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February 16, 2011

देवा शरीफ में माँ विंध्यवासिनी



[तहजीब का बुलंद झंडा शीर्षक से २५ फरवरी २००११ को जनसत्ता में प्रकाशित]

देवा शरीफ़ यानी एक उनींदा सा क़स्बा जिसको जानने की सिर्फ एक वजह है यहाँ मौजूद सरकार वारिस पाक़ की दरगाह.बाबा वारिस इसी नाम के दो महान सूफी संतों में से एक थे. पहले वाले थे हीर रांझे की मुहब्बत को अमर बना देने वाले सैयद वारिस अली शाह. वही बाबा वारिस जिनको बंटवारे के वक़्त के खूनखराबे से तड़प कर अमृता प्रीतम पुकार उठी थीं-- अज आखां वारिस शाह नू कितों कबरां विचो बोल ! ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का खोल ! इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख -लिख मारे वेन/ अज लखा धीयाँ रोंदिया तैनू वारिस शाह नू कहन. हीर की आँखों के आंसुओं को एक सामंती समाज की मुखालफत का हथियार बना लेने वाले बाबा वारिस के अलावा अमृता आखिर पुकारतीं भी तो किसको? और दूसरे, देवा वाले बाबा वारिस पाक़ नफरतों से भरी दुनिया को इश्क-ए-हक़ीकी का पाठ पढ़ाने वाली इसी सूफियाना विरासत के एक अलम्बरदार थे और उनकी दरगाह वाला ये कस्बा सूफी सिलसिलों का एक महत्वपूर्ण केंद्र.

बहन की शादी के बाद उसकी मन्नत के सिलसिले में अभी पिछले हफ्ते इस क़स्बे में जाना हुआ. लखनऊ से बाहर निकलते ही यह अहसास होना शुरू हो गया कि कि भौगोलिक रूप से लखनऊ से सिर्फ ४० किलोमीटर दूर बसा हुआ यह क़स्बा हकीकतन लखनऊ से सदियों दूर है. कारों के लिए बनाये जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों की गरीब सौतेली बहनों सी दिखती टूटती हुई सड़क, बिजली से मरहूम चौराहों की बिना होर्डिंग्स और नियोन लाईट वाली दुकानें, और तेजी से निकल रही कारों को देखती सूनी ऑंखें, इन सबमे यह दूरी साफ़ नुमायाँ हो रही थी. जाने क्यूँ सत्ता के गलियारों और गरीब किसानों की झोपड़ियों की यह दूरी मन को राही मासूम राजा के 'आधा गाँव' के गंगौली में खींच ले गयी. महसूस हुआ कि गंगौली की तरह देवा शरीफ भी शायद उन रास्तों में पड़ता है जिनसे होकर जिंदगी के काफिले नहीं गुजरते. मन में सवाल उठा की क्या यह दूरी सिर्फ नकारात्मक है, क्या इसमें कुछ ऐसा भी है जो सहेज लेने, संभाल लेने के लायक है. इन दूरियों में शायद कुछ हो जिसने देवा को, या कि देवा जैसे तमाम मुफ्फसिल इलाकों को आज की दुनिया में भरे जहर से बचा लिया हो!

इस सवाल का जवाब देवा शरीफ़ पंहुचते ही मिल गया. कार पार्किंग में लगाते हुए सामने खड़ी कार के ऊपर नज़र गयी तो कार की विंडस्क्रीन के ऊपर लाल (या कि गेरुआ) रंगों में बड़े बड़े अक्षरों में लिखे शब्दों 'जय माँ विंध्यवासिनी' ने मन को बाँध सा लिया. फिर लगा कि इसमें ऐसा ख़ास क्या है, सूफी दरगाहें सदियों से सभी धर्मों की श्रद्धा का केंद्र रही हैं. पर एक नास्तिक की शाश्वत संशयात्मा को इतने सीधे और सपाट जवाब से न संतोष होना था न हुआ, आम आदमी की श्रद्धा एक बात है और उसकी श्रद्धा के ठेकेदारों के फैसले बिलकुल दूसरे. और सूफी दरगाहों और खानकाहों से सारे ठेकेदारों को बराबर दिक्कत है क्यूंकि कौमी एकता के इन प्रतीक केन्द्रों के जिन्दा रहने से बंटवारे की दुकानें बंद होने लगती हैं. इसीलिए एक तरफ हमें मिलते हैं अहमदाबाद में बाबा वाली दक़नी की मजार को ज़मींदोज़ कर रातोंरात उसपर सड़क बनवादेने वाले हिन्दू धर्मांध ठेकेदार और दूसरी तरफ इन दरगाहों को इस्लाम का बिगड़ा रूप बताकर यहाँ जियारत करने वाले मुसलामानों को कब्र और मजारपरस्त बताने वाले तालिबानी तबलीगी!

तब समझ आया कि यह कार सिर्फ एक कार नहीं वरन फिरकापरस्ती के खिलाफ एक मुक्कमिल बयान है. वरना इस दौर में जब सांप्रदायिक घृणा बहुमत(कमसेकम दृष्टिमान बहुमत के सहजबोध का हिस्सा हो गयी हो, जहाँ पूरा बौद्धिक विमर्श 'भगवा आतंकवाद' विरुद्ध 'इस्लामिक आतंकवाद' के बीच की खून और लाशों भरी तंग गलियों से गुजर रहा हो , माँ विंध्यवासिनी के भक्त एक सूफी संत सरकार वारिस पाक की नगरी में जियारत क्यूँ कर रहे होते? नजरें और दौड़ाईं तो एक और महत्वपूर्ण बात दिखी कि देवा शरीफ़ में आने वाले जायरीन का एक बड़ा हिस्सा गरीब किसानों और मजदूरों का है जिनकी जिन्दगी के अवलम्ब कृषि के क्षेत्र में आते आते ८ प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धिदर वाली भारत की अर्थव्यवस्था २ प्रतिशत के अन्दर सिमट जाती है. ये वह लोग हैं जिनके लिए सिर्फ जिंदा रहने की रोज की जद्दोजहद एक बड़े युद्ध से कम नहीं है.

देवा शरीफ़ में आये इन लोगों को देखते हुए समझ आता है कि मार्क्स ने धर्म को जनता का अफीम बताते हुए भी इसी धर्म को 'हृदयहीन विश्व का ह्रदय' और 'शोषित प्राणी की आह' भी क्यूँ कहा था. एक इन्क़लाबी विकल्प की गैरमौजूदगी में गरीब किसानों को धर्मान्धता और शोषण दोनों के खिलाफ खड़े होने का हौसला और जगह दोनों देने वाली देवा शरीफ़ जैसी दरगाहें इसीलिए हमेशा से राजनैतिक और धार्मिक दोनों सत्ताओं की आँखों में चुभती रही हैं, और जमींदारों से लेकर बादशाहों तक के हमले झेलती रही हैं. बखैर, उसदिन यह भी समझ आया कि सांप्रदायिक सहजबोध भारत के बहुतमत का नहीं वरन केवल प्रभुवर्गों और उनके दिए हुए टुकड़ों पर पलने वाले मध्यवर्ग का सहजबोध है. भारत का आम आदमी, यानी कि यहाँ का गरीब मजदूर और किसान गंगाजमानी तहजीब का झंडा बुलन्द किये हुए पूरी हिम्मत से खड़ा है, जरूरत है तो बस इतनी कि इस खामोश और अदृश्य बहुमत को हाशिये से मुख्यधारा के विमर्श में लाया जाय.