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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

March 22, 2011

कहीं से भी छेड़ो, बनारस में कोई भी सुर बेसुरा नहीं होता!

शहर बनारस के दिन, मोहल्ला अस्सी की शामें : 1
[मोहल्ला में प्रकाशित.. लिंक यह रहा..http://mohallalive.com/2011/03/22/travelogue-on-banaras-by-samar-anarya-part-one/

बनारस एक शहर नहीं बल्कि एक मिजाज का नाम है। समय के दबाव को ठेंगे पर रखने वाला मिजाज, मोबाइल फोन वाले इन वक्तों में ट्रंक काल बुक करने वाला मिजाज और काशीनाथ सिंह के अंदाज में कहें तो एक बड़ा सा कद्दू कांधे पर रख लेने के बाद अपने आप को जहांपनाह समझने वाला मिजाज। इस शहर को मैंने जाना कम है, जिया ज्यादा। वह भी सिर्फ अपनी जिंदगी में नहीं बल्कि उन तमाम यार-दोस्तों से भी, जिनकी जिंदगी के काफिले (या कि जुलूस भी) इस शहर के रास्तों से होकर निकले हैं। पर शहरों को जीने के अपने खतरे होते हैं, अपने ही हादसे भी। मेरी जिंदगी में वह हादसा हुआ काशी बाबा का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ आने के बाद। उस उपन्यास, या आख्यान (या जो कुछ भी वह था, आप ही तय कर लें) को पढ़ते हुए इस शहर के अर्थ कम से कम मेरी जिंदगी में तो हमेशा के लिए बदल गये। और इसलिए जब अविनाश भाई ने उसी ‘काशी का अस्सी’ पर बन रही फिल्म की शूटिंग देखने का न्योता दिया, तो बस हम दौड़ पड़े। और साथ दौड़ पड़ी अपनी कुल जमा 31 साला जिंदगी में बनारस से जुड़ी यादों की रेलगाड़ी भी।

इस शहर से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। इतना कि उसमें छुपाने वाली भी कई चीजें हैं। जैसे कि यह कि इस शहर में पहली बार तेरह बरस की उम्र में आया था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक रज्जू भैया के कार्यक्रम में बांसुरी बजाने। पर यह किस्सा तब का है, जब गोरखपुर में शिशु मंदिर में पढ़ता था और विद्यालय के ‘घोष’ में बांसुरी (गो कि यार-दोस्त मेरे बजाये को सारी उम्र ‘बेसुरी’ कहते रहे) बजाता था। एक खांटी गांधीवादी पिता के बेटे होने की वजह से संघ तब भी अच्छा नहीं लगता था। यूं भी पापा ने कभी संघियों को ‘हत्यारे’ के अलावा कुछ और कहकर पुकारा नहीं पर संघ से उनकी नफरत एक जगह थी, और सोनौली से लेकर फैजाबाद तक के उस इलाके में उस स्कूल का सबसे अच्छा होना दूसरी। तो बेटे की तरक्की की चाह वाले पिता ने दिल पर पत्थर रख कर उस स्कूल में पढ़ने तो भेज दिया, पर हर चिट्ठी में (1992 में तो टेलीफोन तक आम नहीं हुए थे, और मोबाइल फोन कम से कम एक दशक दूर) यह बताना नहीं भूले कि बेटा यह लोग अच्छे लोग नहीं हैं, स्कूल में सिर्फ सीबीएसई वाली किताबें पढ़ना, इनकी वाली नहीं। गर्व होता है कि मैंने अब तक के जीवन में पिता की सिर्फ एक बात मानी और वह यही थी। बावजूद इसके कि पिता मेरे कम्‍युनिस्ट हो जाने पर शायद उतना ही दुखी हुए, आज भी हैं, जितना उधर जाने पर होते। तो तेरह साल की उम्र में बनारस की वह यात्रा दिमाग में पूरी दर्ज नहीं हुई, सिवाय इसके कि जब पूरी टोली दर्शन के लिए विश्वनाथ मंदिर जा रही थी, तो हम तीन दोस्त नश्वरता के सत्य का साक्षात्कार करने मणिकर्णिका घाट भाग आये थे। हां, इस दुस्साहस की वजह के पीछे कोई संन्यासी होने की चाह नहीं बल्कि गांव में किसी से सुनी हुई यह बात थी कि रात भर जलती चिता देख लो तो फिर कभी किसी चीज से डर नहीं लगेगा।

(…और किसी चीज से डर गया हो या नहीं, भागने के बाद ‘आचार्यजी’ से मिली पिटाई ने कम से कम मन से उनका डर और सम्मान दोनों निकाल दिया)

