jahir hai ki logo ke adhure view jarur milenge . Coz Aapki Likhawat me hi Jaadu Hai, Ki Log Lekh Ko Dil Se Padhane me gum, Aur aap apne Dil ke sms ko deliver karne me gum . par kya aapne ya phir padhne wale Deviyon Aur Sajjano Ne Ye Socha , Ki Ye Kab Se Hai , Aur Kiske Liye Hai, Aur Kab Tak Rahega , Rahega Ya Nahi Aur Yadi Nahi To Kaise . Mere Anusar Ye bhi Pura Hona Jaruri Tha, Gar meri ye Choti Si Thinking Sahi Hai To, Please Proceed with this, and Please try to complete this . Because If we belong to society , So this is our first Responsibility to try to collect these answers .

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  10. निसन्देह खरा सच और खारा भी

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