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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 30, 2011

आंकड़े बन गयी लड़कियों की याद में


[जनसत्ता के दैनिक स्तंभ 'दुनिया मेरे आगे' में 'सुविधा की खामोशी' शीर्षक के साथ 30-12-2011 को प्रकाशित]

अखबार के पन्ने से झांकती हुई मुस्कुराती हुई सी उस लडकी की तस्वीर किसी को भी असहज कर सकती थी. वजह ये कि अखबार में पेज थ्री से लगायत तमाम ऐसी जगहें थीं जहाँ मुस्कुराती हुई सी आँखों वाली उस लड़की की तस्वीर हो सकती थी, पर स्मृतिशेष/श्रद्धांजलि वाले उस पन्ने पर नहीं जहाँ वह हकीकत में थी.असहज करने वाली वजह एक और भी थी, यह कि उस युवा लड़की का चेहरा बहुत जाना पहचाना सा लगा था. शायद इसीलिये अखबारों के जिस पन्ने पर आमतौर पर नजर भी नहीं रुकती, ठिठकी हुई अंगुलियां जाने क्यों वही पन्ना पलट नहीं पाईं थी.

नाम पढ़ा तो सब कुछ साफ़ हो आया. तस्वीर सौम्या विश्वनाथन की थी, एक युवा पत्रकार जिसकी तमाम संभावनाएं और जिंदगी देश भर में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर के बतौर
प्रख्यात दिल्ली की कानून व्यवस्था की भेंट चढ गयी. उस शहर की, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी होने के साथ-साथ विश्वस्तरीय शहर होने का दम भी भरता है. अब जाने इस शहर को ‘नेशनल कैपिटल’ होने के साथ ‘रेप कैपिटल’ होना भी कैसा लगता होगा, पर यहाँ की मुख्यमंत्री के बारे में मुतमइन हूँ कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता. अब भी याद है कि सौम्या की हत्या के बाद माननीया शीला जी के दिमाग में जो बात उठी थी वह क़ानून व्यवस्था की असफलता की नही बल्कि रात तीन बजे एक लड़की के अकेले अपनी कार में होने की थी. उन्होंने फिर महिलाओं को इतना ‘दुस्साहसिक’ न होने की सलाह भी दे डाली थी.

याद तो खैर वह गुस्सा भी है जो इस शहर की मध्यवर्गीय आबादी के दिलों में उबल उबल पड़ा था. वह नफ़रत भी जो हत्यारों से लेकर निकम्मे प्रशासकों तक के लिए पैदा हुई थी. होना लाजमी भी था, सौम्या हिन्दुस्तान के हाशिए पर पड़े किसी भूले बिसरे से गाँव की बेचारी बेटी नहीं, देश की राजधानी में रहने वाली एक मध्यवर्गीय कामकाजी युवती, माने कि हममें से एक थी. और ऐसा हादसा अगर उसके साथ हो सकता था तो फिर हममें से कोई सुरक्षित नहीं था.

फिर तो टीवी चैनलों की ‘प्राइमटाइम बहसों’ में बह चला यह गुस्सा मोमबत्तियों की शक्ल में इंडिया गेट पंहुचा था, सरकार से जवाबदेही तलब करने को मोर्चे निकाले गए थे और फिर, गैरसंजीदा सरकारी आश्वासनों की तरह यह गुस्सा भी ठंडा पड़ गया था. मध्यवर्गीय गुस्से की फितरत और नियति दोनों यही होती है. उबल पड़ना और फिर ठंडा हो जाना. पर इस गुस्से का एक और चरित्र होता है. यह फिर से उबल पड़ने की सम्भावनाएँ तो तलाशता रहता है पर इस कोशिश के साथ कि यह संभावनाएं ‘चेहरों’ के या ‘मुद्दे’ के बतौर ही पैदा हों न कि मुश्तरका, या मंजिल तक पंहुचाने वाले एक लगातार आंदोलन की शक्ल में. आंदोलन खैर, यूँ भी राजनैतिक होते हैं और राजनीति जैसी ‘गंदी’ चीज को मध्यवर्ग हाथ लगाए भी तो कैसे? फिर क्या फर्क पड़ता है कि राजनीति हमारा वर्तमान और हमारा भविष्य दोनों तय करती है.

इसीलिये, हम कभी सौम्या पर उबल पड़ते हैं, कभी आरुषी पर और कभी जेसिका की नियति हमारे गुस्से का सबब बनती है. ठीक इसी जगह से वह सवाल खड़ा होता है जिसको हल किये बिना यौनिक हिंसा के इस दुष्चक्र से मुक्ति संभव नहीं है. सवाल यह कि हमारा गुस्सा तमाम सदिच्छाओं के बावजूद सिर्फ और सिर्फ हमारे वर्ग पर हुए हमलों पर क्यों पैदा होता है? हमारी आवाज निम्नवर्गीय महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर इतनी बुलंद क्यों नहीं होती? यह भी कि भंवरी देवी के लिए हमारी मोमबत्तियाँ क्यूँ नहीं जल पातीं?

