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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

March 26, 2011

हमारा शहीद भगत सिंह 'आर्यवीर' नहीं है.

[२३ मार्च २०११ को 'स्मृतियों की ताकत' शीर्षक से जनसत्ता में प्रकाशित]


'राजघाट' सब जानते हैं, फिरोजशाह कोटला मैदान भी. पर इनदोनो मशहूर जगहों से जरा सा आगे बढ़ते ही आईटीओ के ठीक पहले पड़ने वाले 'शहीद भगत सिंह पार्क' को कम ही लोग जानते होंगे. उससे भी कम लोग जानते होंगे कि नामों की राजनीति करने वाले इन वक्तों में यह सिर्फ एक और नाम नहीं है वरन भारत राष्ट्र के इतिहास का एक मीलपत्थर है, इस देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा का एक तीर्थस्थल. यही वह जगह है, जहां सितंबर 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की वह स्थापना बैठक हुई थी, जिसमें चंद्रशेखर आजाद को नेतृत्व और भगतसिंह को विचारधारात्मक नेतृत्व सौंपा गया था। राष्ट्र-निर्माताओं की स्मृतियों से जुड़ी इन दो जगहों में से एक की प्रसिद्धि (जो जरूरी भी है वाजिब भी) और एक की गुमनामी अकारण नहीं है. दरअसल, यह अंतर हमारे राष्ट्र और इतिहास-बोध, दोनों के सामने एक ठिठका हुआ सवाल खड़ा करता है।

साफ़ है कि स्मृतियों के सम्मान का मसला उतना भी सीधा और आसान नहीं होता जितना ''महान लोगों की तुलना में गुमनाम लोगों की स्मृतियों को सम्मान देना बहुत कठिन है'' कहते हुए प्रख्यात दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन ने सोचा होगा. यहां मसला सिर्फ महानता का नहीं है। आखिरकार भगतसिंह और उनके साथी अपनी महानता में किसी से कम नहीं हैं। मसला है सत्ता के लिए स्मृतियों की उपादेयता का। शासक वर्गों के लिए वैसी स्मृतियों का कोई मोल नहीं होता, जिन्हें वह अपना हित साधने के लिए इस्तेमाल न कर सके।

भगतसिंह की स्मृति एक ऐसी ही स्मृति है, जो काम आने की जगह उनके खिलाफ खड़ी हो जाती है। जैसे कि 1928 की उस बैठक में उन्होंने साथियों के साथ मिल कर तय किया था कि उनके संगठन का लक्ष्य सिर्फ आजादी नहीं, बल्कि समाजवाद है। और यह भी कि उन्होंने अपनी मां को एक खत में लिखा था कि ‘यकीनन एक दिन भारत आजाद होगा, पर मुझे डर है कि तब गोरे साहबों की खाली की हुई कुर्सियों पर भूरे साहब काबिज हो जाएंगे।’ उन्हें पता था कि मालिक बदलने से गुलामी खत्म नहीं हो जाती। यह भी कि इस मुल्क की आजादी जाति और धर्म आधारित भेदभावों पर टिके हुए इस समाज के बर्बर और पूर्व-आधुनिक बुनियादी ढांचे को ध्वस्त किये बिना हासिल नहीं की जा सकती। उनका ‘अछूत समस्या’ पर लिखा गया लेख यहां खत्म होता है कि अगर हमने आजादी का राजनीतिक लक्ष्य जाति-प्रथा और धार्मिक कट्टरपंथ को खत्म करने वाली एक सामाजिक क्रांति के बिना पा भी लिया, तो वह क्रांति न स्थायी होगी न अंतिम। उनका यह कथन उन्हें जोतिबा और बाबासाहेब आंबेडकर के साथ खड़ा कर देता है।

और यही वह चीज है, जो उन्हें सत्ता के लिए अप्रासंगिक बना देती है.शायद कहने की जरूरत ही नहीं है, कि आजादी की लड़ाई के वक्त बुने गए सपनों को बेच कर खा गए सत्ता वर्ग के लिए जोतिबा और बाबा साहब के साथ खड़ा होना सिर्फ अप्रासंगिक होना ही नहीं शत्रु होना भी है.

