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April 28, 2011

उधार के आंदोलनों के दम पर इन्कलाब के ख्वाब कुछ क्रान्तिकारियों ने पहले भी देखे हैं...!

रविवार में प्रकाशित.

"ख़ुमैनी को वापस ला कर मुल्लाओं के हवाले कर देना, लगता है हम बुद्धिजीवियों और इंकलाबियों का कुल जमा काम इतना ही था." -अबुल हसन बानी सद्र, इस्लामिक क्रान्ति के बाद ईरान के पहले 'निर्वाचित' (फिर 'निर्वासित') राष्ट्रपति.

१ फरवरी १९७९ के उस खुश्क दिन तेहरान एअरपोर्ट पर उतरते हुए बानी सद्र दोहरी खुशी से लबालब थे. न केवल वह बरसों बाद अपने 'वतन' लौट रहे थे, बल्कि इस वापसी में उनके साथ ईरान की बर्बर पहलवी शाह तानाशाही को उखाड़ फेंकने वाले 'आन्दोलन' के एक महत्वपूर्ण नेता होने का गौरव भी शामिल था. यह और बात है कि यह खुशी देर तक नहीं टिकी. आलम यह था कि एअरपोर्ट से लेकर शहर तक उमड़ती ५० लाख से ज्यादा की भीड़ भी उनको उत्साह नहीं दिला पा रही थी. वह बदलाव का जूनून देख पा रहे थे, पर इस बदलाव को लाने वालों की सफ़ेद और काली इस्लामिक पगड़ियां उन्हें और साफ़-साफ़ नजर आ रही थी. उन्होंने जीवन भर एक वामपक्षीय लोकतान्त्रिक (भारतीय अर्थों में नहीं, वरन यूरोप, और ख़ास तौर पर फ्रांस में प्रचलित 'सेंटर-लेफ्ट' वाले अर्थों में) राजनीति की थी. ईरान की तानाशाही के खिलाफ आन्दोलन को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'वैधता' (लेजिटिमेसी) और समर्थन दोनों दिलाने में इस राजनीति की बड़ी भूमिका थी. इस राजनीति ने घरेलू स्तर पर भी एक साझा संघर्ष खड़ा करने में एक बड़ी भूमिका निभाई थी, एक ऐसा संघर्ष जहाँ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, उदार लोकतंत्रवादी और इस्लामिक क्रान्ति समर्थक कंधे से कंधे मिला कर लड़ रहे थे कि 'बदलाव' का सपना हकीकत में तब्दील कर सकें.

उस आन्दोलन में, उसके समर्थन में भी एक अतिरेक था. उस अतिरेक में कुछ लोगों ने अपनी आंखें बंद कर लीं थीं, हवाओं में साफ़ नजर आते संकेत पढ़ने से इनकार कर दिया था. वह 'जनता' के साथ थे, यह जाने बिना कि जनता कौन है, कहां है और किसके साथ है.

उन्होंने जनता की "नुमाइंदगी" का दावा कर रहे (ध्यान दें नुमाइंदगी नहीं, सिर्फ दावा) कर रहे मुल्लाओं को 'जनता' मान लिया था. उसके परिणाम भी सामने आये, वह भी बहुत जल्दी. सत्ता पर धीरे-धीरे इस 'जनता' का कब्जा हो गया और बावजूद इस तथ्य के कि बानी सद्र इस्लामिक क्रान्ति के बाद राष्ट्रपति पद के लिए १९८० में हुए पहले चुनाव न सिर्फ जीते, बल्कि ७६ प्रतिशत वोटों के साथ जीते थे. १९८१ में उन्हें पदच्युत कर दिया गया. इसके पहले कि आप यह सोचें कि यह एक व्यक्ति का पराभव था, यह जानना शायद बेहतर होगा कि इसी के साथ ईरान में 'इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी' को छोड़ कर प्रमुख विरोधी पार्टयों पीपुल्स मुजाहिदीन, फदाइन खल्क़ और तुदेह सहित सभी पार्टियों को 'गैरकानूनी' घोषित कर उनके नेताओं कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. उम्मीद है कि उसके बाद का ईरान का इतिहास, उसकी इस्लामिक क्रान्ति का इतिहास हम तमाम लोग जानते ही होंगे. यह भी कि इस इतिहास में उस क्रांति के बाद किसी किस्म के विरोध की कोई जगह नहीं बची, न किसी किस्म के लोकतंत्रवादियों (उदार या सामाजिक) के लिए न कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के लिए. यह भी कि उसके बाद का इतिहास ईरान में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए लड़ रहे लाखों लोगों की शहादत का इतिहास है.

यह इतिहास सिर्फ ईरान का इतिहास नहीं है. आप चाहें तो ईराक की बाथिस्ट क्रान्ति को याद कर सकते हैं. यह भी कि उसमे कितने लोकतंत्रवादी और वामपंथी साथियों को जान गंवानी पडी. याद तो खैर इंडोनेशिया को भी किया जा सकता है. कहीं गलती से भी लगने लगे कि बात सिर्फ इस्लामिक देशों की हो रही है, तो बेहतर होगा इंडोचाइना (याद हो कि न याद हो, ६०-७० के दशक तक उस पूरे इलाके को कहा यही जाता था) का इतिहास याद करना. और उससे भी ऊपर नाजीवाद और फासीवाद का उभार याद करना.

यह दोनों आन्दोलन बहुमत के आन्दोलन नहीं थे. इन दोनों आन्दोलनों का इतिहास दुश्मन गढ़ने, उसे नेस्तनाबूद करने और फिर नया दुश्मन गढ़ने का इतिहास है. (याद करें पेस्टर मार्टिन निमोलर की वह कविता- पहले वह यहूदियों के लिए आए, मैं कुछ नहीं बोला क्योंकि मैं यहूदी नहीं था...) यह भी कि अलग-अलग वक्त में इटली और जर्मनी की वाम से लेकर लोकतांत्रिक तक, तमाम राजनैतिक पार्टियां इन अल्पमत वाले दलों को समर्थन देती रही थीं. तब भी बहाना यही था- जनता के साथ, जन संघर्षों के साथ खड़े होने का. तब भी झूठ यही था, जनता के प्रभु वर्ग के एक छोटे-से हिस्से को "जनता" बना देने का.

आप देखना चाहें तो बहुत साफ़ देख सकते हैं कि इन तमाम आन्दोलनों (आप उन्हें आन्दोलन कह सकें तो) में समाज का सबसे धनी हिस्सा हमेशा इनके साथ था. इनके प्रतिपक्ष होने के समय भी, इनके धीरे-धीरे जनता की आवाज हड़प "जनता" बनते जाने के दौर में भी और फिर इनके सत्ता पर कब्जा करने में सफल होते समय भी. आप ध्यान दीजिये, चाहे नाजी जर्मनी हो, फासीवादी इटली या इस्लामी ईरान, इन तीनों प्रतिक्रान्तियों के साथ इन मुल्कों के पूंजीपति, कार्पोरेट और इनके मध्यवर्ग का सबसे धनी हिस्सा पूरी ताकत से खड़ा था. फिर शायद यह भी दिखेगा कि यह मध्यवर्ग 'राष्ट्र का मध्यवर्ग' नहीं था, बल्कि केवल और केवल राष्ट्र के बहुमत वाले धर्म का मध्यवर्ग था. यह सभी प्रतिक्रान्तियां इतिहास की तार्किकता का नकार थीं, हैं.

और अब सबसे जरूरी बात, कि ये सारे प्रतिक्रियावादी आन्दोलन अपने-अपने मसीहा के साथ आए थे. ये तब आये थे जब जनता का एक बड़ा हिस्सा अलग-अलग वजहों से परेशान था, और इन्होने अपने मसीहाओं के सहारे यह यकीन दिला दिया था कि इनके वाले हिस्से की परेशानी 'सबसे बड़ी' और 'असली वाली' परेशानी है. इससे भी ऊपर, इन सारी प्रतिक्रान्तियों के मसीहा राजनीति से और लोकतंत्र से नफ़रत करते थे और इनका पहला हमला लोकतंत्र के सबसे जरूरी प्रतीकचिन्हों पर ही होता था.

दुखद पर सच है कि ऐसे हर हमले में हमारे कुछ साथी अपनी तमाम सदिच्छाओं और ईमानदारी के बावजूद इन मसीहाओं के समर्थन में नारे लगाते हुए, उन्हें वैधता देते हुए मिलते हैं. वे भूल जाते हैं कि विश्वास और स्वतःस्फूर्तता की राजनीति दक्षिणपंथ का विशेष गुण है, जिसके सहारे वह तमाम मतभेदों और प्रतिरोधों से निपटता रहा है. वह आन्दोलन, क्रान्ति, जनता, नेतृत्व आदि बुनियादी शब्दों की समझदारी भूल उसी दक्षिणपंथी व्यवस्था के ध्वजवाहक होने की भूमिका में आ जाते हैं, जिसका वह कम से कम कथन के स्तर पर हमेशा विरोध करते रहे हैं. वे भूल जाते हैं कि आन्दोलन अपना नेता खुद पैदा करता है, नेता या मसीहा आन्दोलन पैदा नहीं करते. उन्हें याद नहीं रहता कि चाहे गांधी हों या लेनिन, मार्टिन लूथर किंग हो या नेल्सन मंडेला, ये सभी प्रतिरोध की एक लम्बी परम्परा में सक्रिय भागीदारी निभा कर तपते हैं, निकलते हैं और यह भी कि इनमें से हर एक 'नेता' के साथ लोकतांत्रिक ढंग से उपजा हुआ नेतृत्व होता है. फिर चाहे गांधी के साथ नेहरू हों या उनके बरक्स भगत सिंह, फिर चाहे लेनिन के साथ त्रॉत्स्की हों, या माओ के बरअक्स च्यांग काई शेक. ये सारे लोग संघर्षों की तपिश से पैदा हुए लोग हैं.

या फिर, हमारे ही दौर की छाती पर गड़े इरोम शर्मिला नाम के दर्द को देखिए. इरोम किसी आंदोलन को पैदा करने वाली नेता नहीं हैं. वे मणिपुर में भारतीय राज्य के दमन के खिलाफ चल रहे जनसंघर्षों की पैदाइश हैं, उसकी तपिश में चमकता एक शांत, पर क्रांतिकारी नेतृत्व हैं. हद तो तब होती है जब 'क्रांतिकारी' इतिहास वाले बुद्धिजीवी अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की तुलना इरोम शर्मिला के आंदोलन से करते हुए इरोम शर्मिला के आंदोलन को भी सिविल सोसाइटी का आंदोलन बताने की बेहूदगी कर बैठते हैं.

इरोम शर्मिला का आंदोलन सिविल सोसाइटी का आंदोलन न है, न हो सकता है. यह उस आंदोलन का एक हिस्सा है, जिसमें मणिपुर की मांओं को असम राइफल्स के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र प्रदर्शन करना पड़ा था. यह उस आंदोलन का हिस्सा है, जिसने अपने गुस्से की परिणति में मणिपुर विधानसभा को जला कर ख़ाक कर दिया था. यह वह आंदोलन है जिसकी कीमत संजीत, रुबीना और मनोरमा जैसे इसी देश के हज़ारों नागरिकों को अपनी जान गंवा के चुकानी पडी है. जरा बताइए कि सिविल सोसाइटी यानी 'नागरिक समाज' की भारी भागीदारी वाले इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को ऐसी कौन-सी कुर्बानियां देनी पडी़ हैं, राज्यसत्ता का कौन-सा दमन झेलना पड़ा है. इरोम पर सांस भी न लेने वाली यही राज्यसत्ता है जो अन्ना हजारे का अनशन शुरू होने के पहले ही बिछ बिछ जाना शुरू कर देती है. देखना चाहें तो साफ़-साफ़ दीखता है कि राज्यसत्ता के साथ अन्ना के नेतृत्व वाला 'भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन' खड़ा है, इससे असहमत लोग नहीं.

इरोम के आन्दोलन के बरअक्स अन्ना के आन्दोलन पर नजर डालिए, आपको साफ़ नजर आएगा की यह आंदोलन 'जनता' ने नहीं, "नेता" ने पैदा किया है. वरना क्या वजह हो सकती है कि अन्ना हजारे को छोड़ इस आन्दोलन के बाकी सभी "नेता" इसी शहर में कुछ महीने पहले आयोजित बाबा रामदेव के नेतृत्व वाले स्वाभिमान मंच की रैली में एक साथ आये थे और फिर भी मीडिया ने उनका नोटिस लेने से लगभग इनकार कर दिया था? क्या वजह है कि इसी मीडिया ने इसी शहर में तीन लाख मजदूरों की रैली की नकारात्मक रिपोर्टिंग के सिवा कुछ नहीं किया था? क्या कारण है कि अन्ना से लगायत इस आन्दोलन के सामाजिक न्याय विरोधी इतिहास वाले श्रीश्री रविशंकर और विश्व हिन्दू परिषद् की धर्म संसदों में जाने वाले बाबा रामदेव के इतिहास पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जेहाद की मुद्रा अपनाए दिख रहे मीडिया ने जबान खोलना भी गवारा नहीं समझा? आन्दोलन के समर्थन में उन्माद की हद तक जाकर इससे असहमत लोगों को राज्य सत्ता का साथी बता रहे लोगों को इन तमाम मुद्दों पर अपनी राय साफ़ करनी चाहिए, करनी होगी.