आखिर को यह सारे हमले एक ही स्रोत से निकलते हैं, उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जो हमारे ‘आधुनिक’ लोकतान्त्रिक ढांचे के अंदर के समाज का पूर्वआधुनिक सच है. यही व्यवस्था है जो न केवल इन हमलों को संभव बनाती है बल्कि इनके लिए स्वयं महिलाओं को ही दोषी भी ठहराती है. बेशक महिलाओं के अंदर भी वर्गीय विभाजन हैं, बेशक महिलायें एक ‘वर्ग’ नहीं हैं, पर यह व्यवस्था उनकी वर्गीय पहचानों को ध्वस्त कर उनकी सारी पहचान उनकी यौनिकता में सीमित कर देती है. सूजन ब्राउनमिलर इसी तरफ इशारा करती हैं जब वह कहती हैं कि ‘बलात्कार और कुछ नहीं बल्कि सभी पुरुषों द्वारा सभी महिलाओं को शाश्वत भय के अंदर रखने की सचेत प्रक्रिया है’.

सुनने में जरा अतिवादी सा लगने वाला यह वाक्य हकीकतन एक कड़वे सच की तरफ इशारा करता है. सभी पुरुष भले ही यौनिक हिंसा में सीधे शरीक न हों, पर ऐसी किसी भी घटना पर उनकी चुप्पी उन्हें इन अपराधों का सहभागी बना देती है. खासतौर पर तब जब नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में २०१० में बलात्कार के ४८९, यौन उत्पीडन के ५५० और अपहरण के १३७९ मामले दर्ज हों. मतलब यह कि अगर न दर्ज होने वाले मामलों को छोड़ भी दें तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी में हर १८ घंटे पर होते हुए एक बलात्कार और १४ घंटे पर एक यौन उत्पीडन की घटनाओं में हम बस ३-४ पर गुस्सा होते हैं, हो पाते हैं.

यकीन करिये कि बाकी मामलों पर हमारी चुप्पी यह भी तय कर देती है कि किसी सौम्या को कभी न्याय नहीं मिलेगा. यह भी कि शुरुआती गुस्से के बाद तमाम सौम्यायें बस एक आंकड़ा बन कर रह जायेंगी, उन फाइलों में कैद होकर जो फिर कभी नहीं खुलेंगी. यह भी कि तमाम शुरुआती शोर के बावजूद यह लडकियां धीरे धीरे अखबारों के श्रद्धांजलि पेज पर एक तस्वीर बन कर रह जायेंगी जिन्हें उनके परिवारों के अलावा कोई याद नहीं करेगा, बावजूद उस परिचय के जो उनके मरने के बाद उन्हे टीवी स्क्रीन पर देख के बना था.

December 27, 2011

राग अन्ना उर्फ चार कवितायें: एक मौलिक, दो लघु मौलिक और एक (मेरी) घनघोर नक़ल..

यूँ तो यह सारी कवितायें सितम्बर के उस खुश्क मौसम में लिखी गयीं थी जब गर्मियां चिपचिपाती उमस में तब्दील हो रही थीं और तमाम क्रांतिकारियों के विचारों के घोड़े अन्ना का रथ खींचने में लगे थे. वह रथ जिसपर भगवा पताका लहरा रही थी. यकीन करें कि कसूर इन क्रांतिकारियों का नहीं मौसम का था. अब उस मौसम में जिसमे रेत में पानी का भ्रम होने लगे, भगवा का लाल दिखना संभव था ही. यूँ भी कुछ क्रांतिकारियों का लाल झंडा वही झंडा है जो हाथों में लेकर हनुमान जी लंका में कूदे थे.

अब महीनों बाद जब टीम अन्ना के एक लाल सदस्य हिमाचल की भाजपाई सरकार से कौड़ियों के भाव जमीन ले चुके हैं, जब टीम अन्ना की एक दूसरी सदस्या इकानामी क्लास में की गयी एक हवाई यात्रा के लिए दो अलग अलग संस्थाओं से बिजिनेस क्लास का किराया लेने का महान ईमानदार कारनामा कर चुकी हैं, जब उत्तराखंडी (और भाजपाई) लोकपाल बिल के स्वागत में लहालोट हो जाने वाले टीम अन्ना के एक और सदस्य कांग्रेसी लोकपाल बिल के बाद संसद में कोई विश्वास न रह जाने की घोषणा कर चुके हैं यह सारी कवितायें फिर से पेश हैं.. इनमे से एक मौलिक है, दो लघु मौलिक हैं, और मेरी वाली घनघोर नक़ल है...माफी इस बात के लिए भी कि अपनी नक़ल में मैंने कुछ और इजाफा भी कर दिया है..


मृत्युंजय

अछूत जनता!

देखो, देखो, छू मत जाना,
जनता से !

बंद कक्ष की कठिन तपस्या खंडित होगी
पोथे-पत्रे क्रांतिकारिता के सब गंदे हो जायेंगें
मंदे पड़ जायेंगें धंधे क्रान्ति- व्रांति के
सात हाथ की चौकस दूरी हरदम रहो बनाए
छाया भी न कहीं पड़ जाए...

जनता संघी, जनता पागल, जनता है बदमाश
मध्य वर्ग कैंडिलधारी है, निम्न वर्ग बकवास
दिल्ली, बंबई, बंगलोर में लघु कमरों के अंदर
पांच-पांच रहते हैं सब है अन्ना टीम के बन्दर
नौजवान-नवयुवती करते पिकनिक में आन्दोलन
तुम पवित्र अति धीर भाव करते विचार उत्तोलन

यह जनता अब काम न देगी
जनता नयी गढ़ाओ
कुछ सुमेरु कुछ मंगल ग्रह से
कुछ नेपाल से कुछ क्यूबा से
जनता मांग ले आओ
क्रान्ति की अलख जगाओ !

