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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

June 17, 2011

क़स्बा जो हम छोड़ आये हैं, पर जिसने हमें कभी नहीं छोड़ा!

बॉस, मैं छोटे शहर का बंदा हूँ! नीलेश मिश्रा ने किस्सागोई की उस खूबसूरत शाम की शुरुआत यहीं से की थी. बात को फिर पूरी ठसक देने के लिए अंगरेजी में भी दोहरा दिया था, I am a small town guy! ऑडिटोरियम में बुझी हुई बत्तियों के बीच फैले हुए से धुंधले उजाले में जाने सच, जाने झूठ मैंने तमाम आँखों में उतर आयी चमक देखी थी. कस्बे से महानगर तक पंहुच आने की चमक, महानगर में जिन्दा रह लेने की चमक और फिर भी उसी जिन्दगी में यादों की गलियों के रास्ते वापस अपने कस्बे लौट जाने के ख़्वाबों की चमक! ये हम सबकी, या कम से कम हम तमाम लोगों की, वह दुखती रग थी, वह नब्ज थी जिसको पकड़ लेने के बाद नीलेश और उनके 'बैंड काल्ड नाइन" को दिल जीत लेने के लिए और कुछ करना भी नहीं था. और वह तो खैर उन्होंने किया भी, नीलेश की बैरीटोन आवाज में उतार चढ़ाव के साथ एक कस्बाई जिन्दगी की कहानी, और बीच में कुछ बहुत खूबसूरत गीत.

१५ जून की इण्डिया हैबिटाट सेंटर के स्टीन ऑडिटोरियम में वेब पोर्टल मोहल्ला लाइव के २ बरस पूरे होने की खुशी में आयोजित उस शाम में बहुत सारी ख़ास बातें थी. जैसे यह कि मुख्यधारा के मीडिया के लगातार बदलते (और आम लोगों से दूर होते जाने के दौर) में विकल्प ना सही विकल्प की राह सुझा रहा एक पोर्टल उम्र के दो बरस पूरे कर रहा था और यह भी कि 'भाग डी के बोस' जैसे गानों के दौर में यादों का 'इडियट बॉक्स' खुलने पे जो यादें निकली थीं उनमे हममें से बहुतों का साझा था और यह भी कि उन तमाम गानों को आप बिना डरे घर वालों के साथ भी सुन सकते थे. .

अब अगर आवाज मंच से आ रही हो मगर मन बरसों पहले ननिहाल के उस आम के बाग़ में लौट लौट जाने पर आमादा हो जहाँ पहली बार हमने उस खूबसूरत से डिब्बे से निकलती हुई वह आवाज सुनी थी, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनेंगे, तो फिर कुछ कहने की जरूरत रह ही कहाँ जाती है. उस पर यह भी कि यह वही बाग़ था जहाँ यह याद पेड़ पर चढ़ कर आम तोड़ने, मौसी की कड़ी निगरानी के बावजूद ताश खेलना सीखने और उस तालाब में तैरने जिसको देख के आज के इण्डिया को 'स्किन डिजीज' का खतरा हो जाए, जैसी यादों से इस कदर बावस्ता थी कि उनको अलग करने की कोई कोशिश बेवकूफी के सिवा कुछ और नहीं हो सकती. (विषयांतर है पर क्या अब भी बच्चे गर्मी की छुट्टियों में ननिहाल जा के बागों में खेलते हैं? क्या अब भी बच्चे आम, जामुन, बेर, बेल, महुआ जैसे पेड़ों को अलग अलग पहचानते हैं? या हकीकतन तो यह कि क्या अब भी 'समर वैकेशंस' से अलग गर्मी की छुट्टियाँ होती हैं)

खैर वापस आके, जाने क्यों छुट्टियाँ हमेशा दफ्तर की याद दिलाती हैं. दफ्तर.. यही लफ्ज़ इस्तेमाल किया था नीलेश ने, एक शब्द जो बरसों से भूला हुआ था! ऐसे कितने और शब्द खो आये हैं हम? वह शब्द जो बस कुछ अरसा पहले तक हमारी जिंदगियों में यूँ शामिल होते थे जैसे कि हमारी जिन्दगी उनके बिना पूरी ही न हो. (शुक्र है कि बचपन का स्कूल और कोलेज की कैंटीन अब भी वही है वरना तो शायद अब की पीढ़ी से बात करने को साझे शब्द न मिलते!)