उस घटना के बाद बनारस लौटना हुआ करीब 19 बरस की उम्र में। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लेने और वामपंथी छात्र राजनीति में सक्रिय होने के करीब दो बरस बाद। वैसे भी बनारस इलहाबाद शहर से कुल जमा 125 किलोमीटर या यूं कहें की सिर्फ तीन घंटे दूर है। और भारतीय रेल की कृपा और इलाहाबादी छात्रों के कभी टिकट न खरीदने वाले विशेषाधिकार जैसी बन गयी आदत के चलते यह दूरी कभी दूरी जैसी लगी भी नहीं। इसमें यह और जोड़ लें कि एक बार बनारस पंहुचने के बाद किसी भी कॉमरेड के कमरे में ‘गिर पड़ने’ (‘कब गिरे बनारस में बे’ वाले अंदाज में) की सहूलियत ने सिर्फ इस दूरी को थोड़ा और कम ही करना था। बस फिर क्या, अब तो बनारस क्या, भदोही से शुरू कर गांव लोहता तक, विद्यापीठ से लेकर बड़ागांव डिग्री कॉलेज तक तमाम राजनैतिक/सामाजिक कार्यवाहियों में हिस्सा लेते हुए हम बनारस से उलझते रहे और बनारस हमसे।

अस्सी घाट पर बैठना भी उन्‍हीं दिनों में शुरू हुआ था। कभी तमाम साथियों के साथ, कभी अकेले। घाट-घाट भटकने की आदत भी तभी लगी। अब इस भटकने में अस्सी घाट पर उपलब्ध ‘होली साहित्य’ की खोज और उसका रसास्वादन शामिल था या नहीं, इसका जिक्र कभी और सही। हां, यह जिक्र करना जरूरी है कि इस बनारस से इन तमाम मुठभेड़ों में एक बार बीएचयू में एमए की प्रवेश परीक्षा देने आयी बहन भी साथ थी। तो बहन ने सुबह परीक्षा दी और दिनभर तमाम मंदिरों को अनुग्रहित करने के बाद शाम को दशाश्वमेध घाट जाने की इच्छा व्यक्त की। और बस गोकुल, खदीजा, रंजना, मैं, मूसा और भी काफी सारे दोस्त घाट आये। खाना पैक करके वहीं ले आया गया था। खुला तो बहन को काटो तो खून नहीं। मुंह से बस ये निकला कि भैया ये लोग ‘नॉनवेज’ खाएंगे? मेरा हिचकिचाता हुआ जवाब था, हां, चलो हमलोग नीचे बैठ कर खाते हैं। समूह शाकाहारी और मांसाहारियों के दो धड़ों में बंट गया। खाना तो खैर बहन ने जैसे-तैसे खा लिया, पर फिर ‘गंगाजल’ साथ में ले जाने के लिए लायी खाली बोतल वहीं छोड़ दी। सारे रास्ते मुंह फुलाये बैठी बहन के गुस्से का कारण पता चला गांव वापस पंहुचने के बाद, “मम्मी… भैया इतने दुष्ट हो गये हैं कि नॉन वेज खाने वालों के साथ रहते हैं और ऊपर से उन लोगों ने नॉन वेज खा के गंगा मैया में हाथ धो लिया।” बदतमीज होने के आरोप से सिर्फ इसलिए बच पाया कि उम्र में बहन से बड़ा हूं और बहन का गंगा मां की शान में की गयी गुस्ताखी के खिलाफ गुस्सा बड़े भाई के प्रति सहज सम्मान से बड़ा नहीं हो पाया।

खैर, 2002 में इलाहाबाद से खेत होकर जेनयू को प्यारे हो जाने के बाद भी बनारस से मुठभेड़ें भी जारी रहीं और उन मुठभेड़ों से पैदा होने वाली तमाम खट्टी मीठी यादों का सिलसिला भी। पर इन व्यक्तिगत यादों के तमाम सिलसिले जब तब टकराते रहे ‘काशी का अस्सी’ से। हर बार लगता रहा कि अपने जाने हुए ‘अस्सी’ में कितना कुछ कम है ‘काशी’ के अस्सी से। सोचता रहा कि उनसे मिलूं, बनारस में मौजूद तमाम राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रहे तमाम दोस्तों के काशी बाबा से संबंधों की वजह से यह कोई ख़ास मुश्किल काम भी नहीं था। पर हमेशा मन में एक डर बना रहा कि कहीं ऐसा न हो कि ‘सायास’ मिलने पर मन में ‘अनायास’ बनी उनकी छवि दरक जाए… और इसीलिए इस बार अविनाश के बुलावे पर हुई काशीनाथ जी के साथ साथ चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी, मंदिरा जी, अखिलेश धर जी, और काशी बाबा के बेटे-बहू से हुई अनायास मुलाकातों ने दिल के सितार के तमाम तार छेड़ दिये हैं। और अब तार छिड़ ही गये हैं, तो कुछ तो बजेगा। भला आदमी हूं, बस्ती जिले का हूं, काशी और खास तौर पर अस्सी का नहीं, इसलिए अब जो बजेगा, वह सुर में होगा या बेसुरा, मेरे ठेंगे पर।

(आप समझ ही गये होंगे कि अस्सी का होता तो कहां रखता…)

तो बस अब कुछ दिन बजता रहूंगा… आप सुनते-पढ़ते रहिए…

3 comments :

  1. good to aap lekhk bhi hai ye to mujhe pta he nhi tha.

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  2. बेहद खूबसूरती से आपने बयान किया....बनारस में अभी भी बहुत 'रस' है...

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  3. किसी की यादों से होकर किसी शहर से गुजरना गजब भला सा लगता है। तस्वीर बहुत सुन्दर खींची है।

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