देखो बंधू, छू मत जाना
मत शरमाना
जनता नयी मंगाना
फिर बदलना ज़माना.




हिमांशु पांड्या

चमार जनता सुनार जनता


क्रांतिकारी कवि ने खाए दो दर्ज़न केले
ओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले ले
जनता की तलाश में इसने कितने पापड बेले

टाटा बोला- मै जनता हूं
जिंदल बोला - मैं जनता हूं
कवि ने झुककर माना , उसको जनद्रोही न कहलाना था
रालेगान सिद्धि में पायी असली जनता
चमार जनता- सुनार जनता
एक राजनीतिक दल के तो था नाम में जनता

कोर्पोरेट सेक्टर ने बोला-हम ही तो हैं असली जनता
हमरी मानो, सरकारी से छीनो सबकुछ
हमरे पाले में लाओ
कवि ने सोचा
यह तो जन की सच्ची सेवा
सरकारी तो दुश्मन जन का

कल से कवि इस जनता के ही आगे शीश झुकायेगा
खुद को जनता मान न पाया
भला और के 'जन' होने के दावे को वह
कैसे खारिज कर पायेगा

इस स्वयम्भू जनता की जय हो

जन जन का है एक बल , एक आस विश्वास
इरोम शर्मिला को बनवास
'बहन अरुंधती' को कारावास .

अशोक कुमार पाण्डेय


कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ
जिस एंगल पर कैमरा घूमे
सामने भीड़ के तुम्हीं दिखाओ
कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

वर्ग-फर्ग का छोड़ो चक्कर
जैसा नमक वैसी ही शक्कर
जैसी छुअन वैसी ही टक्कर
समरसता के भरम उपजाओ
कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

ऐसे कलम को साधो साथी
चूहा दिखे तो लिक्खो हाथी
लाल दिए में भगवा बाती
जनता के नाम जलाओ
कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

बेकरी वाली जनता आई
मंदिर वाली जनता आई
असली वाली जनता आई
बकिया सारे जंगल जाओ
कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

मंचों की साजिश को भूलो
चेहरों की कालिख को भूलो
नोटों की बारिश को भूलो
बस अन्ना रंग में रंग जाओ
कवि कुछ ऎसी अदा बनाओ

खैर ये रंग भी उतरेगा ही
हम ही साथ रहेंगे तब भी
बहुत लड़ाई अभी है बाक़ी

थोड़ा मन को धीर धराओ
कवि मत ऎसी अदा बनाओ

बनो दोस्त तो कल शर्माओ




अपन वाली बोले तो घनघोर नक़ल वाली

मार्क्सवादी-अन्नावादियों का क्रान्तिगीत


क्रांति के लिए जली मोमबत्ती
क्रांति के लिए बढ़ी टोपी

क्रान्ति के लिए भेजे एस एम् एस
क्रांति के लिए अपडेट किये स्टेटस
राजनीति के विरुद्ध पूंजीवाद के लिए
हर गरीब जिंदल टाटा और बजाज के लिए
शोषित पीड़ित सवर्ण जात के लिए
हम लड़ेंगे हमने ली कसम

छिन रही हैं टाटा की रोटियां
बिक रही हैं जिन्दलों की बोटियाँ
किन्तु मजदूर भर रहे हैं कोठियां..
लूट का ये राज हो खतम
हम लड़ेंगे...

लोकतंत्र चाहते हैं लोकतंत्रखोर
ताकी राज कर सकें कल के शूद्र चोर
पर जवान जहाँ है कठोर
और फिर फोर्ड जब है हमारी ओर
डॉलरों के जोर पे जीत लेंगे हम..
हम लड़ेंगे..

क्रांति के लिए बढ़ी टोपी
क्रांति के जली मोमबत्ती ...

क्रान्ति के लिए की मोदी की तारीफ़
क्रान्ति के लिए चुने रकीब
क्रान्ति के लिए थे भाजपाई उत्तराखंड के बिल के साथ
क्रान्ति के लिए कांग्रेसी लोकपाल के खिलाफ
क्या हुआ कि दोनों हैं बिलकुल एक समान
आखिर टीम अन्ना को जमीन देते हैं हैं हिमाचली शांताराम..
कांग्रेस-राज को करेंगे अब खतम..
हम लड़ेंगे...

हम नहीं हैं भाजपा के साथ
हमारा दुश्मन है केवल हाथ
येदुरप्पा कौन है हम नहीं जानते
महाजनों को हम नहीं पहचानते
बस सिब्बलों को देख लेंगे हम..
हम लड़ेंगे..

ये आख़िरी जंग है तू साथ आ
जनलोकपाल के लिए नारे लगा..
भूख का मुद्दा हुआ खतम..
दिल्ली की सर्दी सह न सके तो क्या
देश के लिए देंगे जान हम..

हम लड़ेंगे हमने ली कसम..
वंदे मातरम...

December 23, 2011

Tweeting Troubles: Why Kapil Sibal is not an idiot!

[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in VOICE,16-31 December,2011]

His name is Kapil Sibal and he is not an idiot. I know most of the Indian citizens, nay, netizens to be more precise, would not merely disagree with that but also would do that violently. They have reasons for that. Did not Kapil Sibal is an idiot campaign put the internet on fire just a few days back? Wasn’t his name ‘trending’ second leaving other trends like Veena Malik and Sunny Leones far, far behind. Trending, for the uninitiated, is a measure of popularity of search terms, not necessarily for the person though, on the internet or its children like Facebook and Twitter.