मसला सिर्फ इस आंदोलन के हिंदूवादी, ब्राह्मणवादी चरित्र का नहीं है. इस आंदोलन के चारणों को यह भी बताना होगा कि उनकी 'जनता' की परिभाषा क्या है? इस आंदोलन को साइबर स्पेस में एक बड़ा भूचाल लाकर मध्यवर्गीय रणबांकुरों को इसके समर्थन में खड़ा करने वाले समूह 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' का एक और सच है इसका खांटी ब्राह्मणवादी चरित्र. यह तथ्य जान कर भी इससे इनकार करने वाले इस आन्दोलन के साथ खड़े लोकतांत्रिक (?), मार्क्सवादी (?) बुद्धिजीवियों को क्या यह खबर भी है कि http://antireservation.com/ नाम की साईट खोलने पर कौन-सी साईट खुलती है? क्या उन्होंने यह तथ्य भी जांचा है कि अन्ना आंदोलन के अलम्बरदार 'इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' की साईट और आरक्षण विरोधी एंटी-रिसर्वेशन डॉट कोम का यूआरआल और पता ही नहीं, बल्कि इनका मालिकाना और रजिस्ट्रेशन का पता भी एक ही है. क्या इस तथ्य से इस आंदोलन के मूल चरित्र का कुछ अहसास होता है?

या फिर, सवाल दूसरा बनेगा कि क्या अन्ना के साथ वाले 'मार्क्सवादी'/लोकतंत्रवादी/बहुलतावादी या जाने क्या क्या-क्या वादी समर्थक आरक्षण के, सामाजिक न्याय के भी खिलाफ हैं? या फिर वह मानते हैं कि इस देश की 'आरक्षण विरोधी' आबादी ही देश की असली जनता है? और अगर वह यह मानते ही हैं तो उन्हें इस देश की आरक्षण समर्थक और विरोधी जनता की संख्या के आंकड़े भी ठीक ठीक पता होंगे. यही वह जगह भी है जहां से इस आंदोलन के सिविल सोसाइटी यानी 'नागरिक समाज' वाले नेतृत्व में दलित, पिछड़े और अन्य तमाम वंचित शोषित तबकों की अनुपस्थिति और उस अनुपस्थिति पर इसके 'प्रगतिशील बुद्धिजीवी' समर्थकों की चुप्पी बहुत कुछ साफ़ कर देती है. वह चुप्पी जो तब भी नहीं टूटी, जब इस आंदोलन के नेतृत्वकारी सिविल सोसायटी की जातिवादी सोच अरविन्द केजरीवाल के उस बयान से साफ़-साफ़ बरस पड़ी कि अगर ड्राफ्टिंग कमेटी में कोई दलित सदस्य चाहिए तो सरकार अपने किसी मंत्री को 'दलित मंत्री' से बदल ले, वह अपने खेमे वालों में किसी दलित को शामिल नहीं करेंगे. पता नहीं, इन बुद्धिजीवियों को यह बयान दिखा भी था या नहीं..लिंक यहाँ है..http://www.hindu.com/2011/04/24/stories/2011042457790100 . कथित साफ-सुथरे चेहरे वाले संतोष हेगड़े ने भी यही कहा।

यहीं से इस आंदोलन के एक और महत्त्पूर्ण पहलू को समझने का रास्ता भी खुलता है कि यह आंदोलन अपने शुरुआती दौर में जनलोकपाल बिल के इनके ड्राफ्ट पर किसी समझौते को तैयार क्यों नहीं था. बावजूद इस सवाल के कि ड्राफ्ट जनलोकपाल बिल कार्पोरेटों और एनजीओ को अपने दायरे से बाहर रख रहा था, उनकी जांच को तैयार नहीं था. क्या इस बात के तार इस तथ्य से कहीं से जुड़ते हैं कि यह पूरा आंदोलन कॉर्पोरेटों की फंडिंग से चल रहा था और क्या यही कारण है की जनलोकपाल बिल कॉर्पोरेटों की जांच को तैयार नहीं है? अब फिर से एक पुरानी बात पर लौटिए कि इस आंदोलन के पहले इतना भारी कॉरपोरेट समर्थन केवल एक आंदोलन को मिला है- ओबीसी आरक्षण विरोधी आंदोलन को. और उस आन्दोलन के नेतृत्व वाले तमाम लोग इस आंदोलन के नेताओं और संगठकों की भूमिका में मौजूद हैं. सवाल बनता है कि इन सारे सवालों, तथ्यों को नजरअंदाज कर इस आंदोलन का समर्थन कर रहे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की मंशा क्या है, उनका एजेंडा क्या है? यह भी कि उनकी प्रतिबद्धता किस तरफ है?

अंतर्विरोध के इस समय में अगर इन बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता जनता के प्रति होती तो शायद उन्हें साफ़ दिखता कि यह आंदोलन सिर्फ राजनीति और नौकरशाही को निशाना बना रहा है. आंदोलन वाले जानें या न जानें, 'प्रगतिशील बुद्धिजीवी' तो जानते ही होंगे कि भले ही बहुत थोड़ी संख्या में सही, यही दो जगहें हैं जहां दलित/पिछड़ी शोषित आबादी आ पाई है. इन दोनों जगहों को निशाने पर लेते हुए भी कार्पोरेटों को छोड़ देना (जहां आपको एक भी दलित शायद कहीं नहीं मिलेगा), फिर से, कुछ तो इशारे करता है. यह सवर्ण/आभिजात्य वर्ग की फिर से हुंकार है, यह सामाजिक न्याय की लड़ाई में हारी गई जमीन को वापस पाने का मनुवादी युद्धघोष है. आप देख नहीं पा रहे या देखना नहीं चाहते? यह भी कि इस युद्ध में अंतिम विजय सुनिश्चित करने के लिए जनलोकपाल बिल लोकतंत्र के मूल आधार शक्ति विभाजन तक के खिलाफ जाकर सारी शक्ति जनलोकपाल के हाथ में थमा देना चाहता है.

अन्ना से असहमतों को सत्ता पक्ष के साथ खड़ा बताते हुए ये बुद्धिजीवी क्या खुद से एक बार भी यह सवाल पूछते हैं कि जनलोकपाल बिल लोकपाल को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्ति एक साथ देकर सारी जवाबदेहियों, सारे उत्तरदायित्वों से मुक्त एक संस्था क्यों खड़ी करना चाहता है? लोकतंत्र की जरा-सी भी समझ वाले को इससे डरना चाहिए, बशर्ते वह उत्पीड़क वर्ग के साथ न खड़े हों, बशर्ते उन्हें जनता के बहुमत के सिवा किसी से डर नहीं लगता हो और इसीलिए वह लोकतांत्रिक बहुमत से बच निकलने का रास्ता न खोज रहे हों.

ऐसे तमाम बुद्धिजीवियों की प्रतिबद्धता की कलई तब और भी ज्यादा खुलने लगती है जब हम देखते हैं कि उनका तमाम जोर आंदोलन के बचाव के लिए भावनात्मक तर्क गढ़ने, साझीदारियां खड़ी करने और आंदोलन से असहमत लोगों की इतिहास-दृष्टि पर सवाल उठाने पर ही रहता है. उसमे भी वह सुविधाजनक दुश्मन ढूंढ़ने लगते हैं, जैसे कि इस आंदोलन की जनसंघर्षों में सारी उम्र लगा देने वाले आनंदस्वरूप वर्मा, केएन पणिक्‍कर, पी साईनाथ, हिमांशु कुमार, शबनम हाशमी जैसे साथियों/कॉमरेडों की आलोचना को अनसुना कर प्रताप भानु मेहता जैसे एकाध बुद्धिजीवी को चुन लेना और उसके तर्कों पर हमला करना. वैसे वह तब भी यह भूल जाते हैं कि अभी कल तक प्रताप भानु मेहता 'सिविल सोसायटी' उर्फ़ नागरिक समाज के बड़े समर्थकों/सिद्धांतकारों में थे. वहां भी इनका ध्यान कुछ जुमले (मसलन इस मामले में 'ब्लैकमेल') चुन कर उसके बहाने आंदोलन की वैचारिकी को लेकर उठ रहे असहज सवालों को ख़ारिज करने में ही लगा रहता है.

यहां 'ब्लैकमेल' के सवाल को ही लें, यह मुद्दा हवाओं से नहीं, वरना बाबा साहेब आंबेडकर के एक प्रसिद्द कथन 'अराजकता के व्याकरण' से उठाया गया है. यह भाषण देते हुए बाबा साहब साफ़ समझ रहे थे कि सत्ता को, सरकार को ब्लैकमेल करने की ताकत केवल और केवल प्रभु वर्ग में सामंत वर्ग में है और इसीलिए इस हथियार का फायदा वही उठा पाएगे. (फिर से देखें, केसीआर चंद्रशेखर राव के अनशन को सरकार ११ दिन में सुन लेती है, अन्ना को ४ दिन में और इरोम शर्मीला को ग्यारहवें साल में भी नहीं). और भी देखें, सरकार जिन आन्दोलनों से 'ब्लैकमेल' होती है वह सदैव उच्च वर्ग/जातियों के ही होते हैं, उनमे कभी शोषित वंचित तबकों की भागीदारी नहीं होती. पर यह 'प्रगतिशील' बुद्धिजीवी आलोचना के इस पहलू का जवाब नहीं देते, इससे नहीं टकराते. वह सवाल को आस्था का सवाल बनाते हैं, सपनों का सवाल बनाते हैं और फिर उन सपनो से असहमत लोगों को दुश्मन बना खारिज कर देने की कोशिश करते हैं.

पर दिक्कत यह है कि ऐसी कोशिशें उनके विचाराधारात्मक विचलन को साफ़ कर देती हैं. हीगेल, मार्क्स, मिल और ग्राम्शी आदि के हवाले से नागरिक समाज की शास्त्रीय परिभाषाओं का 'सिर्फ' जिक्र करते हुए जब वे 'विश्व बैंक' की परिभाषाओं की तंग गलियों से निकल भागते हैं, बिना यह बताए कि मार्क्स और हीगेल दोनों 'सिविल सोसायटी' को उस दौर के उत्पादन संबंधों में सत्ता के साथ खड़े वर्ग के बतौर चिन्हित करते हैं (मार्क्स के मुताबिक़ तो हीगेल के यहां 'सिविल सोसायटी' मार्केट मेकेनिज्म से ज्यादा कुछ नहीं है) तो संदेह होना स्वाभाविक है. यह संदेह तब और बढ़ता है जब वह इससे भी आगे जाकर ग्राम्शी द्वारा सिविल सोसायटी को स्टेट (या सत्ता) के भीतरी सुरक्षा उपाय (स्टेट के बाहरी दीवारों के अन्दर की सुरक्षा नहरें और किले) बताये जाने का जिक्र भी नहीं करते हुए इसी सिविल सोसायटी को 'अंगीकार' करने की जरूरत पर बल देने लगते हैं. यह तो खैर कल्पना से भी परे है कि वह सिविल सोसायटी के वर्त्तमान अर्थ को देने वाले जॉर्ज कोनराड की बात करेंगे जिनके पर्चे का नाम ही ‘एंटीपोलिटिक्स’ था.

खैर, बेहतर होगा कि वे जानें कि सारी दुनिया में सिविल सोसायटी का चरित्र एक जैसा है, एक ही जैसे लोगों से मिल कर बना है. आभिजात्य, सेवा क्षेत्रों में काम करने वाला, अंग्रेजीदां (कुछ देशों में फ्रेंच और कुछ में स्पेनिश भाषा वाले भी) मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग का हिस्सा. दिलचस्प यह है कि यह राय रॉबर्ट पुटनैम जैसे सिविल सोसायटी समर्थक सोशल कैपिटल के सिद्धांतकार की भी, और बूरद्यो जैसे समाजवादी चिन्तक/विचारक की भी. कुल जमा मतलब यह कि सिविल सोसायटी का एक वैश्विक चरित्र है और ग्राम्शी उसकी ठीक-ठीक पहचान करने में बिल्कुल सफल रहे हैं... और जब 'प्रगतिशील बुद्धिजीवी' ऐसी सिविल सोसायटी को अंगीकार करने की जरूरत पर बल देने लगें तो बहुत कुछ साफ़-साफ़ दिखने लगता है.

अन्ना समर्थक इन प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की तर्कपद्धति बहुत कुछ उन आलोचनाओं जैसी है जिसे 'वाम कवच' के अंदर रह कर उत्तर आधुनिक 'चिंतकों' ने राज्य सत्ता के 'प्रभुत्त्व' और शक्तियों की आलोचना की आड़ में 'आधुनिकता' और और 'वैज्ञानिक तार्किकता' तक को खारिज करने के लिए इस्तेमाल किया था. अपनी किताब प्रोफेट्स लुकिंग बैकवार्ड (२००३) में मीरा नन्दा ऐसे बुद्धिजीवियों की ठीक-ठीक पहचान करने में सफल रही थीं, जब उन्होंने लोकतंत्र, आधुनिकता और वैज्ञानिकता का वाम खेमे का-सा दिखने वाले विरोध का धार्मिक कट्टरपंथों(बहुवचन उन्हीं का है) के प्रसार से रिश्ता दिखाया था. अन्ना हजारे के मंच पर विहिप के साधुओं को देखिए, भारतमाता की 'संघी' तस्वीर और नक्शा देखिए, मंच पर आरक्षण विरोधी धर्मगुरुओं और मंच परे "यूथ फॉर इक्वालिटी" को "एंटीरिजर्वेशन डॉट कॉम" से "इण्डिया अगेंस्ट करप्शन" में बदलते हुए देखिए, यह तर्क आपको और बेहतर समझ आएगा. जो समझ नहीं आएगा वह यह, कि ऐसे आंदोलन के समर्थन में कल तक प्रगतिशील/लोकतांत्रिक खेमे के अलंबरदार रहे लोग क्यों खड़े हैं.