पर शासकवर्ग की दिक्कत यह है कि देश की आमजनता के दिलों में बसे भगत सिंह को वह चाह कर भी ख़ारिज नहीं कर सकता. हाँ, वह उनके विचारों की ताकत से सहमा जरूर रहता है. और तब सत्ता उनसे लड़ने के लिए अपना सबसे कारगर हथियार इस्तेमाल करती है. हज़ार बार बोल कर झूठ को सच बनाने का यह गोएबल्सिया हथियार स्मृतियों की चोरी के भी काम आता है और इसी से सत्ता अपनी गरिमा, ताकत और यहाँ तक की कमजोरियों के साथ खड़े मानवीय भगत सिंह के असली चेहरे को चुरा कर उन्हें एक महामानव की मूर्ति के रूप में गढ़ना शुरू कर देती है. धीरे धीरे भगत सिंह का हैट केसरिया पगड़ी में बदलने लगता है, और उनके सिर्फ मूंछ वाले चेहरे की जगह धीरे धीरे एक पूरी दाढ़ी वाला आदमी लेने लगता है.

यह वह जगह है जहाँ भगत सिंह की स्मृतियाँ चुराने की सत्ता की कोशिश (लगभग) सफल हो जाती है. केसरिया पगड़ी और दाढ़ी वाला यह आदमी अब हमारा भगत सिंह नहीं रह जाता, वरन हुक्मरानों के काम आने वाला एक 'प्रतीक' बन जाता है. अशफाक उल्लाह खान का दोस्त, अपनी फांसी के बस चंद रोज पहले 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' जैसा लेख लिखने वाला, अमृत छकने से इनकार करने वाला, और समाजवादी भगत अचानक से 'आर्यवीर शहीद भगत सिंह' में बदलने लगता हैं. (शुक्र है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवादी हिन्दी में 'शहीद' का सही और सादा अनुवाद उन्हें आज भी नहीं मिला है). सोचिये कि 'हम में से जो लोग संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए काम करते हैं, वे धर्म को मानसिक गुलामी मानते हैं' कहने वाला, शख्स और कुछ भी हो, आर्यवीर कैसे हो सकता है?

इन सवालों का मतलब भी बहुत साफ़ है, और जवाब भी. कुछ महापुरुषों की स्मृतियाँ सत्ता के काम आ सकती हैं और आती हैं. जैसे की गांधीजी के लिए मेरे मन में पूरे सम्मान के बावजूद 'वर्णव्यवस्था' का उनका समर्थन इस मुल्क के सामंतवादियों को ताकत देता है जबकि जातिप्रथा को सीधी चुनौती देने वाले भगत सिंह उनके लिए शत्रु बन कर खड़े हो जाते हैं. कि इस बाजारवादी व्यवस्था और शासनपद्धति का 'कोई विकल्प नहीं है' का नारा देने वालों को 'इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है' कहने वाले भगत सिंह डरायेंगे ही. शायद यही देख कर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शहादतदिवस २३ मार्च को ही शहीद हुए क्रन्तिकारी कवि अवतार सिंह पाश ने भगत सिंह के लिए लिखा था ''शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था, ईश्वर की तरह, लेकिन ईश्वर की तरह निस्तेज नहीं था." सोचिये, कि हर अन्याय के खिलाफ जान तक देकर लड़ना सिखाने वाले भगत सिंह को क्या हम 'निस्तेज' होते देख सकते हैं? अगर नहीं तो यह समय उनकी स्मृतियों को बेईमान हाथों से वापस छीन लेने का है.

और भगत सिंह की स्मृतियों को बेईमान हाथों से वापस छीन लेने का सिर्फ एक हथियार है, उनको अपने दिलों में जिन्दा रखना और उनके विचारों को जीना. सिर्फ यही है जो भगत सिंह और उनकी विरासत को निस्तेज होने से बचा सकता है. आखिर में भगत सिंह और उनके साथियों के लिए ..

मेरी साँस साँस इस बात की शाहिद है दोस्त/
के लुत्फ़ के हर मौके में मैंने तुम्हे याद किया//

March 22, 2011

कहीं से भी छेड़ो, बनारस में कोई भी सुर बेसुरा नहीं होता!

शहर बनारस के दिन, मोहल्ला अस्सी की शामें : 1
[मोहल्ला में प्रकाशित.. लिंक यह रहा..http://mohallalive.com/2011/03/22/travelogue-on-banaras-by-samar-anarya-part-one/