So there he was, trending ahead of a post-Big Boss Sunny Leone and a post-FHM cover Veena Malik, another Big Boss veteran. You think it’s a mean task achievable by idiots? That too in a country where ogling at women, any women of any age, is a national pastime, and is seen and defended by the oglers as an inalienable right. In a country where the most sought after section of the morning newspaper is the supplement, especially the pages dedicated to the charms of Hollywood. In a country where most of the news magazines are flipped over from the back cover for the most important news items, some real idiots call that gossip, on the life and lifestyles of the celebrities!  

It was no mean task, it just could not be. After all he was trending despite the fact that Veena had finally and decisively demolished that long held belief that ISI was behind anything and everything that goes wrong in India. My heart wept for the politicians, more so for those on the right, for this tremendous loss of theirs. How would they explain their gargantuan failures now with the most preferred excuse of ‘ISI’s hand behind it vanishing with Veena’s clothes’? I could sense the collective gasp emanating out of their open mouths for such a failure. Uff Lord, the ones on mother earth and not the celestial ones I mean, why is RAW so inefficient in dealing with ISI implants in India both on the borders and in Bombay, they must have thought.

What should have been trending in the situation was a quest for new excuses that could explain their failures that are yet to come. That would have been logical with almost everyone in the government and the opposition being on Twitter. Don’t we have even that old chariot riding defender of Hindu culture and tradition gracing Twitter along with Digvijay Singh who is so much reviled by THE HINDUs? The only ones who have missed the Twitter bus are those from the Left, rightly named so in this case for being left behind. Maybe it’s not their policies but the absence of Left leaders on social networking sites that makes them look so passé, so old school to the ultra-mod and urbane netizens. Some disconnect they have with their times, isn’t it?

This reminds me of Tharoor who punctured the high flying balloon of the middleclass aspirations with his tweet and put them back to where they belong. He must have realized later that calling it ‘cattle class’ was not politically correct for hurting the sentiments of the cattle. The realization could not save his job in a country obsessed with maintaining hierarchy with elaborate details of code for everything like conduct, seating, speaking and even saluting. His resignation, I am certain, must have assuaged the hurt feelings of most of the cattle putting the issue to rest.

Sadly, neither are we as lucky as the cattle nor are all our politicos as suave and graceful as Mr Tharoor. No one seems to understand our plight of having to live with tweet by tweet humiliation we are subjected to. Have our sensibilities and intellect not been assaulted by the relentless and obtrusive tweeting from the likes of Sushma Swaraj to Omar Abdullah with all the Jaitly’s stuck in between. Aren’t their tweets almost always similarly worded and defend almost similar failures of their governments? Don’t they keep accusing the other for doing exactly what they did while in power and would do if they ever get back to it?

It is some pain for we, the supporters of free speech, cannot even ask for a regulatory authority to monitor these tweets, Damn that Voltaire who talked of defending anyone’s right to say something to death. Had he been born in our era of social networks in virtual world he would have modified his statement. Your right to speech I support, your right to tweet I don’t, he must have said.

Yet it was nothing of this but Kapil Sibal that was trending. Not one from this bandwagon has achieved the feat, not even famed for his tweets Tharoor. No mean task, I would repeat. I would also repeat that his name is Kapil Sibal and he is not an idiot. He is far more than that, not necessarily negatively, I mean.

In fact, nothing about Sibal can be mediocre. I had actually struggled making sense of Kapil Sibal is an idiot campaign. Idiot is a term that could define our intelligence but falls so terribly short of defining his. He has some special talents defying logic. Send him to clear some mess and he would, miraculously, produce more of it. Tell him to defend something and you would end up defending your decision of sending him in the first place.

These flairs, perhaps, are born out of those strolls he must had taken on the beautiful lawns that grace the famed Stephens College that, in turn, grace the country for the sheer fact that it exists. He must have acquired those special arithmetic talents that he used to put the losses in 2G spectrum scam at zero. This was, again, no mean task when every Indian citizen was enraged with the heavy losses pegged at billions of dollars by the Comptroller and Auditor General of India, a constitutional authority. The situation was similar in the government ranks. Even the toughest ones could not say that there was no loss, all they did was contesting the numbers and shifting the blame to the compulsions of coalition.

Then, there came Kapil Sibal calculating the same losses to be zero. Though he is yet to share the special arithmetic formulae he used for the calculation, I am sure they must be of a different league altogether. Further, Kapil might have invented them himself and thus making himself the strongest contender for a Nobel Prize in Mathematics, maybe for a decade in a row. I was perplexed when neither he nor the selection committee made any moves for the same.
The response to his calculation was not that perplexing though. Suddenly, the suave Stephenian was turned into the national laughing stock. Everyone, from a common citizen, not the aam admi of the Congress but the real one, to even those within the government, was aghast with this absurdity.

The government was earlier embarrassed by all the scams tumbling out of the closet. Now, it was more embarrassed of the Sibalian audacity of negating that. Kapil Sibal had emerged victorious. What else is the job of a trouble shooter? With one single statement of his, the focus of the nation has shifted from the scam to his stupidity. The government was happy too because thanks to Sibal it now had two embarrassments to choose from. Having a choice is always the first step towards freedom, isn’t it?