पर फिर, दुनिया का सारा इतिहास स्वतंत्रता की चेतना के बढ़ते जाने का इतिहास है, कहते हुए हीगेल ने भी शायद ही कभी सोचा होगा कि बीसवीं सदी के कुछ वक्त का इतिहास पीछे भी जाएगा. इतना पीछे कि माइकल फूको जैसे कुछ दार्शनिक 'राज्यसत्ता के राक्षस' को ठीक-ठीक समझते हुए भी 'ईरानी क्रान्ति' को आदर्श और 'सबसे बेहतर' बताएंगे, (यह भूलते हुए, 'या कि यह ही समझते हुए' कि धर्मसत्ता पर आधारित राज्यसत्ता किसी भी दिन धर्मनिरपेक्ष राज्यसत्ता से ज्यादा खतरनाक होगी, कम नहीं.) यह सब कुछ जानते समझते हुए भी हम किसी को इतिहास से सबक लेने पर मजबूर नहीं कर सकते. उनको तो ख़ास तौर पर नहीं जो अपनी वैयक्तिक/सामाजिक असफलताओं की ग्रंथि से पैदा हुई आत्मग्लानि को 'क्षणिक क्रांतियों' में भागीदारी से धोना चाहते हैं.

आखिर में बस यह कि, उधार की जनता के दम पर इन्कलाब नहीं होते, न उधार के तर्कों पर बहसें जीती जाती हैं. और जो यह कोशिश करते हैं, वे बानी सद्र की गति को प्राप्त होते हैं.

April 23, 2011

A Messiah And The Melodramatic Middle class: ‘Rethinking' The Anna Hazare Movement Against Corruption

[Published in Counter Currents. Can be accessed at http://www.countercurrents.org/samar220411.htm]


Reason is almost always the first and the biggest casualty of frenzy. This remains so even if the frenzy is built not by acts of violence or hatred, but by orchestrated protests around a righteous cause with all the paraphernalia in place, cheering middle classes (who till the other day were cheering India and sometimes abusing Pakistan and would be cheering different IPL teams/players nowadays), the celebrity members of civil society (does that mean all other are un/a-civil), a doting media covering a 98 hour event for more than 250 hours, facebook pages espousing people to join this cause and so on and so forth. And of course, there were saints of many hues adding religiosity to the self proclaimed righteousness of the cause. Add a Gandhi cap wearing diminutive figure as the leader and the recipe for a successful campaign is all complete. This was the Anna Hazare led movement against corruption in nutshell.

These are the times when you find foes and friends standing at the same side of the fence, making the same, tall and false claims of victory even in the middle of raising contradictory slogans. These are the times when the heart takes over head and the attempts to critically engage with the issue are fraught with the danger of being shouted down with all the contempt of the world. Clearly, investigating such an event can be arduous and very frustrating. But then, investigating such an event becomes a very important political task for the precise reason, remember the old man who exhorted his followers to doubt everything and to build understandings on the basis of concrete analysis of concrete situations!

So think about a movement, supposedly the largest after the JP movement of the 70s, that did not see actual participation of more than a few thousand at Jantar Mantar. Contrast it with the recently organized workers' rally protesting against price rise, inflation and violation of labour laws that drew more than 200000 workers to the same city. The same media that is calling Anna's movement Indian Peoples' League did not do as much as even taking notice of that rally. Interestingly, that rally was covered by international news agencies and channels like BBC, AFP and Reuters!

So what is it that makes Anna's movement such a success while condemning workers' protest to the margins of print and electronic media alike? It was lack of politics, nothing else. Remember that hating politics is one of the most favorite pastimes of the middle classes, at least the affluent sections of it, after watching cricket I concede. Remember that the very survival of its champions, the renowned members of civil society, is based on this hatred for political processes. Would they not be thrown out of business if the people themselves become stakeholders in the decision make process?

This is the actual fear that produces, shapes and defines the repugnance ‘Civil Society' has for the actual political process. It was not for nothing that George Konrad, one of the earliest exponents of actually existing civil society (not the concept but its materialization) has titled his article as ANTIPOLITICS while asserting that “Civil society is still only an idea; let us look at ourselves here in Budapest, as if from the island of Utopia”.

This hatred, however, does not get translated into hatred towards structures of power; quite on the contrary, civil society generally aligns itself with the state till it serves the interests. Civil society, more often than not, ends up working as another front of the state by usurping the sites of protests and thus diffusing any real anger towards the state, as prophetically identified by Gramsci in his times. In the war of positions, for him, civil society was nothing more than ‘trenches' and ‘permanent fortifications' for the state that was merely an ‘outer ditch'. (Of course, things have changed quite a lot since then, and we may find a very tiny section of civil society that stands by the oppressed and, consequently, finds itself on the wrong side of the state. One can readily think of Dr. Binayak Sen and Arundhati Ray as representing two absolutely different streams of such a section of civil society. However, the attitude of the state towards them does nothing more than strengthening the argument about the general character of the ‘civil society'!)

Why was this extension of the state on streets taking the state with all the might it could muster in the form of media coverage, if not the real people? Simply because the exigencies of the actual political process include a fierce struggle over agenda setting and because of that the governments cannot always afford to cater to the demands of civil society and its actual bosses. The governments, even in a quasi-democratic set up, have to face the people time and again and that demand of accountability, compels them to take some actions, even if very reluctantly, for the real people. A case in the point would be the enactment of the right to employment after a fierce struggle of the people across the country with several political mass organisations leading the battle from the front, in the middle of vicious opposition from the same corporations arguing that such an act would amount to criminal wastage of money and resources. (Interestingly, same corporations, led by t he Federation of Indian Chambers of Commerce and Industry (FICCI) were extending full support to this movement.)

Corruption in the process of governance troubles these ‘captains of industry and business' like nothing else. Yet, the power that this democratic set up has conferred on the political elite makes them almost helpless to fight it on their own. The failures of the system in unearthing, probing, and then punishing those behind this corruption merely adds to their woes. Needless to say, then, is their desperation to fight against this, to make corruption in the process of governance ‘the issue'.

I am not suggesting that corruption is not a REAL problem. It definitely is. Especially in the wake of the plethora of scams involving unprecedented amounts of money, it has shaken the very conscience of the people of this country. But then, the question is whether corruption is ‘the problem' or merely a manifestation of something far more deeper, far more malicious than this.

After all, these same people, especially the corporations, do not think twice before engaging in corrupt practices to usurp the land belonging to poor people for establishing their special economic zones. These same corporations employ all the dirty tricks to subvert the law of the land to evict people from their own lands for profit. These same corporations actually manage to use the government for ‘acquiring' lands for their private profit. They even benefit from the corruption for earning everything from contracts to spectrum.

Is the corruption real issue then? It certainly is not. Had corruption been the real issue, the proposed Janlokpal Bill would not have kept both the Corporations and other Non Governmental Organisations out of its ambit. It would not have, in that case, targeted the political class alone.

The real agenda is usurping the political process and appropriating the sites of protest for privileging their own agenda over others', read the silent majority.

A quick glance over some glaring facts may explain this further. As per government's own admission more than 46 percent of the children of this country are malnourished, under 5 mortality rate is still as high as 74.6 per thousand live births, comparable with highly undeveloped counties and 51 percent of households have no access to sanitation even today! ( http://asiapacific.endpoverty2015.org/pdf/MDGGOIreport.pdf ) Issues like these, especially those of hunger, housing, sanitation, health care and education are the most pressing issues for the silent majority of India and none of them emanate out of corruption.

They are the products of highly skewed distribution of resources in the society along the lines of pre modern structures of caste and kinship and cannot, therefore, be resolved without bringing in fundamental changes in the patterns of distribution. Corruption, actually, emanates out of this and not the otherwise. Just think of the fact that a Dalit will have to bribe everyone from the village chief to the block development officer to get actual benefit under any welfare scheme, but would s/he have needed it in the first place if s/he was not a landless labour in a village where all the land belongs to a few ‘upper caste' families!

The success of Anna Hazare led movement, therefore, is the success of the tiny, actually almost miniscule in numerical terms, middle classes to masquerade their agenda as that of the nation. Here is a quick fact check again. Noted economist Nancy Birdsall, in the World Bank publication titled Equity in a Globalising World defines the middle class in developing world as that section of population with an income above $10 day, but excluding the top 5% of that country as this is the only segment of society that has a ‘degree of economic security' which allows it to ‘uphold rule of law', invest and desire ‘stability'.( http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/
documents/volume_equity/ch7equity.pdf ) Despite the fact that $10 a day means nothing more than 450 INR a day or 13,500 rupees a month, India has no section of society earning that much outside the top 5 per cent of Indian population! Does one need to say anything more?

Interestingly, civil society does not represent even these 5% but reflects the desires of a miniscule sections sitting at the top of this section (Not for nothing we have those with assets more than 100 Crores representing the middle classes!)

This brings me to the last question. How could such a motley crowd of vested interests succeed in forging an almost impossible coalition of convenience? Think of the intriguing fact that it was a movement where CPI-ML liberation was seen standing together with Bhartiya Janta Party and FICCI! And then think of the old man who had asserted that the world is divided between the oppressors and the oppressed classes, and not only the interests of these respective classes are different but they are antagonistic! Then ponder over if by any stretch of imagination the class interests of Liberation and FICCI can be similar? Add Narendra Modi to this motley crowd and the picture becomes even murkier!

Had people on the left supporting this movement suspended their critical faculties for a while? Were they swept off their feet by the presence of a few thousand to the extent of ignoring the dangerous imagery of Hindu Rashtra that was omnipresent at the protest site and was betraying the real character of the movement despite all pretensions?

Had they forgotten that secularism essentially means relegating religion to the private sphere at least, and not letting them come in public domain and intervene and influence secular processes of democratic decision making?

Or, were they genuinely impressed by this Gandhian Messiah demanding death sentence to the ‘corrupt leaders' who did never demand any punishment for any other category of corrupt people? Did they even bother to check the track record of this Gandhian messiah who supports Maharashtra NavNirman Sena, warns outsiders in Bombay to live in their limits, and has enforced a labour division based on Varnashram system in his village complete to the detail of having poles to tie and beat down the violators?

Had they forgotten that the Sarkari Sant (a saint on government duty) tradition is not new to this country? Did the memories of Vinoba Bhave ending up in supporting Indira Gandhi imposed internal emergency not haunt them? I do not know how and why history would judge Anna Hazare, but it would ask very uncomfortable questions to those self acclaimed champions of the working classes standing by this struggle of the hegemonic class. It would ask them why they bartered their torches with the colourful candles offered to them and they would have to answer.

April 20, 2011

मार्क्सवादी-माओवादी-अन्नावादी तीक्ष्ण युवा पत्रकारों के नाम एक खुली चिट्ठी

यह लेख मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित एक लेख और एक प्रलाप (उसे लेख कहना लेख का अपमान होगा) के, जिनमे से एक कुछ और दोस्तों के साथ सीधे मुझे संबोधित थी के जवाब के बतौर..
मोहल्ला का लेख यह रहा--

और मोहल्ला लाइव  पर ही साथी विश्व दीपक का  प्रलाप/विलाप/चीत्कार यह.
अब इन दोनों का जवाब देता मेरा वह लेख जो निजी रिश्तों और रवीश कुमार जी के 'बड़े' नाम के बड़े प्रभाव को देखते हुए मोहल्ला लाइव पर नहीं आया, मॉडरेटर को लिखे पत्र के साथ.

अविनाश जी, 
भाई विश्वदीपक के पत्र के साथ साथ लेख पढ़ा. "क्रांतिकारियों" और "संदेहवादियों" सबको "इनवरटेड कामा' के भीतर कैद कर उनके खिलाफ फतवे जारी कर देने की हड़बड़ी भी बहुत साफ़ दिखी. और यह भी कि हड़बड़ी में लिए गए फैसले और जारी किये गए फतवे दोनों ही कितने कमजोर कितने गलत साबित होते हैं.
बखैर, मनोहर श्याम जोशी के शब्द 'दोचित्तापन और तिचित्तापन' याद करने वालों को जाने क्यों 'कसप' याद नहीं आता, बावजूद इसके कि सारी जिन्दगी गलत आंदोलनों के साथ खड़े रहकर बाद में गलती समझ आने पर कह वह सिर्फ इतना ही पाते हैं-- कसप-- हिन्दी में सबसे करीबी अनुवाद करूं तो बनेगा-- क्या जाने..
हाँ, क्रान्ति का फल तोड़ कर आम जनता के पास ले आने की हम "छायावादी"(क्या यह बोलने के लिए बोल दिया शब्द है या इसके कुछ मायने भी हैं) क्रांतिकारियों से कुछ बने ना बने.. अन्ना की 'क्रान्ति' के पके फल के जमीन पर गिरने का इन्तेजार कर रहे चेहरे बहुत साफ़ समझ आ रहे हैं.. हाँ, यह लेख उन्हें नहीं वरन 'जनसंघर्षों' में साझीदारी कर रहे साथियों को समर्पित है..
सादर
समर

मार्क्सवादी-माओवादी-अन्नावादी तीक्ष्ण युवा पत्रकारों के नाम एक खुली चिट्ठी

कुछ लोगों के लिए क्रान्ति सिर्फ एक शगल होती है, तमाम और आदतों/मजबूरियों के बीच जिन्दगी की राहों में ठिठक गयी एक आदत. क्रान्ति इनके लिए तलब जैसी भी होती है, ठीक उसी तरह जैसे सिगरेट की तलब उठाती हो किसी को अलसुबह और बदन में निकोटीन पंहुचने तक एक अजब सी बेचैनी की शक्ल में कमरे में भटकाती रहती हो. अब इसका क्या करें की तमाम नशे के बाद भी दिल्ली के गरीब से गरीब इलाके का कमरा दंडकारन्य नहीं हो सकता, ये बेचारे यह छोटी सी बात समझ ही नहीं पाते बस दावे करते रहते हैं.

