Featured Post

नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

April 13, 2011

आंकड़े बताते हैं कि इस देश का असली मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं भूख है, गरीबी है!

मोहल्ला पर छपे मेरे पिछले लेख खाये-पिये-अघाये मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं पर मोहल्ला के मोडरेटर अविनाश भाई ने कुछ सवाल पूछे थे. मुझे लगता है की वह सवाल और लोगों के लिए भी उतने ही उपयोगी हैं, इसलिए उन सवालों को वयः कॉपी-पेस्ट कर उनका जवाब यहाँ भी दे रहा हूँ..

अविनाश भाई के सवाल उनकी बाकी टिप्पणी के साथ यह रहे..

जनाब समर भाई, आप जिन आंकड़ों का सहारा अपने लेख के लिए कर रहे हैं, उनके लिंक भी लगे हाथ बढ़ा देते तो बात का वजन बढ़ता। मैं अपनी तरफ से कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा हूं, आपके लेख को समझने के लिए बस कुछ और तफसील की मांग कर रहा हूं। जैसे कि…

[1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
[2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
[3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
[4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
[5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।

मुझे कोई शक नहीं है कि आपको इस मुल्‍क से बेइंतहां मोहब्‍बत है और यकीनन इसकी बेहतरी की चिंताएं भी हैं। मैं आपके लेख को लफ्फाजी नहीं समझता हूं, इसलिए जानता हूं कि ये सारे आंकड़े बिल्‍कुल दुरुस्‍त होंगे। सिर्फ अपना भरोसा मजबूत करने के लिए इन आंकड़ों का स्रोत एक बार जान लेना चाहता हूं।

जवाब यह रहा..
अविनाश जी
माफी चाहता हूँ की इन आंकड़ों के लिए लिंक नहीं लगाये थे. ये खता सिर्फ इस वजह से हुई थी की ये सारे आंकड़े इतने चर्चित हुए थे, इन पर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया से लेकर दैनिक जागरण तक में इतनी खबरें छपी थीं, इन पर इतनी बहसें हुई थी, की मैंने मान लिया आप जैसे सुधीजन तो जानते ही होंगे.. और यकीन रखें, आंकड़ों के साथ किसी लफ्फाजी को मैं गुनाह-ए-अज़ीम मानता हूँ.

बिन्दुवार जवाब दे रहा हूँ, बस उसके पहले यह बता दूँ..की विश्वबैंक वाले आंकड़े को छोड़कर यह सभी आंकड़े भारत सरकार के हैं और इनमे से भी ज्यादातर मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स की प्रगति रिपोर्ट के तहत यूएनडीपी को भारत सरकार द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से हैं. लिंक है--
http://asiapacific.endpoverty2015.org/pdf/MDGGOIreport.pdf


यह रिपोर्ट भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organization, Ministry of Statistics and Programme Implementation ) द्वारा छापी गयी है.

ध्यान दें कि यह रिपोर्ट खुद भारत सरकार की है.. मेरी या किसी और 'वामपंथी प्रोपेगेंडा' मशीन की नहीं..

अब बिन्दुवार--
[1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
यही रिपोर्ट.. वैसे मेरे आंकड़े एक साल पीछे चल रहे थे. भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या अब 46 फीसदी है, माने कि २००८ के आंकड़ों से ६ प्रतिशत बढ़ गयी है.

[2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
यह आंकड़ा भारत सरकार द्वारा बनाई गयी अर्जुन सेनगुप्ता की कमेटी जिसका नाम था Conditions of Work and Promotion of Livelihood in the Unorganised सेक्टर का है. यह आंकड़ा १९९३-९४ के वित्तीय सत्र से लेकर २००४-०५ तक के सरकारी आंकड़ों पर ही आधारित है. इस कमेटी की पूरी रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं..
http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


(ध्यान दें कि यह कमेटी भारत सरकार के योजना आयोग को रिपोर्ट कर रही थी. आप तो खैर जरूर पढेंगे , बेनामियों को बता दूँ कि इस कमेटी के मुताबिक प्रतिशत से आगे जाकर वास्तविक संख्या में देखें तो इस देश के ८३ करोड़ साठ लाख लोग २० रुपये रोज से कम में गुजारा कर रहे थे.