Yet, his critics could have believed that his success was just a fluke. Realizing this, he decided to demolish any suspicions over his miraculous capacities and did that in style. He took on Anna Hazare who was nothing more than a fake version of Gandhi with a few thousand people supporting him and threw the 74 year old in jail. The same jail which was being graced by many of his former colleagues in the government from Kalmadi to Kanimozhi. The cameras followed the oldie, gates of Tihar were turned into a sight of carnival and hey.. Anna had become a phenomenon. Sibal had succeeded, again, in making out a national hero out of a hoodlum who beats drinkers in his village.

He has proved his utility to the government again. Earlier, the debate was focused on corruption and the mechanism to stop it. Now, it had a dimension added to it. That was the stupidity of Sibal in dealing with the issue. The government had a choice, again.

He seemed to be laying low for a while after that though we were to know that he was not really. He was silently communicating with internet giants like Google and Facebook. Communicating, in his case meant threatening for he was tremendously upset with the apparently morphed photographs of ‘his leaders’ doing the rounds on the net. He was telling them to put mechanism to filter objectionable contents and stop them from being uploaded. His sentiments were hurt he said and added later, the term religious to it. Three months of secret communications must have given him the time to find out contents that could hurt religious sentiments even if we are yet to hear a case of rioting incited by the use of social networking sites.

I am certain of his good intentions. All he wanted was to stop the riots and bring the probable perpetrators to books. What if the perpetrators of Gujarat pogrom of 2002 and Delhi carnage of Sikhs in 1984 are still roaming free? He is just a Telecom Minister and will do only what he could. The fact that this would amount to pre/realtime/post censorship in a country that is democratic is beside the point. The fact that law takes cognizance of only the crimes committed and does not otherwise attach criminality till violence is incited is, also, beside the point.

Kapil’s rants against the social networking sites, therefore, opened a new debate. They hinted of an Orwellian return into the dreaded days of emergency. What they did not hint at though was the fact that the world has changed a lot. So much so, that even an all pervasive state like China cannot effectively censor the internet. Think of that, and of the efficiency of Indian officialdom and you know what would be the future of censorship.

He has achieved a new feat in the process, though. By targeting his ire at the objectionable photographs of his leaders and then justifying it by adding hurting religious sentiments he has brought the culture of sycophancy to a new high. He has also marked the definitive victory of the modern, urban middleclass over the rural ones. They are better than the rustic ones in everything, even sycophancy.

Not that Kapil Sibal is the worst of them. There are many far worse than him. Just that he knows how to snatch the claim for himself. He just makes the other look less despicable than him. In politics, being stupid is a trait worse than being dictatorial. Sibal has managed to be both at the same time. That is Kapil No Loss in 2G Sibal demystified.

December 21, 2011

ये अदम को याद करने के मौसम हैं..


[जनसंदेश टाइम्स में 21-12-11 को प्रकाशित लेख का विस्तारित रूप]

तासीर ही है जो मौसमों की पहचान बनती है, उन्हें मायने देती है. तासीर, यानी कि हिन्दुस्तानी जुबान का वह खूबसूरत लफ्ज़ जिससे पहला साबका कब पड़ा यह तो याद नहीं पर इतना जरूर याद है कि ठण्ड बढते ही माँ चाय में काली मिर्च डालने लगती थी कि काली मिर्च की तासीर गरम होती है. जिंदगी के तमाम सबक उसी दौर में याद हुए. जैसे कि ठण्ड लगे तो केला, चावल मत खाओ और गर्मी लगे तो मसाले कम करो, दही खाओ.

सामाजिकता मौसमों की एक और खास बात होती थी. जिन गाँवों-कस्बों से हम आते थे वहाँ मौसम हमारी जिंदगी की लय तक तय करते थे. ऐसे कि ठण्ड उतरे तो एक सी डिजाइन और रंग वाले हाथ के बुने स्वेटर हमारे कस्बों की छोटी सी बाजारों में भर जाएँ और गर्मियां आयें तो फिर वही कस्बे एक से अँगोछों के रंग में रंग जाएँ. यूँ भी यह उन वक्तों की बात है जब मौसमों के सीने पर चढ़ उनकी तासीर बदल देने वाली एयरकंडीशनिंग की तकनीक हमारे गाँवों के लिए अंतरिक्ष यान से भी ज्यादा अपरिचित शब्द थी. उस दौर की भी जब गाँवों में बिजली का आ जाना बच्चों की आकाशभेदी चीख के साथ खबर बनती थी जबकि उसका जाना खाली आँखों के साथ स्वीकार कर ली गयी नियति जैसा कुछ ही होता था.

मौसम हमारे कस्बों को इस कदर एकसार कर देते थे कि एक कस्बे को दूसरे से अलग पहचानना मुश्किल हो जाए. इन कस्बों की पहचानें, फिर, बस एक बात से बनती थी, अपने उन बच्चों से जिनके संघर्ष उनका कद बहुत बड़ा कर देते थे. फिर ये पहचानें अपने बच्चों की पहचानों के साथ इस कदर नत्थी हो जाती थीं कि कस्बे अनन्त काल तक अपने इन बच्चों की वजह से ही जाने जाने लगते थे. अदम गोंडवी एक ऐसा ही नाम थे, वह मील पत्थर जिसकी वजह से हिन्दुस्तान के तमाम लोग गोंडा को जानते थे. मेरे दिल के ज़रा और करीब क्योंकि जिला बस्ती का होने के बावजूद मेरा पूरा बचपन बभनान नाम के उस कस्बे में बीता है जो आधा गोंडा में है आधा बस्ती में.