यह वह लोग हैं जो माओवादियों के बीच पत्रकार होते हैं और पत्रकारों के बीच माओवादी! अलग अलग जगहों पर अलग अलग पहचानें सुविधा तो देती ही हैं ना! मानने का दिल तो नहीं होता युवा और तीक्ष्ण पत्रकार(पता नहीं दोनों दावे इनके खुद के हैं या अविनाश भाई ने इनकी पहचान पर तमगों से चस्पा कर दिए हैं) अब इसी जमात में शामिल खड़े दिख रहे हैं.

इत्तेफाक़न अन्ना के आन्दोलन से असहमत तमाम और लोगों के साथ वह मुझे भी समर्पित अभी इनका पिछला नोट पढ़ा था. तब सबसे दिलचस्प यह लगा था की विश्वदीपक बाबू माओवादी क्रान्ति की झंडाबरदारी करते हुए भी अन्ना हजारे के समर्थन में किसको उद्धृत करने पर आमादा थे.. एनडीटीवी के फीचर एडिटर और एक सजग पत्रकार 'रवीश कुमार' को ढूंढ कर लाते 'क्रांतिकारी' विश्वदीपक शायद भूल गए थे की यही रवीश कुमार जी अपनी ही चैनल की बरखा दत्ता के कारनामों पर अब भी कुछ नहीं बोले हैं! अन्ना से असहमतों पर 'अंटशंट' बकने का आरोप लगाने वाले रवीश कुमार जी की अपनी खुद की नैतिकता का आलम यह है विश्वदीपक जी..

रवीश कुमार जी सिर्फ तब चुप नहीं थे विश्वदीपक बाबू.. वह तब भी चुप रहे थे जब जेसिका लाल के समर्थन में हुए तहलका पत्रिका द्वारा शुरू किये गए मध्यवर्ग के ही एक दूसरे बड़े आन्दोलन को आपके एनडीटीवी ने फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में चुरा लिया था. यहाँ तक कि उसके द्वारा किये गए स्टिंग को भी आपके चैनल ने अपना बता कर पेश किया था और हाईकोर्ट की फटकार खाने के बाद माफी माँगी थी. लिंक देख लें शायद याद आ जाय..

इस पर भी कुछ कहेंगे? और इस पर भी कि कारगिल की रिपोर्टिंग से मशहूर हुई उस फिल्म की मीरा नाम की पत्रकार असल में कौन हैं? और इस फिल्म के बहाने उनके, और एनडीटीवी के पाप धोने की कोशिश के मायने क्या होते हैं?

या फिर तहलका की ‘स्टोरी’, स्टिंग और नाम चुराने को भी भ्रष्टाचार से लड़ने का तरीका मानते हैं आप.

या उससे भी बदतर, अब आप के लिए क्रान्ति का आधार दस्तावेज कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो से बदलकर क़स्बा या रवीश की रिपोर्ट हो गयी है?

हो ही गयी होगी शायद, वरना तो आप 'सबकुछ पर संदेह करो' (अंगरेजी में Doubt Everything) कहने वाले कार्ल मार्क्स को 'संदेहवादियों' को गाली देकर अपमानित ना कर रहे होते आप. आप को तो खैर दलितवादियों का इस आन्दोलन के विरोध में खड़ा होना भी नागवार गुजर रहा है बावजूद इसके की आन्दोलन के नेताओं में 'आरक्षण' को देश बांटने की साजिश कहने वाले श्री श्री रविशंकर भी शामिल हैं, और मंच पर दिखने वालों में विश्व हिन्दू परिषद् की धर्म संसदों में बार बार जाने वाले रामदेव भी. (या 'दलितवादियों' के खिलाफ इस विषवमन के पीछे आपकी खुद की कोई दबी हुई ग्रंथि काम कर रही है). आपके लिए शायद भ्रष्टाचार इतना बड़ा मुद्दा होगा, हो गया है कि इतनी सादा सी बातें आपको ना दिखें. (इस आन्दोलन के सांप्रदायिक चरित्र पर मैंने तमाम लिंक्स के साथ अभी टिप्पणी जैसा एक लेख लिखा था देख लीजियेगा)

और बावजूद इसके कि आपसे कोई उम्मीद नहीं है, उन आरोपों को तर्कों के साथ खारिज करने की कोशिश करियेगा.. फतवों के साथ नहीं.

और हाँ, छायावादी क्रांतिकारियों के बारे में भी आपके कुछ तीक्ष्ण शब्द पढ़े, विचारों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ. हवा में जुमले उछालना बहुत आसान कला है साहब, मगर शब्दों को परिभाषित भी कर ही देना चाहिए. मार्क्सवाद का जो भी जरा सा अध्ययन मेरा है, उसमे यह शब्द मेरी आँखों से नहीं गुजरा, तो अब आप ही बता दें कि इस शब्द के मायने क्या होते हैं. (मुतमईन हूँ कि दिल्ली की सड़कों पर बातों से बस्तर के जंगल उगा देने वाली आपकी कला छायावादी क्रांतिकारी होने का प्रमाणपत्र नहीं होगी, पर जो भी बता दें, उत्सुक हूँ. बस बताने में जल्दी करें उसके पहले एक बात मैं बता दूं. कि अन्ना से असहमत होना अगर छायावादी क्रांतिकारी होने की एकमात्र पहचान है तो आनंद स्वरुप वर्मा भी उसमे शामिल हो जायेंगे इसलिए संभाल कर बताइयेगा. (आनंद जी को विशेष रूप से उनकी राजनीतिक पक्षधरता के लिए उद्धृत कर रहा हूँ यह तो समझ ही गए होंगे या फिर..)

समकालीन तीसरी दुनिया में छपे उनके लेख की कुछ पंक्तियाँ देख लें- और फिर से (आप से उम्मीद तो नहीं है पर फिर भी तर्कों से आरोप खारिज करें)--
"पिछले कुछ वर्षों से इस व्यवस्था को चलाने वाली ताकतें इस बात से बहुत चिंतित हैं कि भारत के मध्य वर्ग और खासतौर पर शहरी मध्य वर्ग का रुझान तेजी से रेडिकल राजनीति की तरफ हो रहा है और उसे वापस पटरी पर लाने के लिए देश के स्तर पर कोई ऐसा नेतृत्व नहीं है जिसकी स्वच्छ छवि हो और जिसे राजनीतिक निहित स्वार्थों से ऊपर उठा हुआ चित्रित किया जा सके। अन्ना हजारे के रूप में उसे एक ऐसा व्यक्ति मिल गया है जिसके नेतृत्व को अगर कायदे से प्रोजेक्ट किया जाय तो वह तेजी से रेडिकल हो रही राजनीति पर रोक लगा सकता है। इसमें सत्ताधारी वर्ग, जिसमें देश के कारपोरेट घराने तो हैं ही, मध्य वर्ग का ऊपरी तबका भी है, का हित पूरी तरह जुड़ा हुआ है।

आनंद स्वरुप जी ने यह भी लिखा है कि "अन्ना हजारे के मंच पर दिखने वाले प्रतीक पहली नजर में हिंदुत्ववाद का एहसास कराते हैं।" और उसके पहले के हिस्से में उन्होंने आन्दोलन की फंडिंग का जिक्र भी किया है
"लेकिन अन्ना हजारे को समर्थन देने वालों में जब देश के कॉरपोरेट घरानों की सूची पर निगाह गयी तो लगा कि सारा कुछ वैसा ही नहीं है जैसा दिखायी दे रहा है। कॉरपोरेट घरानों से जो लोग अन्ना के समर्थन में खुलकर सामने आये वे थे बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज,गोदरेज ग्रुप के चेयरमैन आदि गोदरेज,महिंद्रा एंड महिंद्रा के ऑटोमोटिव ऐण्ड फार्म इक्विपमेंट सेक्टर के अध्यक्ष पवन गोयनका,हीरो कारपोरेट सर्विसेज के चेयरमैन सुनील मुंजाल,फिक्की के डायरेक्टर जनरल राजीव कुमार, एसोचाम के अध्यक्ष दिलीप मोदी तथा अन्य छोटे मोटे व्यापारिक घराने।"

अब जरा बताइए कि आप आनंद स्वरुप जी को कहाँ रखेंगे? छायावादी क्रांतिकारियों में, दलितवादियों में, संदेहवादियों में या नव-तर्कवादियों में?

विश्वदीपक जी, एक सलाह बिना मांगे ही ले लीजिये.. शब्दों का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए, वरना चीत्कार और सैद्धांतिक समझ सब एक सी ही हो जाती है.

अब आ जाइए भाकपा माओवादी के बयान पर, जिसका जिक्र करते हुए आप इतना उत्साहित हो गए हैं कि उन्माद में यह 'भय' तक व्यक्त कर गए कि " कहीं माओवादी पार्टी का रुख किसी ‘सैद्धांतिकी’ से संचालित न हो।"किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी का रूख 'सैद्धांतिकी' से नहीं तो किससे संचालित होगा साहब? उन्माद से, भावनाओं के विस्फोट से? आप मार्क्सवाद की बुनियादी समझ को खारिज कर रहे हैं विश्वदीपक जी, उस समझ को जो जमीनी सच्चाइयों के जमीनी विश्लेषण(अंगरेजी में concrete analysis of concrete situations) पर आधारित है. तर्क और सिद्धांत पर आधारित मार्क्सवादी दर्शन की यह व्याख्या आप जैसा कोई 'मार्क्सवादी' ही कर सकता था. बस यह और बता दीजिये कि क्या आप मार्क्स, एंजेल्स, लेनिन, माओ, ग्राम्सी, फिदेल, चे और तमाम और मार्क्सवादी नेताओं की सैद्धांतिक समझ की व्याख्या करती उन्ही की लिखी किताबों को खारिज कर रहे हैं? अगर ऐसा है तब तो आप का रवीश कुमार को उद्धृत करना साफ़ समझ आता है पर फिर भी यह जान लें कि 'अब तक का सारा इतिहास वर्ग संघर्षों' का इतिहास है' से लेकर
दार्शनिकों ने दुनिया की व्याख्या तमाम तरीकों से की है, पर सवाल दुनिया को बदलने का है' तक की सारी समझदारी सैद्धांतिकी से निकली समझदारी की है. \

खैर बात आगे, बेहतर होता कि आप अपने इस महान ज्ञान का प्रदर्शन करने के पहले भाकपा माओवादी के बयान को ठीक से पढ़ लेते.. जहाँ आप अन्ना हजारे के 'संघर्ष' पर लोट लोट जा रहे हैं वहीं 'पार्टी' का कहना है कि
"जहां उनके अनशन का लक्ष्य जन लोकपाल विधेयक ही था, वहीं देश के चारों कोनों से व्यक्त हुई जनता की आकांक्षा तो भ्रष्टाचार का जड़ से सफाया करने की है। लोकपाल विधेयक तैयार करने के लिए कमेटी का गठन कर उसमें आधे सदस्यों का चयन नागरिक समाज में से करने का सरकार ने जो फैसला लिया, इससे इस समस्या का हल हो गया या हो जाएगा, ऐसा मानना नादानी ही होगी।"

क्या आप को दिख रहा है कि पार्टी अन्ना के लक्ष्य और जनता की आकांक्षाओं का अंतर कर पा रही है, आपकी तरह अन्ना और जनता को, इस अनशन और जनसंघर्षों को एक ही नहीं कर दे रही है. आगे भी देखें, "पार्टी'(आपने अपने लेख में पार्टी भाकपा माओवादी के पहले लिखा था, मैं इसीलिये वैसा ही लिख रहा हूँ) यह भी कह रही है कि लोकपाल विधेयक, उसके लिए कमेटी के गठन, और उसके आधे सदस्यों का चयन नागरिक समाज में से करने से समस्या हल हो जायेगी, यह मानना नादानी होगी.
समझ आया कि 'नादान' आप जैसे 'उन्मत्त' और 'उन्मादित' क्रांतिकारी हैं, वरना तो दलितवादी, संदेहवादी, नव तर्कवादी और छायावादी क्रांतिकारी(इसका मतलब जो भी हो) यही कह रहे थे, कह रहे हैं.