पर वक्तों की खासियत ही यही होती है कि वह खो रहे शब्दों के बराबर नए शब्द गढ़ता जीता चलता है. वरना फिर आज के १५ बरस पहले गोरखपुर से अपने कस्बे बभनान लौटते हुए मैं कभी कहाँ सोच पाया था कि माँ फोन करके पूछ सकती है कहाँ पंहुचे? और यह यकीन तो हाथों में मोबाईल आने के लगभग एक दशक बाद आज भी नहीं हो पता कि फिर जाने कब माँ ने एसएमएस करना भी सीख लिया था. अब भी याद है की माँ का पहला 'मैसेज' मिलने के बाद मैंने तुरंत फोन करके पूछा था कि आपने किया या किसी से करवाया? और माँ का जवाब कि सीख रहे थे तो सोचे पहला तुम्ही को भेजें?

याद नहीं कि नीलेश की कहानी में 'माँ' के एसएमएस करना सीख लेने की बात आने पर आँखें भीगी थी या नहीं, पर मन बहुत बहुत भीगा था. घर से ८०० किलोमीटर दूर बैठे हुए इस शहर में माँ अचानक पास आ गयी थी. याद आया था कि शादी न करने, नौकरी न करने जैसे तमाम मुद्दों पे अपनी तमाम नाराजगी के बावजूद आज भी फोन आने पर माँ का पहला सवाल यही होता है कि खाना खाया या नहीं?

खैर, नीलेश की कहानी के साथ यादों की रेलगाड़ी सी गुजरती रही थी, और उसमे शिल्पा राव और अभिषेक की जादुई आवाज, अतीत की, नोस्टैल्जिया की एक अजब सी दुनिया में लिए जा रही थी. उस कस्बे में जिसे हम कब का छोड़ आये हैं, पर जिसने हमें कभी नहीं छोड़ा.

मोहल्ला लाइव का, उसके मोडरेटर अविनाश भाई का, नीलेश मिश्रा और शिल्पा राव का बहुत शुक्रिया.. एक ऐसी खूबसूरत शाम के लिए! शुक्रिया उनके साथियों का भी, जिन्हों सुरों को साज दिए, यानी कि आदित्‍य बेनिया (गिटार), हितेश मोदक (कीबोर्ड स्‍कोर), सपना देसाई (ड्रम) और नैना कुंडू (बेस गिटार) का!

यादों के इस सफ़र के बारे में लिखना कुछ और भी है, सो वह जल्द ही..

8 comments :

  1. बहुत ही अच्छी और मेरे लिए यादगार शाम थी वो, सच कहू तो जब सब हँस रहे थे उस समय मैं रो रहा था क्योंकि निलेश जी ने मुझे अपने बचपन एक बार फिर से पहुंचा दिया था, Thanks Nilesh,avinash,and of-course you SAMAR....

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  2. ह्दयस्पर्शी पोस्ट,बधाई समर..

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  3. समर भाव को उसके दिसर्विंग रस में उचित अनुपात में ही मिला के रखना कोई आप से सीखे .. बहुत अच्छा लगा आपका लेख पढ़ के. अगले लेख का इंतज़ार है.

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  4. purani yado ke sahare yado ko taza kerne ke leye danyawad !!

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  5. सुन्दर ....मधुर .....मोहक ...और क्या कहूँ. बस जिसे आप कस्बा कहते हैं वह हम जैसे गंवार लोगों के लिए तो कभी महानगर के मानिंद होता था. पहली बार अपने गांव से निकल कर जब नज़दीकी शहर कस्बा 'मधुबनी' देखा था तो आँखे फटी रह गयी थी..सोचा था अरे वाह...ऐसी भी हुआ करती है कोई जगह??? हा हा हा ...बहुत कुछ याद दिला दिया आपने इस छोटे से आख्यान में. हालांकि 'संतोष' यह है कि मेरे गांव में आज भी कुछ खास नहीं बदला है सिवा मोबाइल के....अभी भी वही अन्धेरा, वही पिछड़ापन ...बस कुछ बदला है तो आँखों और तालाबों में भी 'पानियों' की मात्र. लेकिन फिर भी गर्मी के छुट्टियों में गुलेल ले कर जाने लायक गाछी(बगीचा) तो बचा है ही....साधुवाद आपको.
    पंकज झा.