बनारस एक शहर नहीं बल्कि एक मिजाज का नाम है। समय के दबाव को ठेंगे पर रखने वाला मिजाज, मोबाइल फोन वाले इन वक्तों में ट्रंक काल बुक करने वाला मिजाज और काशीनाथ सिंह के अंदाज में कहें तो एक बड़ा सा कद्दू कांधे पर रख लेने के बाद अपने आप को जहांपनाह समझने वाला मिजाज। इस शहर को मैंने जाना कम है, जिया ज्यादा। वह भी सिर्फ अपनी जिंदगी में नहीं बल्कि उन तमाम यार-दोस्तों से भी, जिनकी जिंदगी के काफिले (या कि जुलूस भी) इस शहर के रास्तों से होकर निकले हैं। पर शहरों को जीने के अपने खतरे होते हैं, अपने ही हादसे भी। मेरी जिंदगी में वह हादसा हुआ काशी बाबा का उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ आने के बाद। उस उपन्यास, या आख्यान (या जो कुछ भी वह था, आप ही तय कर लें) को पढ़ते हुए इस शहर के अर्थ कम से कम मेरी जिंदगी में तो हमेशा के लिए बदल गये। और इसलिए जब अविनाश भाई ने उसी ‘काशी का अस्सी’ पर बन रही फिल्म की शूटिंग देखने का न्योता दिया, तो बस हम दौड़ पड़े। और साथ दौड़ पड़ी अपनी कुल जमा 31 साला जिंदगी में बनारस से जुड़ी यादों की रेलगाड़ी भी।

इस शहर से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। इतना कि उसमें छुपाने वाली भी कई चीजें हैं। जैसे कि यह कि इस शहर में पहली बार तेरह बरस की उम्र में आया था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघ चालक रज्जू भैया के कार्यक्रम में बांसुरी बजाने। पर यह किस्सा तब का है, जब गोरखपुर में शिशु मंदिर में पढ़ता था और विद्यालय के ‘घोष’ में बांसुरी (गो कि यार-दोस्त मेरे बजाये को सारी उम्र ‘बेसुरी’ कहते रहे) बजाता था। एक खांटी गांधीवादी पिता के बेटे होने की वजह से संघ तब भी अच्छा नहीं लगता था। यूं भी पापा ने कभी संघियों को ‘हत्यारे’ के अलावा कुछ और कहकर पुकारा नहीं पर संघ से उनकी नफरत एक जगह थी, और सोनौली से लेकर फैजाबाद तक के उस इलाके में उस स्कूल का सबसे अच्छा होना दूसरी। तो बेटे की तरक्की की चाह वाले पिता ने दिल पर पत्थर रख कर उस स्कूल में पढ़ने तो भेज दिया, पर हर चिट्ठी में (1992 में तो टेलीफोन तक आम नहीं हुए थे, और मोबाइल फोन कम से कम एक दशक दूर) यह बताना नहीं भूले कि बेटा यह लोग अच्छे लोग नहीं हैं, स्कूल में सिर्फ सीबीएसई वाली किताबें पढ़ना, इनकी वाली नहीं। गर्व होता है कि मैंने अब तक के जीवन में पिता की सिर्फ एक बात मानी और वह यही थी। बावजूद इसके कि पिता मेरे कम्‍युनिस्ट हो जाने पर शायद उतना ही दुखी हुए, आज भी हैं, जितना उधर जाने पर होते। तो तेरह साल की उम्र में बनारस की वह यात्रा दिमाग में पूरी दर्ज नहीं हुई, सिवाय इसके कि जब पूरी टोली दर्शन के लिए विश्वनाथ मंदिर जा रही थी, तो हम तीन दोस्त नश्वरता के सत्य का साक्षात्कार करने मणिकर्णिका घाट भाग आये थे। हां, इस दुस्साहस की वजह के पीछे कोई संन्यासी होने की चाह नहीं बल्कि गांव में किसी से सुनी हुई यह बात थी कि रात भर जलती चिता देख लो तो फिर कभी किसी चीज से डर नहीं लगेगा।

(…और किसी चीज से डर गया हो या नहीं, भागने के बाद ‘आचार्यजी’ से मिली पिटाई ने कम से कम मन से उनका डर और सम्मान दोनों निकाल दिया)

उस घटना के बाद बनारस लौटना हुआ करीब 19 बरस की उम्र में। इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लेने और वामपंथी छात्र राजनीति में सक्रिय होने के करीब दो बरस बाद। वैसे भी बनारस इलहाबाद शहर से कुल जमा 125 किलोमीटर या यूं कहें की सिर्फ तीन घंटे दूर है। और भारतीय रेल की कृपा और इलाहाबादी छात्रों के कभी टिकट न खरीदने वाले विशेषाधिकार जैसी बन गयी आदत के चलते यह दूरी कभी दूरी जैसी लगी भी नहीं। इसमें यह और जोड़ लें कि एक बार बनारस पंहुचने के बाद किसी भी कॉमरेड के कमरे में ‘गिर पड़ने’ (‘कब गिरे बनारस में बे’ वाले अंदाज में) की सहूलियत ने सिर्फ इस दूरी को थोड़ा और कम ही करना था। बस फिर क्या, अब तो बनारस क्या, भदोही से शुरू कर गांव लोहता तक, विद्यापीठ से लेकर बड़ागांव डिग्री कॉलेज तक तमाम राजनैतिक/सामाजिक कार्यवाहियों में हिस्सा लेते हुए हम बनारस से उलझते रहे और बनारस हमसे।