आगे भी देख ही लीजिये, आपकी 'पार्टी' कह रही है कि "दरअसल आज भ्रष्टाचार के इतने गहरे तक जड़ें जमा लेने और बेहिसाब बढ़ जाने का यह कारण नहीं है कि यहां इसे रोकने का कोई कारगर कानून-कायदा ही मौजूद नहीं है। कानून चाहे जितने भी हों, चूंकि उन पर अमल करने और करवाने वाली व्यवस्था पर ही लुटेरे वर्गों का कब्जा है, इसीलिए यह बदहाली व्याप्त है।"

मतलब तो आपको समझ नहीं आया होगा, मैं ही बता दूं कि अन्ना के लोकपाल कानून से भी कुछ बनेगा बिगड़ेगा नहीं. इसके पहले कि आप गलतबयानी का फर्जी आरोप लगायें, 'पार्टी' के बयान के इसी पैराग्राफ की आखिरी पंक्तियाँ देख लें.
"यह उम्मीद रखना कि कानूनों या न्यायालयों के जरिए भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा, मरीचिका में पानी की उम्मीद रखने के बराबर होगा।"
कुछ समझ में आया विश्वदीपक जी, कि आप की उम्मीद, "मरीचिका में पानी की उम्मीद के बराबर है" या फिर आप अपने नाम के मुताबिक़ अज्ञानियों को ज्ञान देते हुए भी अंधेरों में डूबे हुए हैं? हाँ, अभी भी 'पार्टी' की समझदारी पर कोई भ्रम हो तो अगली पंक्तियाँ देख लें..
"इसलिए भ्रष्टाचार और अव्यवस्थाओं को जड़ से खत्म करने का मुद्दा व्यवस्था-परिवर्तन से जुड़ा हुआ सवाल है। यह मानकर चलना एक कोरा भ्रम ही होगा कि देश में मौजूद अर्द्धऔपनिवेशिक व अर्द्धसामंती व्यवस्था को बनाये रखते हुए ही चंद बेहतर कानूनों के सहारे से इस समस्या का पूरी तरह समाधन किया जा सकता है।"

आप समझ भी पा रहे हैं या नहीं कि पार्टी क्या कह रही है? पार्टी साफ़ साफ़ कह रही है कि इस व्यवस्था को जड़ से बदले बिना चंद कानूनों से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता, आपको क़ानून के जरिये इस समस्या का समाधान मांगने वाले अन्ना और उनके नौटंकीबाज करोडपति साथियों का समर्थन इसमें कहाँ दिख गया प्रभु? मुझे भी ज्ञान दें!

'पार्टी' इसके बाद जो कह रही है वह भी आपकी ऑंखें नहीं खोल पाया तो हमारी तो बिसात ही क्या है, पर फिर भी एक कोशिश करने में क्या हर्ज? आपके द्वारा बहुत उत्साह से उद्धृत पार्टी की प्रेस विज्ञप्ति कह रही है कि
"इस पृष्ठभूमि में इन साम्राज्यवाद-परस्त नीतियों का विरोध किये बिना तथा उनके खिलाफ संघर्ष छेड़े बिना ही भ्रष्टाचार का अंत कर पाने की आस लगाये बैठना या कर पाने का दावा करना जनता को गुमाराह करना ही है।"
अब आप कहीं यह तो कहने पर नहीं उतर आयेंगे कि अन्ना और उनके साथियों के संघर्ष में साम्राज्यवाद विरोध का मुद्दा भी शामिल था? या फिर कह ही दीजिये, हम भी देखें कि झूठ, गलतबयानी और बेशर्मी की कोई हद है कि नहीं!
पार्टी आगे भी कह रही है कि "दरअसल सरकार ने यह मांग अन्ना की भूख हड़ताल से डरकर पूरी नहीं की, बल्कि उनके समर्थन में उभर कर आये जनता के आक्रोश को ठंडा करने के लिए की। उससे भी बड़ी बात यह है कि चूंकि शासक वर्ग भलीभांति जानते हैं कि इस तरह के कानूनों से मौजूदा व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होने वाला है, इसीलिए उन्होंने बेखौफ होकर लोकपाल विधेयक के लिए कमेटी की घोषणा की।"

आप को कुछ समझ आता है विश्व के दीपक जी? पार्टी ना केवल यह कह रही है कि सरकार अन्ना के भूख हड़ताल से नहीं वरन उनके समर्थन में उभर आये (उतर आये नहीं) जनता के आक्रोश को ठंडा करने के लिए की है! पार्टी कुछ अंतर कर रही है, आन्दोलन में और जनता में, आपको दिख भी रहा है? पार्टी यह भी कह रही है कि 'सरकार' 'बेख़ौफ़' है यह तो आप शर्तिया नहीं समझ पा रहे हैं..

बाकी, पार्टी का आख़िरी आह्वान भी दुबारा पढ़ ही लें तो बेहतर होगा आपके लिए.."हमारी पार्टी देश की जनता से आग्रह करती है कि वह सरकार द्वारा घोषित सतही कानूनों और कानून तैयार करने के लिए कमेटियों के गठन की घोषणाओं से संतुष्ट होकर अपने संघर्ष को समाप्त न करे, बल्कि संघर्ष की राह पर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़े".

यही कानून अन्ना के आन्दोलन का एकमात्र लक्ष्य थे विश्वदीपक जी..
अब आप तय कर लें कि माफी 'दलितवादियों-संदेहवादियों' के साथ 'छायावादी क्रांतिकारियों' को मांगनी चाहिए या आप जैसे स्वघोषित माओवादी-अन्नावादियों को? हाँ खातिर जमा रखें कि आपसे उम्मीद हमें फिर भी कोई नहीं है.

April 15, 2011

Who Can Doubt The “Strong Secular Credentials” Of Your Movement Mr. Kejriwal?

[First Published on Counter Currents. Can be accessed here http://www.countercurrents.org/samar140411.htm]

Yes Mr. Kejriwal, you are absolutely right in asserting the strong "secular credentials" of your movement. It is because you are saying so.

Who cares for the fact that at least two of the top leaders of your anti-corruption movement have been participating in the Dharma Sansads organised by the Vishwa Hindu Parishad, sharing the worldview offered by the Prishad. Only the “secular” “socialist” stupids would make too much of the India Today report titled 'Hindu God Squad' pointing out that "If the highlight of day one was the arrival of Jayendra Saraswati, shankaracharya of Kanchi, day two saw Sri Sri Ravi Shankar, guru of the swish set, unobtrusively seat himself in the stage's second row..,"
Here's the link.
http://www.india-today.com/itoday/20010205/nation3.shtml

Who on our ‘mother earth' has proven their secularism more than the members of the VHP?

Please don't even give a damn to these scoundrels always out for the blood of the benign saints belonging to righteous VHP. When have they talked positively of any aspect of this social world? These buggers.!

Yes, Mr Kejriwal, you are right in asserting the 'strong secular credentials" of your movement. Why, because you are saying so.

Let the cynics raise a hue and cry over chasing away Mr. Sharad Yadav (of course without any prejudices) while letting Ram Madhav, one of the top leaders of Rashtriya Swyamsevak Sangh(RSS) grace the stage with his august presence. They are discussing it everywhere, from Dainik Jagaran to The Hindu.
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/national/5_2_7567157.html

I understand that you may be inclined not to believe a Hindi news paper, owing to your membership of the not so elite circles of 'civil society', so, here is the link from The Hindu as well,
http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/article1629646.ece?css=print

But tell me, isn't a ‘nationalist' Ram Madhav always preferable to Sharad Yadav, that student of Lohia and a champion of ‘casteist' politics?

Further, who can be stupid enough to doubt the "strong secular credentials" of “nationalist” RSS? After all, RSS has a glorious past of upholding secularism, isn't it?

Yes, Mr Kejriwal, the 'strong secular credentials" of your movement are irrefutable. Why, because you are saying so.

It's so perplexing, therefore, to understand why these thugs are making so much fuss about a ‘havan' performed at Jantar Mantar immediately after the ‘victory'.

Link- http://articles.economictimes.indiatimes.com/2011-04-09/news/29400617_1_anna-hazare-jantar-mantar-sudersh-adhikaro

So what? Is not performing ‘havan' a part of our glorious legacy, our national and ‘natural' culture? Why do these buggers want to ‘hinduise' everything, even the most innocuous secular act of performing a ‘havan'?

It could have been a little better, though, if we were informed about the role of Christian and Muslim religious leaders present there during these ‘havans. Did they too make offerings to the sacred fire, or wanted to? In that case, we could have shut these idiots accusing you of prejudices immediately.

Furthermore, in any case this havan was preannounced by some Free Hindus on their website. ( note that they are not merely Hindus, they are free as well and therefore secular). http://freehindu.com/2011/04/celebrations-at-jantar-mantar-to-celebrate-anna-hazares-victory/

This shows how democratic was the process of decision making in the movement. Some free Hindus announced that they would perform a havan, and everyone agreed to participate.

Aah, that reminds me of also the fact that Mufti Shamoom Qasmi and archbishop of Delhi Vincent M Concessao “are among the founders of this movement” and Mahmood A Madani “an active supporter.”

What else does one need to do to make something an all-religion affair? I don't understand that. Did they want you to have these two in the leadership as well? How many of their cohorts they lead to be eligible for sitting on the same dais with Baba Ramdev and Shri Shri who command the support of millions? Isn't being listed as founders/supporters enough?

These buggers cannot stop engaging in the politics of appeasement. Shun them.

How can anyone doubt the ‘strong secular credentials' of your movement Mr Kejriwal? I don't.

Good that you reminded everyone of ‘sarv dharm prarthana' being organized there every day? Is not that more than required to show the inclusiveness of the movement?

Yes Mr. Kejriwal, you are absolutely right in asserting the strong "secular credentials" of your movement. It is because you are saying so.

All you need to tell these people asking uncomfortable questions about the ‘havan' is to shut up. Their questions like if the havan was followed by a MASS, or if a shukraane kee namaaj (prayers thanking the almighty for the victory) was offered are nothing more than stupid. Period.

Does not Hinduism incorporates the secular traditions within itself?

I believe the strong and secular credentials of your movement Mr Kejriwal. I believe because you are saying so.

How does it matter that that Anna Hazare did not forget to remind everyone of the wounds Pakistan have caused him? Yes we know it; rather, we knew it all along. The wounds were not a result of his participation in a war, Pakistan has individually targeted him. Maybe the Nazoomis (astrologers, like us, they too have a lot of them) on their side had calculated that this guy would make India corruption free in future and then in the race for supremacy, India would surge past Pakistan forever.

This is why he opposed the reality show Big Boss(oh my, oh my he had time for that!) because of the presence of Pakistani artists as recently as in October 2010! Here is the NDTV link for that

http://movies.ndtv.com/movie_story.aspx?ID=
ENTEN20100156376&keyword=television&subcatg=MOVIESINDIA


Can one think of a better way of normalizing relations with a neighboring country than participating in movements against its ‘artists' with a political outfit that specialises in digging cricket pitches?

Remain assured; we believe the secular credentials of your movement.

For those who do not, you can shut them up in one of the best methods of non violent Gandhian tradition; we can tie them up to a pole and beat them with shoes as Anna's people do with alcoholics in Ralegaon Siddhi.

Link- http://kafila.org/2011/04/14/the-making-of-an-authority-anna-hazare-in-ralegan-siddhi/

April 14, 2011

जी हाँ अरविन्द जी.. आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे अरविन्द केजरीवाल के लेख के मोहल्ला में छपे हिन्दी अनुवाद का जवाब


जी हाँ अरविन्द जी..
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था. क्यों क्योंकि आप ने कहा है..

अब क्या हुआ की जिस आन्दोलन में भागीदारी करने पंहुचे शरद यादव को बिना किसी पूर्वाग्रह के भगा दिया गया उसी आन्दोलन के मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता राम माधव की गरिमामयी उपस्थिति किसी को नहीं खटकी. इसके पहले की कोई गलतबयानी का आरोप लगाये हिन्दी के प्रतिष्ठित अखबार दैनिक जागरण का लिंक देख लें..
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/national/5_2_7567157.html


दैनिक जागरण पर भरोसा ना हो तो इसके ठीक विपरीत विचारधारा वाले अंगरेजी अखबार द हिन्दू का यह लेख देखें.
http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-national/article1629646.ece?css=print


अब आरएसएस की भागीदारी वाले आन्दोलन की ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर कोई संदेह कर भी कैसे सकता है?

जी हाँ अरविन्द जी
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था. क्यों क्योंकि आप ने कहा है.

बावजूद इसके की आन्दोलन के ५-६ सबसे बड़े नेताओं में से दो, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आयोजित धर्म संसदों में जाते रहे हैं, विहिप के मूल चरित्र से सहमति दिखाते रहे हैं..
फिर से, गलतबयानी का आरोप लगे उसके पहले ही इण्डिया टुडे का यह लिंक देख लें जो यहाँ तक जिक्र करता है की आपके नेता “श्री श्री रविशंकर” विहिप की इस धर्मसंसद केमंच पर दूसरी पंक्ति में बैठे हुए थे.
http://www.india-today.com/itoday/20010205/nation3.shtml


अब विहिप के नेताओं से ज्यादा धर्मनिरपेक्षता की उम्मीद हम करेंगे भी किससे?

जी हाँ अरविन्द जी..
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था. क्यों क्योंकि आप ने कहा है..

अब इसका क्या करें कि आन्दोलन की विजय के ठीक बाद मंच पर हवन पूजन शुरू हो गए, कर दिए गए.
लिंक यह रहा
http://articles.economictimes.indiatimes.com/2011-04-09/news/29400617_1_anna-hazare-jantar-mantar-sudersh-adhikaro


हवन से बड़ी धर्मनिरपेक्ष कार्यवाही क्या हो सकती है आखिर? हाँ, हमें किसी ने नहीं बताया आप बता दें कि क्या वहां मौजूद ईसाई और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी इस हवन में अर्घ्य दिए थे या देना चाहते थे? यह भी कि सर्वधर्म प्रार्थना तो आप रोज करवाते थे, इस हवन के बाद कोई मॉस भी हुआ था क्या, या शुक्राने की कोई नमाज पढी गयी थी?
इसमें यह भी जोड़ लें कि वहां हवन होगा यह सूचना एक दिन पहले ही जारी कर दी गयी थी. एक नामालूम सी वेबसाइट फ्रीहिन्दू ने यह घोसणा एक दिन पहले ही कर दी थी. लिंक.. http://freehindu.com/2011/04/celebrations-at-jantar-mantar-to-celebrate-anna-hazares-victory/


अब यह तो धर्मनिरपेक्षता के साथ लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया का भी सम्मान हुआ..