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  6. बचपन से अगर ननिहाल निकाल दो तो हमारा अस्तित्व आज जैसा है वैसा न होकर कुछ और ही होता.

    हमारे बचपन में पिता पर तबादलों की मार और हम होते रहे शहर दर शहर...पर समर वेकेशन में ननिहाल, नानी का घर और नानी का मोहल्ला हमारे बचपन में सदा ही उल्लासपूर्ण रहा...उस ज़िंदगी के केन्द्र में रहा...पिता की ऑफ़िस से वेकेशन की छुट्टीयां मंज़ूर होती और हम केलेनडर पर, ननिहाल जाने की तारीख़ पर पेन से गोल सर्किल बना देता...और हर सुबह होने पर खुश्गवार उमंगों
    से भर उठते कि चलो एक दिन कम हुआ और ननिहाल जाने का एक दिन और करीब आ गया...ननिहाल से वापसी पर भी यही हाल होता...एक बार तो वहां नानी के घर में रेलवे स्टेशन जाने के एन वक्त, मैं बाथरूम में जा घुस और अंदर से स्टोपर बंद कर ली और स्टोपर के न खुलने का बहाना कर बाथरूम में बैठा रहा... मंशा यही थी कि काश ट्रेन चूक जाएँ और एक दिन और नानी के घर में रहने को मिले...

    उस शहर में नदी किनारे मन्दिर और मस्जिद के पास नीम और इमली के घने ऊँचे भरावदार मोटे तने के पेड थे...पेड़ो पर चढ़ कर इम्लियाँ और इम्लिओं के फूल तोड़ लाते जिसकी चट्नी सिलबत्ते पर
    पीस कर हमारी छोटी खाला लाल मिर्च और शकर डाल बनाती...और हम सभी खाते और घर की लड़कियाँ तो चाट-चाट कर चाव से खाती...नीम के पेड की हरी-पीली निम्बोड़ीयां तोड़कर या गिरि हुई घर पर लाते और ढिगार लगाकर हाथ के बनाए तराजू में तोल कर बेचने का खेल खेलते...समर वेकेशन यानी हमारे यहाँ आमों की सीज़न...आम की गुठलियाँ इधर-उधर गलियों-नालों में फैंक दी जाती जो अंधेरे उजालों में यहाँ-वहाँ उग आती...ब्राउन और हरे पत्तों वाले छोटे-छोटे पौधे बडे ही दर्शनीय लगते...उन्हें हम ज़मीन से उखाड़ उसकी सख्त परतें निकाल
    गुठली को किरकिरे पत्थर पर जहां उसकी बीच वाली फाँक होती वहां तक आधा-पाव घिस कर उसका बाजा बनाते, पत्तों के साथ वाला...और दिन भर उसे बजाते और विविध आवाज़ें निकालते...
    वहां सुबह नाश्ते के बाद और रात के खाने तक हम उम्र दोस्तों के साथ बस मटरगश्ती ही मटरगश्ती...

    यह तो सिर्फ यादों का एक झोंका-सा है... वह काल खंड तो काफी विस्तृत था...जहां एक कच्चे-पक्के घरों वाला मोहल्ला था, जिसमें नानी का घर था और थी पास ही एक नदी...

    ख़ुशियाँ उल्लास और आंसूओं में डूबे बचपन के वह लमहे इस पोस्ट को पढ याद हो आए. ...ठेंक्स नीलेश मिश्र और समर...

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  7. बाबा बहुत बेहतरीन लिखे हैं आप..तालाब में स्किन डिजीज वाली लाइन ने तो सीधे बचपन में ला कर बिठा दिया !

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