अस्सी घाट पर बैठना भी उन्‍हीं दिनों में शुरू हुआ था। कभी तमाम साथियों के साथ, कभी अकेले। घाट-घाट भटकने की आदत भी तभी लगी। अब इस भटकने में अस्सी घाट पर उपलब्ध ‘होली साहित्य’ की खोज और उसका रसास्वादन शामिल था या नहीं, इसका जिक्र कभी और सही। हां, यह जिक्र करना जरूरी है कि इस बनारस से इन तमाम मुठभेड़ों में एक बार बीएचयू में एमए की प्रवेश परीक्षा देने आयी बहन भी साथ थी। तो बहन ने सुबह परीक्षा दी और दिनभर तमाम मंदिरों को अनुग्रहित करने के बाद शाम को दशाश्वमेध घाट जाने की इच्छा व्यक्त की। और बस गोकुल, खदीजा, रंजना, मैं, मूसा और भी काफी सारे दोस्त घाट आये। खाना पैक करके वहीं ले आया गया था। खुला तो बहन को काटो तो खून नहीं। मुंह से बस ये निकला कि भैया ये लोग ‘नॉनवेज’ खाएंगे? मेरा हिचकिचाता हुआ जवाब था, हां, चलो हमलोग नीचे बैठ कर खाते हैं। समूह शाकाहारी और मांसाहारियों के दो धड़ों में बंट गया। खाना तो खैर बहन ने जैसे-तैसे खा लिया, पर फिर ‘गंगाजल’ साथ में ले जाने के लिए लायी खाली बोतल वहीं छोड़ दी। सारे रास्ते मुंह फुलाये बैठी बहन के गुस्से का कारण पता चला गांव वापस पंहुचने के बाद, “मम्मी… भैया इतने दुष्ट हो गये हैं कि नॉन वेज खाने वालों के साथ रहते हैं और ऊपर से उन लोगों ने नॉन वेज खा के गंगा मैया में हाथ धो लिया।” बदतमीज होने के आरोप से सिर्फ इसलिए बच पाया कि उम्र में बहन से बड़ा हूं और बहन का गंगा मां की शान में की गयी गुस्ताखी के खिलाफ गुस्सा बड़े भाई के प्रति सहज सम्मान से बड़ा नहीं हो पाया।

खैर, 2002 में इलाहाबाद से खेत होकर जेनयू को प्यारे हो जाने के बाद भी बनारस से मुठभेड़ें भी जारी रहीं और उन मुठभेड़ों से पैदा होने वाली तमाम खट्टी मीठी यादों का सिलसिला भी। पर इन व्यक्तिगत यादों के तमाम सिलसिले जब तब टकराते रहे ‘काशी का अस्सी’ से। हर बार लगता रहा कि अपने जाने हुए ‘अस्सी’ में कितना कुछ कम है ‘काशी’ के अस्सी से। सोचता रहा कि उनसे मिलूं, बनारस में मौजूद तमाम राजनीतिक, साहित्यिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम कर रहे तमाम दोस्तों के काशी बाबा से संबंधों की वजह से यह कोई ख़ास मुश्किल काम भी नहीं था। पर हमेशा मन में एक डर बना रहा कि कहीं ऐसा न हो कि ‘सायास’ मिलने पर मन में ‘अनायास’ बनी उनकी छवि दरक जाए… और इसीलिए इस बार अविनाश के बुलावे पर हुई काशीनाथ जी के साथ साथ चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी, मंदिरा जी, अखिलेश धर जी, और काशी बाबा के बेटे-बहू से हुई अनायास मुलाकातों ने दिल के सितार के तमाम तार छेड़ दिये हैं। और अब तार छिड़ ही गये हैं, तो कुछ तो बजेगा। भला आदमी हूं, बस्ती जिले का हूं, काशी और खास तौर पर अस्सी का नहीं, इसलिए अब जो बजेगा, वह सुर में होगा या बेसुरा, मेरे ठेंगे पर।

(आप समझ ही गये होंगे कि अस्सी का होता तो कहां रखता…)

तो बस अब कुछ दिन बजता रहूंगा… आप सुनते-पढ़ते रहिए…