जी हाँ अरविन्द जी..
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था. क्यों क्योंकि आप ने कहा है..

बावजूद इसके कि इस आन्दोलन के ठीक बाद प्रेस कांफेरेंस में अपने सर के घाव दिखाते हुए अन्ना हजारे यह बताना नहीं भूले कि यह घाव उन्हें पाकिस्तान ने दिए हैं! (इस बात के बारे में ज्यादा जानकारी मोहल्ला के मोडरेटर अविनाश भाई से हासिल की जा सकती है.. यह उनका फेसबुक स्टेटस मैसेज भी था)
इसमें यह जोड़ लें कि अभी अक्टूबर २०१० में अन्ना शिवसेना के साथ मिलकर बिग बॉस नाम के रियलिटी शो का विरोध इसलिए कर रहे थे क्योंकि उसमे ‘पाकिस्तानी कलाकार’ उपस्थिति थे!
लिंक — http://movies.ndtv.com/movie_story.aspx?ID=ENTEN20100156376&keyword=television&subcatg=MOVIESINDIA


पड़ोसी देशों के साथ ‘पूर्वाग्रह’ मुक्त रिश्ते बनाने का इससे बेहतर तरीका हो भी क्या सकता है? और वह भी शिवसेना जैसे पिच खोदू संगठन के साथ..

जी हाँ अरविन्द जी..
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पूर्वाग्रहों से मुक्त” था. क्यों क्योंकि आप ने कहा है. आपने यह भी कहा है कि “आंदोलन की कट्टर धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण इस बात से साबित होता है कि जंतर-मंतर पर हर शाम ‘सर्व-धर्म प्रार्थना’ होती थी। मुफ्ती शमूम काजमी और दिल्ली के आर्चबिशप विंसेंट एम कॉनसेसाओ इस आंदोलन के संस्थापकों में से हैं। महमूद ए मदनी भी इस आंदोलन के सजग समर्थक रहे हैं।”

जी हाँ.. ये सब संस्थापकों में रहे हैं.. सजग समथकों में रहे हैं..
इनके नेताओं में शुमार होने की क्या जरूरत.. नेता तो श्री श्री और रामदेव जैसे चेहरे वाले ही भले लगते हैं..

जी हाँ अरविन्द जी
आपका आन्दोलन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष है, पूर्वाग्रहों से मुक्त है.. बेवकूफ तो हम ही हैं जो समझ नहीं पा रहे..

April 13, 2011

आंकड़े बताते हैं कि इस देश का असली मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं भूख है, गरीबी है!

मोहल्ला पर छपे मेरे पिछले लेख खाये-पिये-अघाये मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं पर मोहल्ला के मोडरेटर अविनाश भाई ने कुछ सवाल पूछे थे. मुझे लगता है की वह सवाल और लोगों के लिए भी उतने ही उपयोगी हैं, इसलिए उन सवालों को वयः कॉपी-पेस्ट कर उनका जवाब यहाँ भी दे रहा हूँ..

अविनाश भाई के सवाल उनकी बाकी टिप्पणी के साथ यह रहे..

जनाब समर भाई, आप जिन आंकड़ों का सहारा अपने लेख के लिए कर रहे हैं, उनके लिंक भी लगे हाथ बढ़ा देते तो बात का वजन बढ़ता। मैं अपनी तरफ से कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा हूं, आपके लेख को समझने के लिए बस कुछ और तफसील की मांग कर रहा हूं। जैसे कि…

[1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
[2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
[3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
[4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
[5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।

मुझे कोई शक नहीं है कि आपको इस मुल्‍क से बेइंतहां मोहब्‍बत है और यकीनन इसकी बेहतरी की चिंताएं भी हैं। मैं आपके लेख को लफ्फाजी नहीं समझता हूं, इसलिए जानता हूं कि ये सारे आंकड़े बिल्‍कुल दुरुस्‍त होंगे। सिर्फ अपना भरोसा मजबूत करने के लिए इन आंकड़ों का स्रोत एक बार जान लेना चाहता हूं।

जवाब यह रहा..
अविनाश जी
माफी चाहता हूँ की इन आंकड़ों के लिए लिंक नहीं लगाये थे. ये खता सिर्फ इस वजह से हुई थी की ये सारे आंकड़े इतने चर्चित हुए थे, इन पर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया से लेकर दैनिक जागरण तक में इतनी खबरें छपी थीं, इन पर इतनी बहसें हुई थी, की मैंने मान लिया आप जैसे सुधीजन तो जानते ही होंगे.. और यकीन रखें, आंकड़ों के साथ किसी लफ्फाजी को मैं गुनाह-ए-अज़ीम मानता हूँ.

बिन्दुवार जवाब दे रहा हूँ, बस उसके पहले यह बता दूँ..की विश्वबैंक वाले आंकड़े को छोड़कर यह सभी आंकड़े भारत सरकार के हैं और इनमे से भी ज्यादातर मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स की प्रगति रिपोर्ट के तहत यूएनडीपी को भारत सरकार द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से हैं. लिंक है--
http://asiapacific.endpoverty2015.org/pdf/MDGGOIreport.pdf


यह रिपोर्ट भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organization, Ministry of Statistics and Programme Implementation ) द्वारा छापी गयी है.

ध्यान दें कि यह रिपोर्ट खुद भारत सरकार की है.. मेरी या किसी और 'वामपंथी प्रोपेगेंडा' मशीन की नहीं..

अब बिन्दुवार--
[1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
यही रिपोर्ट.. वैसे मेरे आंकड़े एक साल पीछे चल रहे थे. भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या अब 46 फीसदी है, माने कि २००८ के आंकड़ों से ६ प्रतिशत बढ़ गयी है.

[2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
यह आंकड़ा भारत सरकार द्वारा बनाई गयी अर्जुन सेनगुप्ता की कमेटी जिसका नाम था Conditions of Work and Promotion of Livelihood in the Unorganised सेक्टर का है. यह आंकड़ा १९९३-९४ के वित्तीय सत्र से लेकर २००४-०५ तक के सरकारी आंकड़ों पर ही आधारित है. इस कमेटी की पूरी रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं..
http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf


(ध्यान दें कि यह कमेटी भारत सरकार के योजना आयोग को रिपोर्ट कर रही थी. आप तो खैर जरूर पढेंगे , बेनामियों को बता दूँ कि इस कमेटी के मुताबिक प्रतिशत से आगे जाकर वास्तविक संख्या में देखें तो इस देश के ८३ करोड़ साठ लाख लोग २० रुपये रोज से कम में गुजारा कर रहे थे.

[3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
दोनों. वर्ल्ड बैंक ने उस रिपोर्ट में पहले तो मध्यवर्ग को परिभाषित किया है, फिर आंकड़ों के आधार पर दुनिया के अलग अलग विकासशील देशों में उन्हें गिना है.. उस रिपोर्ट का लिंक मैंने वहीं लगा दिया था.. फिर से लगा देता हूँ..
http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/documents/volume_equity/ch7equity.pdf


[4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
भारत सरकार की उसी पहली रिपोर्ट से. इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के एक स्वतंत्र सेर्वे ने यह संख्या और ऊपर..६६.५ करोड़ आंकी थी जो तब की आबादी के आंकड़ों पर ५८ प्रतिशत बनता था.. पर कोई नहीं सरकारी आंकड़े ही स्वीकार कर लेते हैं..

[5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।
इस विषय पर कोई सीधा सरकारी आंकड़ा नहीं मिलाता क्योंकि सरकार अगर कहीं सिर्फ एक हस्पताल है तो उसे हस्पताल मानती है चाहे वहां एक भी डाक्टर ना हो. हाँ आप सरकार की और रिपोर्टों से यह बात साफ़ साफ़ देख सकते हैं. जैसे की स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार की यह रिपोर्ट देख लें..
http://mohfw.nic.in/Health%20English%20Report.pdf

२०१० की यह रिपोर्ट साफ़ साफ़ बताती है, कि “मानव संसाधन और विकसित मेडिकल टेक्नोलोजी का ७५ प्रतिशत, इस देश के कुल १५,०९७ अस्पतालों का ६८ प्रतिशत, और कुल ६, २३, ८१९ बिस्तरों का ३७ प्रतिशत निजी क्षेत्र में है. इनमे से ज्यादातर (सरकार संख्या नहीं दे रही) शहरी क्षेत्रों में हैं. और सबसे ज्यादा चिंता का विषय है ग्रामीण परिधि पर अयोग्य लोगों द्वारा दी जा रही घटिया स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं. स्वास्थ्य मंत्रालय, २०१०" (अनुवाद मेरा है, कोई भ्रम की गुंजाइश ना रहे इसीलिये मौलिक अंग्रेजी रिपोर्ट का यह हिस्सा यह रहा
"Over 75 per cent of the human resources and advanced medical technology, 68 per cent of an estimated 15,097 hospitals and 37 per cent of 6,23,819 total beds in the country are in the private sector. Most are located in urban areas. Of concern is the abysmally poor quality of services being provided at the rural periphery by the large number of unqualified persons.” (MOH, 2010)

अप स्वयं देख सकते हैं की सरकारी आंकड़े क्या कह रहे हैं..

इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व की सबसे सम्मानित स्वास्थ्य जर्नल लांसेट की २०११ की रिपोर्ट बताती है.. कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कुल बीमारियों के २८ प्रतिशत हिस्सा किसी किस्म की चिकित्सा प्राप्त नहीं कर पता. शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत २० है..(संख्याएं जोड़ के देखें कि कितने लोगों के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, झोला छाप डाक्टरों की भी नहीं)
इसमें यह जोड़ें कि पब्लिक हेल्थ पर कुल जमा सरकारी खर्चा २० प्रतिशत है, यानी की बंगलादेश जैसे राज्यों से कम.. और ऐसे में २० रुपये से कम पर जीने वाली जनता स्वास्थ्य सुविधाओं तक कैसे पंहुचती होगी..

खैर.. कमसेकम कोई चिकित्सा ना पाने वाले गाँव के २८ फीसदी मरीजों को शहर के २० प्रतिशत मरीजों से जोड़ दें.. इनमे झोला छाप वालों के चिकित्सा पाने वालों को जोड़ लें..संख्या ६० के ऊपर ही जायेगी नीचे नहीं..

अविनाश भाई.. उम्मीद है कि आप बेनामियों को सिर्फ गालीगलौज करने की जगह कुछ पढने लिखने की सलाह भी देंगे..

April 12, 2011

खाये-पिये-अघाये मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं

[मशाली संघर्ष परंपरा का मोमबत्ती पर्व था अन्ना हजारे का अनशन! 2]


राष्ट्र को अपनी बपौती मानने वाले मध्यवर्ग की नैतिकता बहुत दिलचस्प होती है. उससे भी ज्यादा दिलचस्प होता है इस मध्यवर्गीय नैतिकता का कभी कभी होने वाला विस्फोट जो जार्ज बुश से एक कदम आगे जाकर 'जो हमारे साथ नहीं है वह 'राष्ट्रविरोधी' है' वाले अंदाज में आम से लेकर ख़ास जन पर नाजिल होता है. जैसे की मध्यवर्ग ही राष्ट्र हो, राष्ट्र ही मध्यवर्ग हो. ये और बात है की मीडिया से लेकर सारे संसाधनों पर कब्जे वाले इस वर्ग के लिए अपनी आवाज को 'राष्ट्र' की आवाज बना कर पेश करने में कोई ख़ास मुश्किल नहीं आती.

इसीलिये, दुनिया के इतिहास में कभी भी सड़कों पर उतर कर मुश्तरका संघर्ष ना करने वाले वर्ग के बतौर पहचाने जाने वाले इस वर्ग का अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले 'भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन' में यूँ कूद पड़ना विश्वास नहीं सिर्फ संशय ही पैदा कर सकता है. खासतौर पर इसलिए भी कि यह मध्यवर्ग सिर्फ दो तरह की चीजों से परेशान होता है, पहला तब जब हमला सीधे इसी वर्ग पर हो (जैसे बम्बई पर हुए आतंकी हमलों में ताज से लेकर अन्य कई जगहों पर मध्यवर्ग ही सीधे निशाने पर था) या तब जब मामला 'धन' का हो (जैसे कोमनवेल्थ घोटाला या फिर २-जी स्पेक्ट्रम घोटाला. बाकी हर जगह पर मध्यवर्गीय नैतिकता स्मृतिभ्रंश और ध्यानविचलन के स्थायी रोग से ग्रसित होती है.

इसीलिये सोचने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से से उबल उबल पड़ रहा मध्यवर्ग इसी देश में लाखों किसानों की आत्महत्या पर क्यों नहीं उबलता? इसी मध्यवर्ग के सबसे प्यारे (फिर तो अंगरेजी ही होगा) अखबारों में से एक टाइम्स ऑफ़ इंडिया की आज की ही खबर कि अन्ना हजारे के ही राज्य महाराष्ट्र के मेलघाट नामक इलाके में हर दिन एक बच्चा भूख से मरता है क्यों इसे उद्धवेलित नहीं करती. याद रखिये कि क्रिकेट विश्वकप जीत कर अपना राष्ट्रगौरव पुनर्स्थापित करने में सफल रहे मध्यवर्ग का भारत वही भारत है जिसके कुल बच्चों में से ४० प्रतिशत से ज्यादा कुपोषित हैं, और आज भी जहाँ प्रसव के समय होने वाली माओं की मृत्युदर तीस साल से गृहयुद्ध झेल रहे श्रीलंका से ज्यादा है.