[3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
दोनों. वर्ल्ड बैंक ने उस रिपोर्ट में पहले तो मध्यवर्ग को परिभाषित किया है, फिर आंकड़ों के आधार पर दुनिया के अलग अलग विकासशील देशों में उन्हें गिना है.. उस रिपोर्ट का लिंक मैंने वहीं लगा दिया था.. फिर से लगा देता हूँ..
http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/documents/volume_equity/ch7equity.pdf


[4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
भारत सरकार की उसी पहली रिपोर्ट से. इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के एक स्वतंत्र सेर्वे ने यह संख्या और ऊपर..६६.५ करोड़ आंकी थी जो तब की आबादी के आंकड़ों पर ५८ प्रतिशत बनता था.. पर कोई नहीं सरकारी आंकड़े ही स्वीकार कर लेते हैं..

[5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।
इस विषय पर कोई सीधा सरकारी आंकड़ा नहीं मिलाता क्योंकि सरकार अगर कहीं सिर्फ एक हस्पताल है तो उसे हस्पताल मानती है चाहे वहां एक भी डाक्टर ना हो. हाँ आप सरकार की और रिपोर्टों से यह बात साफ़ साफ़ देख सकते हैं. जैसे की स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार की यह रिपोर्ट देख लें..
http://mohfw.nic.in/Health%20English%20Report.pdf

२०१० की यह रिपोर्ट साफ़ साफ़ बताती है, कि “मानव संसाधन और विकसित मेडिकल टेक्नोलोजी का ७५ प्रतिशत, इस देश के कुल १५,०९७ अस्पतालों का ६८ प्रतिशत, और कुल ६, २३, ८१९ बिस्तरों का ३७ प्रतिशत निजी क्षेत्र में है. इनमे से ज्यादातर (सरकार संख्या नहीं दे रही) शहरी क्षेत्रों में हैं. और सबसे ज्यादा चिंता का विषय है ग्रामीण परिधि पर अयोग्य लोगों द्वारा दी जा रही घटिया स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं. स्वास्थ्य मंत्रालय, २०१०" (अनुवाद मेरा है, कोई भ्रम की गुंजाइश ना रहे इसीलिये मौलिक अंग्रेजी रिपोर्ट का यह हिस्सा यह रहा
"Over 75 per cent of the human resources and advanced medical technology, 68 per cent of an estimated 15,097 hospitals and 37 per cent of 6,23,819 total beds in the country are in the private sector. Most are located in urban areas. Of concern is the abysmally poor quality of services being provided at the rural periphery by the large number of unqualified persons.” (MOH, 2010)

अप स्वयं देख सकते हैं की सरकारी आंकड़े क्या कह रहे हैं..

इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व की सबसे सम्मानित स्वास्थ्य जर्नल लांसेट की २०११ की रिपोर्ट बताती है.. कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कुल बीमारियों के २८ प्रतिशत हिस्सा किसी किस्म की चिकित्सा प्राप्त नहीं कर पता. शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत २० है..(संख्याएं जोड़ के देखें कि कितने लोगों के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, झोला छाप डाक्टरों की भी नहीं)
इसमें यह जोड़ें कि पब्लिक हेल्थ पर कुल जमा सरकारी खर्चा २० प्रतिशत है, यानी की बंगलादेश जैसे राज्यों से कम.. और ऐसे में २० रुपये से कम पर जीने वाली जनता स्वास्थ्य सुविधाओं तक कैसे पंहुचती होगी..

खैर.. कमसेकम कोई चिकित्सा ना पाने वाले गाँव के २८ फीसदी मरीजों को शहर के २० प्रतिशत मरीजों से जोड़ दें.. इनमे झोला छाप वालों के चिकित्सा पाने वालों को जोड़ लें..संख्या ६० के ऊपर ही जायेगी नीचे नहीं..

अविनाश भाई.. उम्मीद है कि आप बेनामियों को सिर्फ गालीगलौज करने की जगह कुछ पढने लिखने की सलाह भी देंगे..

2 comments :

  1. haath badho bhai.....chumne ka dil karta hai.....

    sadar.

    ReplyDelete
  2. समर जी.. आपका पूरा लेख ही चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है कि से सारी समस्यायों की मूल जड़ भ्रष्टाचार ही है और कुछ नही.

    ReplyDelete