अदम साहब का पैदाइशी नाम यूँ तो रामनाथ सिंह था पर फिर वह लोग ही क्या जिनकी चुनी हुई जिंदगियां और नाम उन पर लाद दी गयी पहचानों पर भारी न पड़ जाएँ. रामनाथ सिंह से अदम गोंडवी हो जाने का उनका फैसला उस जंग की भी एक बानगी था जो सामंतवाद, पितृसत्ता, पूंजीवाद और ऐसी तमाम प्रतिगामी प्रवित्तियों के खिलाफ वो सारी जिंदगी लड़ते रहे थे. ऐसी लड़ाई कि साफ़ कह सकता हूँ कि हमारे जैसे तमाम लोगों की जिंदगी में जनपक्षधरता न होती अगर उसकी नींव में अदम गोंडवी जैसे जनकवियों की कविताओं के पत्थर न पड़े होते.

जातिव्यवस्था की नृशंसता और उसे ध्वस्त करने की जरूरत का पहला सबक हमने समाजशास्त्र की किताबों से नहीं बल्कि अदम गोंडवी की कविता ‘चमारों की गली’ से पढ़ा था. देश के गहराते जाते कृषि संकट से हमारी पहली मुठभेडें अदम की उस गजल से हुई थीं जहाँ वह सरकारी फाइलों में गाँव के मौसमों के गुलाबी होने के खिलाफ सच का पहरुआ बन खड़े हुए थे. भ्रष्टाचार के हमारी जिंदगियों में जहर बन घुलते जाने के खिलाफ आज के प्रतिरोध के बहुत पहले अदम काजू भरी प्लेटों और व्हिस्की भरे गिलासों वाले ‘रामराज’ से लोहा लेते खड़े थे. खड़े तो अदम उस रामराज के खिलाफ भी थे जिसको किसी बाबर के किये, या न किये, जुल्मों का बदला हमारे गाँवों के जुम्मन चाचा से लेना था.

इन्ही वजहों से अदम एक व्यक्ति होने से कहीं बहुत आगे निकल गए थे. अदम वह जिंदगी थे जो हमें जीनी थी, उनकी कवितायें वह कवितायेँ थीं जो हमें लिखनी थी उनकी लड़ाई वह लड़ाई थी जो आख़िरी जीत तक हमें लड़नी थी. और ठीक इसी वजह से अदम से व्यक्तिगत परिचय होना न होना भी एक निहायत गैरजरूरी बात थी बावजूद इस सच के कि मैं उन्हें तमाम बार सुनने और एक बार ठीक से मिल सकने वाले लोगों की जमात में हूँ. मुझे अब भी सन 2000 या शायद २००१ की वह दोपहर याद है जब अंशु मालवीय जैसे दोस्त और उससे भी प्यारे कवि की वजह से इलाहाबाद के आर्य कन्या डिग्री कोलेज में आयोजित एक कवि सम्मलेन मे अदम साहब को देर तक सुनते रहने की बाद लगभग कांपते हुए उनसे बहुत देर तक बातें करता रहा था. रूमानियत और इन्कलाब की वयःसंधि पर खड़े होने के उस समय की उस लंबी बातचीत का बहुत कुछ याद नहीं, पर यह साफ़ साफ़ याद है कि उस गंवई आदमी ने मन पर कभी न मिटने वाला एक प्रभाव छोड़ा था. यह भी कि जब जब कमजोर पड़ा कुछ और प्रिय कवियों के साथ उनकी कविताओं की और लौटा.

आज इतने बरस बाद अदम गोंडवी की मृत्यु की खबर ने फिर कमजोर किया है. पर उससे भी ज्यादा इस सच ने कि उनको याद करने को दौड़ पड़ रहे उन लोगों ने भी फेसबुक से लेकर प्रिंट मीडिया तक को भर डाला है जिनका सारा इतिहास खुद को व्यवस्था के हाथ बेचने का इतिहास है. सोचिये कि लंबी काली कारों और हाथ में करारी नोटों से भरे लिफ़ाफ़े वाले उन लोगों के अदम को याद करने का क्या मतलब है. शायद कुछ लोगों के लिए लोगों को याद करने के, और इन यादों के सहारे खुद को और बेहतर बेच सकने की संभावनाओं की तलाश के मौसम भी होते हैं. और यादें भी ऐसी कि अदम की मौत के पीछे की वजह बीमारी नहीं, गरीबी नहीं शराब है. शर्म आती है कि हिन्दी कविता के ऊपर कलंक की तरह चस्पा बादल-पागल-घायल मार्का मंचीयता के धनी कुछ कवि ऐसे दावे कर भी कैसे पा रहे हैं. पर हमारे यहाँ तो कबीर की तरह घर जलाने के बरक्स कफ़न चोरों की भी परम्परा भी है ही. अच्छा हुआ, कि अदम के लिए मंत्रियों से मदद मांगने के दावों के समय उन्होंने सारी उम्र अदम की मदद करते रहने के दावे नहीं किये, वरना अदम के बाद उन दावों को खारिज कौन करता.

बेशक हम जैसे ‘असफल’ लोग अदम के लिए कुछ खास कर भी नहीं सकते थे कि हम उन्ही हारी हुई लड़ाइयों के साथ हैं जिन्हें अदम गोंडवी ने जिंदगी दी और फिर जिनसे हासिल गर्व भरी मुफलिसी ने उनकी जिंदगी ले भी ली. पर अदम को याद रखने का कोई मौसम नहीं होता, न होना चाहिए. अदम जीत और हार दोनों में हमारी लड़ाइयों के अंत तक हमारे साथ हैं. अलविदा अदम गोंडवी. इस वायदे के साथ कि हम आपकी यादों को उन कृतघ्नों से छीन लेंगे.