पर मुतमईन रहें, इन तमाम मुद्दों मर मध्यवर्ग (और इसकी प्रतिनिधि सिविल सोसायटी) की चुप्पी किसी किस्म की हैरानी प्रकट करने वाला मसला नहीं है. यह चुप्पी एक ख़ास राजनीति का हिस्सा है, उसी का प्रकटीकरण है. हैरानी की बात है इस देश के गरीब, शोषित, वंचित, दलित, मजदूर, किसानों आदि आदि की खुदमुख्तारी का दावा करने वाले वामपंथ से शुरू कर कर समाजवादी राजनीति से रिश्ता रखने वाले तमाम संगठनों का अन्ना हजारे और बाबा रामदेवों के साथ खड़ा हो जाना.. मध्यवर्ग तो राजनीति को 'गन्दा' मानता ही है, उससे नफ़रत भी करता है, पर इन लोगों की समझ को क्या हुआ था? क्या यह पार्टियां/लोग भी राजनीति की बुनियादी समझ गंवा चुके लोग हैं?

अपनी सरलतम परिभाषा में राजनीति को समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा आपने हितों को चिन्हित कर उन्हें हासिल करने की लड़ाई के बतौर देखा जा सकता है. इसको यूँ भी कह सकते हैं कि राजनीति एजेंडा सेटिंग और फिर उसके द्वारा नीति निर्धारण की प्रक्रिया है. कहने की जरूरत नहीं है की एजेंडा सेटिंग की यह प्रक्रिया समाज के अन्दर मौजूद शक्ति विभाजन और सामाजिक अंतर्संबंधों को प्रतिबिंबित करती है. और इस रोशनी में देखें तो भ्रष्टाचार एक जरूरी मुद्दा होने के बावजूद सबसे जरूरी मुद्दा नहीं हो सकता.(यहाँ मेरा मतलब भ्रष्टाचार के मध्यवर्गीय अर्थ 'आर्थिक भ्रष्टाचार' से है). २० रुपये रोज से कम पर जिन्दगी जी रही इस देश की ६९ प्रतिशत आबादी के लिए ज़िंदा रहने की जद्दोजहद सबसे बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार नहीं. आखिर को रिश्वत देने के लिए भी पैसों की जरूरत होती है. मैं जानता हूँ कि यह तर्क तमाम लोगों को बहुत परेशान करेगा, पर एनडीटीवी से शुरू कर तमाम अखबारों के सेट किये एजेंडे से जरा सा ऊपर जाने की कोशिश करिए, आप को तमाम नयी चीजें समझ आयेंगी. यह कि जिस आन्दोलन को तमाम मध्यवर्ग के समर्थन के दावे किये जा रहे हैं, जिस आन्दोलन को जेपी के बाद का सबसे बड़ा आन्दोलन बताया जा रहा है उस आन्दोलन के समर्थन की जमीनी सच्चाई क्या है.

मध्यवर्ग मोटे तौर पर इस आन्दोलन के साथ है यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है. पर इस आन्दोलन को दूसरी क्रान्ति बताने वालों से क्या किसी ने पूछा है कि इस देश में मध्यवर्ग की आबादी क्या है? हम जैसे वामपंथियों की तो बात ही छोडिये (हम तो एक करीबी लेफ्ट-लिबरल दोस्त की टिप्पणी के मुताबिक़ छिद्रान्वेषी लोग हैं), आंकड़ों की बात करते हैं. वह भी चलो अमेरिका के सपने देखने वाले मध्यवर्ग के सबसे बड़े तीर्थस्थल विश्वबैंक( World Bank) के दिए गए आंकड़ों की, कमसेकम उसको तो वामपंथी दुष्प्रचार का हिसा मान कर खारिज नहीं किया जायेगा. 'इक्विटी इन अ ग्लोबलाइज़िन्ग वर्ड' शीर्षक वाले अपने नए प्रकाशन में वर्ल्ड बैंक की मशहूर अर्थशास्त्री नैन्सी बिर्ड्साल ने मध्यवर्ग की परिभाषा देते हुए कहा है कि विकासशील देशों में मध्यवर्ग आबादी का वह हिस्सा है जो १० अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन (या करीब ४५० भारतीय रुपये, या १३५०० रुपये प्रतिमाह) से ज्यादा कमाता है पर देश के सबसे धनी ५ प्रतिशत लोगों के बाहर हो. यही वह वर्ग है जिसके पास इतनी आर्थिक सुरक्षा होती है कि वह क़ानून के शासन, और स्थायित्व के बारे में सोच सके, और इसमें निवेश कर सके.

इस आधार पर भारतीय मध्यवर्ग की जनसंख्या क्या होगी क्या आप इसका अंदाजा भी लगा सकते हैं? अगर विश्वबैंक और भारत सरकार के ही आंकड़े देखें तो यह संख्या शून्य है. १३५०० रुपये से ज्यादा कमाने वाली सारी की सारी आबादी उच्चतम आय वाले ५ प्रतिशत खेमे में ही सिमटी हुई है. (पूरी रिपोर्ट यहाँ पढी जा सकती है http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/documents/volume_equity/ch7equity.pdf)
अब जरा सोचिये कि जिस देश में कल के बारे में सोचने की फुर्सत सिर्फ ५ फीसदी आबादी के पास हो, जहाँ ९५ फीसदी लोग किसी तरह आज ज़िंदा रह जाने के लिए ही युद्ध करने को अभिशप्त हों वहां भ्रष्टाचार कितने प्रतिशत की समस्या होगी और भूख कितने की?
जिस देश में ५० फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने को कोई स्थाई और सुरक्षित घर ना हों, आजीविका के साधन के बतौर कोई जमीन ना हो, वहां ऊँची दीवालों से घिरी और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी वाली अपनी रिहाइशों से निकल कर मोमबत्तियां पकडे मध्यवर्ग की समस्या उनकी समस्यायों के ऊपर कैसे खड़ी हो जाती है? जिस देश में ६० फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधाओं तक कोई पंहुच ना हो वहां आर्थिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा कैसे बन जाता है?

पर फिर से याद करिए, कि राजनीति एजेंडा सेटिंग का नाम है. और कमसेकम ६९ प्रतिशत आबादी के ज़िंदा रहने की जद्दोजहद के ऊपर, उनके मुद्दों के ऊपर भ्रष्टाचार को खड़ा करने की राजनीति इसी एजेंडा सेटिंग का कारनामा होता है, और यह एजेंडा कौन और क्यों सेट करता है बहुत साफ़ साफ़ दिखता है. जो न दिखता है न समझ आता है वह यह, कि वो कौन लोग हैं जो इस मध्यवर्गीय दुष्प्रचार की गिरफ्त में आकर मुल्क की ९५ फीसदी आबादी को छोड़ ५ प्रतिशत के साथ खड़े हो जाते हैं यह जानते हुए भी की उनका वहाँ खड़ा होना आन्दोलन को वह 'वैधता' (legitimacy) देगा जो बाद में हमारे संघर्षों के खिलाफ इस्तेमाल की जायेगी. जीत के तुरंत बाद अन्ना हजारे का नरेंद्र मोदी को महान बताना इस तरफ कुछ इशारा तो करता ही है. उन्हें बताना होगा कि इस आन्दोलन के जनांदोलन होने का दावा करते समय उनके तथ्य क्या थे, और उन तथ्यों को उन्होंने तर्क और सच्चाई की कसौटी पर कसा क्यों नहीं? उन्हें बताना होगा कि मध्यवर्ग की राजनीति का मोहरा बनते हुए उन्हें कुछ तो शर्म आयी होगी, या फिर संघर्षों की अपनी मशालें मोमबत्तियों से बदलते हुए भी उनके चेहरे नैतिकता के तेज से चमक रहे थे?

April 10, 2011

मशाली संघर्ष परंपरा का मोमबत्ती पर्व था अन्ना हजारे का अनशन!

बहुत मुश्किल होता है उन वक्तों की पड़ताल करना जब दोस्त और दुश्मन एक साथ एक ही खेमे में खड़े दिखें. उससे भी मुश्किल काम बन जाता है उन वक्तों की पड़ताल करना जब ये सारे दोस्त और दुश्मन मिलकर क्रांति, और जीत का दावा करते एक लगभग उन्मादी वातावरण बनाते हुए नारे लगाने में शरीक हों. इन पड़तालों की कोशिश के अपने खतरे भी खूब होते हैं. भावनात्मक उन्माद के दौर में बिना पढ़े और समझे खारिज कर दिए जाने के खतरे. पर यही दौर होते हैं जब मुक्तिबोध के शब्द उधार ले कर कहूँ तो 'अभिव्यक्ति के सारे खतरे' उठाना न सिर्फ जरूरी बल्कि सबसे जरूरी काम भी बन जाता है. अभी अभी 'विजय' के साथ ख़त्म हुआ अन्ना हजारे और 'सिविल सोसायटी' के उनके साथियों का अनशन हमारे समयों का एक ऐसा ही पड़ाव है. और इस पड़ाव की एक जमीनी सच्चाइयों के जमीनी विश्लेषण( concrete analysis of concrete realities) पर आधारित राजनीतिक समझदारी बनाना आज के अंतर्द्वंदों से जूझ रहे हमारे साथियों के लिए एक जरूरी राजनैतिक कार्यभार है.

अब क्योंकि कुल चार दिनी आयोजन/आन्दोलन कमसेकम मीडिया के मुताबिक़ जेपी आन्दोलन से कुछ कम नहीं था, इसके पीछे की राजनीति की पड़ताल थोड़ी तो बड़ी होगी, और इसीलिये हमें यह कोशिश टुकड़ों में करनी चाहिए. तो सबसे पहला हिस्सा यह रहा, जहाँ हम इस आन्दोलन की राजनीति इसके समर्थकों की राजनीति से समझने की कोशिश कर कर सकते हैं.

जरा सोचिये एक ऐसे आन्दोलन के बारे में जहाँ भाजपा, भाकपा माले लिबरेशन और भारी पूंजीपतियों का संगठन फिक्की एक साथ नजर आते हैं. और फिर याद करिए मार्क्स को, जिन्होंने विश्वइतिहास को वर्ग संघर्षों का इतिहास कहते हुए यह भी कहा था की शोषक और शोषित वर्गों के वर्गहित ना केवल एक दूसरे से अलग होते हैं वरन एक दूसरे के प्रतिलोमी भी होते हैं! अब खुद से एक सवाल पूछिए की क्या छतीसगढ़, झारखंड से लेकर सारे देश में पूंजी के प्रतिनिधि 'फिक्की' और सर्वहारा वर्ग संघर्षों का झंडा उठाये लिबरेशन की राजनैतिक समझदारियों में उनके वर्ग हित एक ही हो सकते हैं? अब इसमें सांप्रदायिक भाजपा के सबसे बड़े हत्यारे नरेन्द्र मोदी को जोड़िये, जिनका गुजरात गौरव मुस्लिमों के कत्लेआम के साथ साथ बड़ी पूंजी को खुली छूट देने के कारनामों से ही आगे बढ़ता है. (अकारण ही नहीं है की फिक्की और इस देश के बड़े उद्योगपति जब तब नरेंद्र मोदी को अपने सपनों का प्रधानमंत्री घोषित करते फिरते हैं). और तब आप यह सवाल दोहरा कर कुछ इस अंदाज में पूछ सकते हैं कि जो वामपंथी संगठन वहां थे, क्यों थे? क्या उन्हें लग रहा था कि इस देश के पूंजीपतियों और सांप्रदायिक ताकतों का चरित्र रातोंरात बदल गया है और वह जनता का भला चाहने लगे हैं? या यह कि गांधीवादी राजनीतिक ने अपना 'बुर्जुआ राष्ट्रवादी' चरित्र बदल कर सर्वहारा संघर्षों का बीड़ा उठा लिया है, और अगर उठा ही लिया है तो फिर इस देश में वामपंथी पार्टियों की जरूरत ही क्या रह जाती है?

यह तीन इस दिलचस्प जमावड़े का सिर्फ एक हिस्सा हैं. इस जमावड़े पर फिर से एक नजर डालिए. आपको यहाँ 'आरक्षण' को देश बांटने की साजिश बताने वाले श्री श्री रविशंकर मंच पर दिखेंगे, और आरक्षण समर्थन का दावा करने वाला वामपंथी पार्टी लिबरेशन का छात्र संगठन आइसा, आरक्षण विरोधी वामपंथी छात्र संगठन एआईडीएसओ के साथ मंच के सामने खड़े श्रोताओं में. यह वह जमावड़ा है जहाँ स्वघोषित 'गांधीवादी' अन्ना हजारे भ्रष्ट नेताओं के लिए 'फांसी' माँगते हुए दिखेंगे(गांधीवाद और फांसी का अंतर्संबंध समझेने में दिक्कत हो तो यह जान लें की अन्ना हजारे साहब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उसके नेता राज ठाकरे द्वारा किये गए हमलों के समर्थक थे. गलतबयानी का कोई आरोप लगे उससे पहले ही लिंक यह रहा--http://www.hindustantimes.com/Hazare-backs-Raj-s-tirade-against-Non-Marathis/Article1-368036.aspx
इन सबके साथ अभी कल तक 'कैबिनेट फिक्सिंग' और उसके परिणामस्वरुप हुए २-जी स्पेक्ट्रम घोटाले वाले राडिया काण्ड में शामिल रही 'बरखा दत्त' का चैनल एनडीटीवी भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही इस लड़ाई में आपको सबसे आगे खड़ा दिखेगा. वैसे अनशन समाप्ति के बाद धरना स्थल पर किये गए 'हवन' ने मीडिया के राडिया पर्व में शामिल रहे बड़े चैनलों/पत्रकारों की वहां लगातार उपस्थिति का तर्क समझा दिया, आखिर को विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा आयोजित धर्मसंसद में जाने वालेबाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर जैसे हिन्दू संतों की उपस्थिति से बेहतर मौका 'प्रायश्चित' करने के लिए मिलेगा भी कहाँ. इन हिन्दू/हिंदुत्ववादी संतों की इस आन्दोलन में उपस्थिति एक दूसरा सवाल भी खड़ा करती है, पब्लिक स्पेसेज में सेकुलर और सेक्रेड की हिस्सेदारी का सवाल. और याद रखिये कि जब धर्म सार्वजनिक जगहों पर प्रवेश करता है तब वह विवेक आधारित वर्तमान लोकतांत्रिक समाज की मूल्य चेतना के खिलाफ ही खड़ा होता है. अब विश्व हिन्दू परिषद् की धर्मसंसद में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कसम खाने वाले संतों के नेतृत्व में चले इस आन्दोलन में काफी सारी 'स्वघोषित' सेकुलर आत्माओं की शिरकत कुछ सवाल तो खड़ी करती ही है.

आखिर में झंझावत की तरह इस देश की राजनीतिक चेतना का नेता बन बैठे अन्ना हजारे की भी बात कर ली जाय. गांधीवादी अन्ना हजारे बीते कुछ दशकों से यदाकदा राजनैतिक चर्चा के केंद्र में आते ही रहे हैं. पिछली बार वह बनारस में दिए गए एक बयान में महारष्ट नवनिर्माण सेना द्वारा 'मुंबई' में 'बाहरी' लोगों पर किये जा रहे हमलों को समर्थन देने के कारण चर्चा में आये थे. उस बयान में उनका साफ़ साफ़ कहना था कि 'राज ठाकरे के कुछ विचार ठीक हैं, लेकिन सार्वजनिक और राष्ट्रीय समाप्ति को नुक्सान पंहुचाना ठीक नहीं है.' सबसे दिलचस्प बात यह है कि निर्दोष (और गरीब) लोगों पर किये जा रहे हमलों के बारे में कई बार कुरेदे जाने के बाद इस 'गांधीवादी' का कुल जमा कहना यह था कि 'अगर 'मनसे' हिंसक तरीके अपनायेगी तो यह 'राष्ट्र के हित में नहीं होगा'. आप (चाहें तो) साफ साफ़ देख सकते हैं कि यह राज ठाकरे और मनसे की सीधी आलोचना से बचने का वही कुटिल तरीका है जिसका आरोप हजारे साहब 'भ्रष्ट' नेताओं पर लगते रहते हैं. राज ठाकरे से अन्ना हजारे के रिश्ते इस समर्थन से लगभग एक दशक पहले १९९७ तक जाते हैं जब अन्ना और बाल ठाकरे के बीच की 'संवाद हीनता' को दूर करने के लिए राज ठाकरे ने मध्यस्थता की थी और दोनों को 'एक' करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. (चरित्रहनन या दुष्प्रचार का आरोप लगे उसके पहले ही यह दूसरा लिंक देख लें, http://www.indianexpress.com/Storyold/2922/ और यह भी ध्यान रखें कि यह दोनों लिंक किसी वामपंथी प्रोपेगेंडा अखबार से न लेकर अन्ना हजारे के कसीदे पढ़ रहे हिन्दुस्तान टाइम्स और इन्डियन एक्सप्रेस से लिए गए हैं). अब अगर यह राजनीति किसी को समझ आ जाए तब उसे यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होगी कि अन्ना हजारे गांधीवादी होने के बावजूद कैसे कह सकते हैं कि 'बाहरी लोगों द्वारा राज्य (महाराष्ट्र) में प्रभुत्व बनाने की कोशिश नाकाबिले बर्दाश्त है" (सन्दर्भ वही). एक गांधीवादी की यह भाषा बहुत कुछ कहती है, बस समझने को ज़रा सा दिमाग चाहिए.

यह और बात है कि उसी राज्य में भूख, गरीबी और कर्ज के मारे किसानों की आत्महत्या के खिलाफ इस योद्धा ने तलवार तो क्या कभी जबान तक नहीं चलाई. चलाते भी क्यों, विदर्भ के किसान किसी 'सिविल सोसायटी' का हिस्सा थोड़े ही थे. अब किससे पूछें, कैसे पूछें कि उन किसानों की मौत का हिसाब मांगने वाले इस 'खामोश संत' के साथ क्यों खड़े हैं. और इस संत से क्या पूछें कि भूख, कुपोषण, भुखमरी ये सब कभी इनकी किसी लड़ाई के केंद्र में क्यों नहीं आये.

जवाब है, बहुत सादा भी है, कि सरकारी संतों की परंपरा इस देश में कुछ नयी नहीं है. पता नहीं संत विनोबा भावे कितनो को याद हैं, और किन किन वजहों से याद हैं. पर मैं मुतमईन हूँ कि कुछ तो लोग होंगे जो उन्हें भूदान आन्दोलन के साथ साथ इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का समर्थन करने के लिए भी याद करते होंगे. मुझे पता नहीं संत अन्ना हजारे इतिहास में किन-किन वजहों से और किन किन कारनामों से याद रखे जाएंगे, पर यह जरूर है कि इतिहास विदर्भ में मर रहे किसानों की मुख्तारी का दावा करने वालों से जरूर पूछेगा कि वे वहां क्यों खड़े थे। और यह भी कि उन्होंने अपनी मशालें मोमबत्तियों से क्यों बदल ली थीं?

April 03, 2011

विश्वकप 2011- हम एक सपना हारे हुए लोग हैं..

बरसों पहले की बारिशों वाली एक शाम को इलाहाबाद शहर की सड़कों पे कुछ आवारगी और कुछ सायास घूमते हुए हम कुछ दोस्तों के क़दमों के साथ साथ हमारी बातचीत का रास्ता इस मुल्क में वामपंथ के हाल (या कि बदहाली) की तरफ घूम गया था. और उसी बातचीत के दौरान कोमरेड प्रदीप ने एक बहुत सादा पर बहुत बड़ी बात कही थी कि वामपंथ के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वह अक्सर कॉमन सेन्स (हिन्दी में सहजबोध) के खिलाफ खड़ा होने पर मजबूर होता है. जाना और जिया गया सच होने के बावजूद रूमानी क्रांतिकारिता से लबालब भरे (और जरूरत गैरजरूरत छलकते रहने के भी) उस दौर में हमें यह बात बहुत छोटी लगी थी. वैसे भी लगभग कोई भी बात अपनी नास्तिकता के ऐलान (और यह करने वाले हम अकेले नहीं थे) से शुरू करने को एक जरूरी राजनैतिक कार्यवाही मानने वाले हम लोग सामुदायिक सहजबोध को 'छद्म चेतना' से ज्यादा कुछ समझते भी कहाँ थे?

फिर, जिस समाज में हम जी रहे थे उसका सहजबोध गौरव करने लायक बहुत कुछ था भी नहीं. 20वीं सदी के आखिरी दशक में भी जातिगत गैरबराबरी की आदिकालीन बुराई को अपने कंधे पर ढोए जा रहे हमारे इस समाज ने कुछ अरसा पहले सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अतीतगामी रास्ता भी पकड़ लिया था. वह वक्त ज्यादा दूर नहीं थे जब उन वक्तों के कुछ अलमबरदारों को 'गाय' को 'दलितों' के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बताना था, और एक मुख्यमंत्री को अपने राज्य में चल रहे सामूहिक नरसंहार को 'क्रिया की स्वाभाविक प्रक्रिया' बताकर ख़ारिज करना था. और स्त्रियों के बारे में इस समाज के सहजबोध के बारे में तो खैर कुछ कहने की जरूरत थी ही नहीं. लड़कियों को क्या पहनना है क्या नहीं सिखाना शुरू करने से लेकर उनके चरित्र तक के बारे में चिंतित इस समाज का सहजबोध स्त्री के स्त्रीत्व से आगे उनके जीवन को स्वीकार करने को ना तब तैयार था और ना अब.

उन वक्तों में जब इलाहाबाद और तमाम अन्य विश्विद्यालयों में छात्रों को कमरे उनके जातिनाम के आधार पर दिए जाते थे, जब चुनावों में प्रत्याशी अपनी राजनैतिक सक्रियता के आधार पर नहीं बल्कि चुनावक्षेत्र में विभिन्न जातियों की संख्या के समीकरणों के आधार पर तय किये जाते हों, हम जातिप्रथा का उन्मूलन का सपना लिए बैठे थे. उन वक्तों में जब तमाम राजनीति मंदिर और मस्जिद के मालिकाने के आधार पर देशभक्ति नापने का यंत्र बनाने में जुटी हुई थी हम भगत सिंह का लेख 'मैं नास्तिक क्यूँ हूँ' बाँटने में लगे रहते थे. उस दौर में जब हिन्दी से लगायत अंगरेजी तक के तमाम अखबार 'उदारवाद' की विरुदावली गाने में लगे थे हम बाबासाहेब आंबेडकर के देखे आर्थिक लोकतंत्र के सपने को सफल बनाने में लगे थे. उन वक्तों में जब तब कोंग्रेस से लेकर भाजपा तक की सरकारें 'कल्याणकारी राज्य' के आदर्श को अमरीकी दबाव में मुक्त बाजार में गिरवी रखे जा रहे थे हम सर्वहारा संघर्षों की 'अनश्वर अग्निशिखाओं' को अपने अन्दर रोशन किये बैठे थे.

ऐसे में जातिवाद, साम्प्रदायिकता, पितृसत्ता, पूंजीवाद, और देश पर लादी जा रही मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ खड़े हम उस समाज के सहजबोध के मुताबिक़ 'मिसफिट' तो थे ही, उसके प्रतिपक्ष के सिवा कुछ हो भी नहीं सकते थे. और हम सिर्फ प्रतिपक्ष बने रहने को तैयार नहीं थे. हमने सारी उम्र इस सहजबोध से लड़ने का, और एक ईमानदार वैकल्पिक सहजबोध गढ़ने का सपना देखा था. और फिर, उस उदास, पर उम्मीदों भरी शाम में हमारी आँखों की चमक कुछ बढ़ी ही थी. इस दुनिया को और बेहतर, और बराबर और मानवीय बनाने की ख्वाहिशों की उजास दिलोदिमाग की देहरी पार कर हमारी आँखों में उतर आयी थी.

आज, उस शाम के करीब एक दशक बाद, क्रिकेट विश्वकप में भारत की जीत पर इतराते करोड़ों लोगों को देख कर फिर समझ आया कि हज़ार कोशिशों के बावजूद, हम और अपनी अपनी जगहों पर अपने अपने तरीकों से यह लड़ाई लड़ते हमारे जैसे तमाम लोग उस सपने के करीब भी नहीं पंहुच पाए हैं. दुनिया अब भी उतनी ही निर्मम है, उतनी ही गैरबराबर, बस 'अफीम' बदल गयी है. पहले सिर्फ 'धर्म' जनता की अफीम होती थी अब क्रिकेट भी है. वरना क्या वजह होती 121 करोड़ लोगों वाले देश में जहाँ हर रात 70 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हों वहाँ एक खेल के नाम पर ऐसा पागलपन ऐसी फिजूलखर्ची की जाय. क्या वजह हो सकती है, कि 900 करोड़ रुपये का विशुद्ध मुनाफ़ा कमाने वाले इस आयोजन को टैक्स माफी दे दी जाए और कहीं कोई उफ़ तक ना हो. उसी मुल्क में जहाँ 1 लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या की बाद कर्ज माफी के खिलाफ कोर्पोरेट घरानों और उनके पालतू अखबारों ने आसमान सर पर उठा लिया था.

मसला सिर्फ मनोरंजन का नहीं है. मनोरंजन हर खेल से होता है. पर टैक्स माफी मनोरंजन के लिए तो नहीं होती. वह राष्ट्रीय हित के लिए होती है , होनी चाहिए . और 900 करोड़ मुनाफे (केवल आयोजन समिति का, अभी इसमें प्रसारणकर्ता चैनलों का मुनाफा शामिल नहीं है) वाला आयोजन टैक्स दे कर राष्ट्र हित कर सकता है, टैक्स माफी ले कर नहीं. अब इसमें यह जोड़ लें कि तमाम उन्माद पैदा करने की कोशिशों के बावजूद इस विश्वकप को भारत में देखने वालों (मैदान और टेलीविजन पर जोड़ कर) 7 करोड़ से ज्यादा नहीं रही है. पर शायद यही 7 करोड़ लोग हैं जिनका सहजबोध 'राष्ट्रीय सहजबोध' होता है, जिनका हित 'राष्ट्रीय हित' होता है और जिनकी जीत राष्ट्रीय जीत होती है. क्या हुआ, कि ११४ करोड़, या कि राष्ट्र के ९४.२ प्रतिशत नागरिक इनमे शुमार नहीं होते.

मौका है इस जीत के नशे में डूब जाने का और मान लेने का कि सब कुछ सही है, अब कहीं कोई गड़बड़ नहीं है. मौका है मान लेने का कि कोई 2-जी घोटाला नहीं हुआ, कहीं कारगिल के शहीदों के नाम पे कोई लूट नहीं हुई, कि देश आगे जा रहा है, विश्वविजेता है.

प्रगति, विकास, और बाजार की इस दौड़ में पीछे छूट गए इस देश के 114 करोड़ 'नागरिकों' को भूल जाने का भी शायद यही सबसे अच्छा मौका है. अब इसका क्या करें कि भुलाए नहीं भूलता कि विश्वकप चाहे जीत गए हों, हम एक सपना हारे हुए लोग हैं.