December 17, 2011

मुक्ति के सपनों का अभिशापित आख्यान: द डर्टी पिक्चर

एक गाँव है, उस गाँव में एक घर है. घर में सीढ़ी पर चढ़ी सपनों से बातें कर रही एक बच्ची है. बच्ची जिसे पता है कि सपनों का पीछा करने वाले रास्ते उसके गाँव से शहर को जाने वाली सड़क से ही शुरू होते हैं. उसे पता है कि गाँवों में सपने देखने की गुंजाइश तो है पर कुछ लोग हैं जिन्होंने हमारे गाँवों को सपनों की कत्लगाह में तब्दील कर दिया है. बच्ची ने बेशक पी साईनाथ को नहीं पढ़ा होगा, बच्ची भारतीय ग्राम्यजीवन के सबसे बड़े संकटकाल से गुजरते होने के तथ्यों से भी अनजान होगी, पर कुछ है जो उसे बता रहा है कि मुक्ति के रास्ते बाहर को खुलते हैं.

यह है द डर्टी पिक्चर. अपने समय के सबसे खुले राजों को परत दर परत उघाड़ते हुए, उनसे लड़ते हुए. और कहते हैं कि जिन चीजों को जानते हुए भी छिपाए रखने पर हुक्मरानों के भीतर आम सहमति हो, उन्हें बेलौस कह देना लड़ने की शुरुआत होती है. गाँवों के मर रहे होने का सच एक ऐसा ही सच है जो हम सब की जिंदगियों में शामिल है. हम सब ने सपनों का पीछा करने वाला सफर हिन्दुस्तान की परिधि पर बसे उन्ही नामालूम से गांवों-कस्बों से शुरू किया था. वह सफर जिसमे लौट आने की ख्वाहिशें हमारे धीरे धीरे महानगरीय होते जाने के साथ क़त्ल हो गयीं और हम इसे नियति मान चुपचाप बैठे रहे.

डर्टी पिक्चर की सच के साथ मुठभेडें यहाँ से बस शुरू होती हैं. रेशमा के सिल्क बनते जाने की कहानी महानगरों में झुग्गी झोपडियों के रूप में उग आये गांवों की कहानी भी है, मर रहे मूल्यों की कहानी भी और पितृसत्ता के प्रेतों के तमाम रूपों में घूमते होने की भी. रेशमा हमारे आम से घरों की बेहद आम सी लड़की है बस इस मामले में अलग कि वह अपने सपनों को अपने दहेज वाले बक्से में बनारसी साड़ियों के नीचे दफ़न करने को तैयार नहीं है. उसे अपने सपने हासिल करने हैं फिर कीमत जो भी हो.

रेशमा एक और रूप में अलग है. वह अपनी यौनिकता के साथ बिलकुल सहज है. बेशक उसने नारीवादी विमर्श नहीं पढ़ा होगा पर उसे पता है कि उसका शरीर उसका अपना है. अपने शरीर पर मालिकाने का यह दावा औरतों को संपत्ति मानने वाले समाजों में किस बगावत से कम है भला? रेशमा जानती तो और भी बहुत कुछ है, जैसे यह कि लड़कों को जो कुछ चाहिए वह उसके पास है तो फिर बड़ा कौन हुआ. पुरुषों की सबसे आदिम इच्छाओं को गुदगुदाते, छिछला मजा देते से इस वाक्य को गौर से देखिये और साफ़ हो जाएगा कि रेशमा हिन्दुस्तान की सारी औरतों की प्रतिनिधि के बतौर हिन्दुस्तान के लगभग सारे मर्दों को कटघरे में खडा कर रही है. उन मर्दों को जो छुट्टी के समय गर्ल्स कालेज के सामने साइकिल/मोटरसाइकिल लगाते हैं, उन मर्दों को जो बसों में, ट्रेनों में, बाजारों में यानी कि हर जगह महिलाओं को ‘छू लेने’ को अधिकार समझते हैं, उन मर्दों को जो आफिसों से लेकर विश्वविद्यालयों तक अपनी स्तिथि का फायदा उठाते हुए अपनी सहकर्मियों को उनकी यौनिकता में समेट देने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं.

बेशक इस वाक्य की भाषा छिछली लग सकती है, बाजारू लग सकती है पर फिर जिन मर्दों को लक्षित करके यह वाक्य बोला गया है क्या उनका व्यवहार ऐसा नहीं है? बेवजह नहीं है कि इस मुल्क में मध्यवर्गीय महिलाओ का ‘ब्लैंक न्वाईज’ नाम का एक कैम्पेन सिर्फ यह पूछने के लिए खड़ा होता है कि ‘आप क्या घूर रहे हैं’ तो बुंदेलखंड की महिलाओं को अपनी रक्षा के लिए ‘गुलाबी गैंग’ बनाना पड़ता है. रेशमा इस व्यवस्था में अन्तर्निहित यौनिक कुंठा को साफ़ साफ़ पहचानती है भले ही इसके लिए उसके पास अकादमिक भाषा के औजार न हों. उसके लिए मुक्ति के रास्ते भी इसी कुंठा के गलियारों से निकलते हैं, पुरुषों की ‘ट्यूनिंग’ की आदिम ख्वाहिशों का अपने हक में इस्तेमाल करने से. इस व्यवस्था की उसकी समझ वहाँ तक जाती है जहाँ वह एक भले से, समझदार से दिखते ‘इब्राहिम’ को ललकारती है कि ‘मुझे ऐसे देख रहे हो जैसे तंदूर मुर्गी को देख रहा है’.

फिर कुछ कुछ सभ्य सा दिखता यह इब्राहिम भी दिलचस्प किरदार है. उसे पता है कि वह निर्देशक है ‘दलाल’ नहीं, कि उसे फ़िल्में बनानी हैं सेक्स नहीं बेचना है. पर वह भी आखिर को पुरुष ही है, अपने भीतर रह गए पितृसत्ता के तमाम अवशेषों से लड़ने की उसकी कोशिशें कम दिखती हैं ज्यादा दिखती है वह नफरत जो अब सिल्क बन गयी रेशमा जैसी लड़कियों के लिए उसके दिल में पलती है. ‘तुम दुनिया की आखिरी लड़की होती तो मैं नसबंदी करवा लेता’ कहते हुए इब्राहिम के चेहरे पर वह तमाम घटियापन छलक छलक आता है जो उसके जैसे मर्द अक्सर बस छिपा पाते हैं, उसे खत्म नहीं कर पाते. नसबंदी का प्रेम से, सेक्स से क्या रिश्ता है इस बेवकूफी को छोड़ भी दें तो जो सवाल बचता है वह यह कि यह सिर्फ इब्राहिम नहीं है. तमाम मुखौटों के पीछे हम जैसे तमाम लोगों के अंदर भी थोड़ा थोड़ा इब्राहिम बसता ही है जिससे लड़ने की हम कोई कोशिशें नहीं करते.

इस फिल्म में इब्राहीम के बराबर खड़े और मर्दों को देखें तो फ़िल्मी दुनिया के रूपहले परदे के पीछे का अँधेरा साफ़ नजर आता है. सूर्या के सच में सिर्फ उसका सच नहीं इस दुनिया की खुद से मुठभेड़ का सच है. उस दुनिया का जहाँ नायक के अलावा सब कुछ अतिरिक्त है. उतने सारे मर्दों में देखें तो बस एक ‘कीड़ादास’ है जिससे थोड़ी सी सहानुभूति होती है क्योंकि उसे साफ साफ़ मालूम है कि उसे करना क्या है. वह समीक्षाओं को ठेंगे पर रखता है क्योंकि उसे मालूम है कि कीमत उस कागज़ की होती है जिस पर ‘टिकट’ छपता है उनकी नहीं जिन पर समीक्षाएँ छपती हैं.

सिल्क की ख्वाहिशें, मगर, अभिशप्त ख्वाहिशें हैं. बिना पितृसत्ता को चुनौती दिए यौनिकता को, अपने शरीर के मालिकाने को हासिल करने की कोशिशों की नियति है हार जाना. ठीक उसी तरह जैसे पूंजीवाद में एक व्यक्ति तो गरीबी से भाग सकता है, साम्राज्य खड़े कर सकता है पर गरीबों का एक वर्ग के बतौर भागना संभव नहीं है. सिल्क तब तक जी सकती थी जब तक वह सोचे ना, जब तक वह अपनी दुनिया के एक छोटे से हिस्से में अपनी आजाद ख्वाहिशों का एक छोटा सा घर बना उससे आगे बढ़ने की कवायद में न लगे.

वजह बहुत साफ़ है कि यौनिकता का उत्सव मनाने वाली लड़कियों के लिए इस घुटन भरी दुनिया में और चाहे जो हो प्यार की गुंजाइशें नहीं हैं. यह वह जगह है जहाँ इतिहास आज तक कोई सेंध नहीं लगा पाया. यहाँ कतरा कतरा मुक्ति तो संभव है पर बीबियों और प्रेमिकाओं के लिए ठीक उलटी मरदाना ख्वाहिशों के दोहरेपन में यहाँ कोई सिल्क खप ही नही सकती.

पर सिल्क प्यार करने से बच भी कहाँ सकती थी. पितृसत्ता की दुनिया अपने तर्कों पर चलती है और फिर उन तर्कों को हेजेमनी के हथियारों से आम तर्क बना देती है. प्यार करना सिल्क का चुनाव नहीं था, उसने तो अपने लिए बस ‘ट्यूनिंग’ की थी. अब सोचिये कि यह ट्यूनिंग सिर्फ सिल्क के लिए, स्त्रियों के लिए प्यार में क्यों बदल जाती है? सिल्क की मौत यहीं से निर्धारित होती है और होती रहेगी जब तक पुरुष और स्त्री के लिए प्यार के मायने अलग अलग रहेंगे. और इसीलिये, डर्टी पिक्चर में जो डर्टी है वह सिल्क नहीं समाज है.

December 12, 2011

हम जो अन्नावादी नहीं हैं, अपराधी है..

यह हमारे अपराध, हमारी ऐतिहासिक भूल का कुबूलनामा है. हम जो अपनी तमाम जनपक्षधरता के बावजूद अन्ना के न हो सके, हम जिन्होंने देश की ‘दूसरी आजादी’ की लड़ाई इस दूसरे गांधी के नेतृत्व में लड़ने से इनकार कर दिया. हम अपराधी हैं कि उस वक्त जब भारत की ‘सबसे सही लाइन’ वाली एक कम्युनिस्ट पार्टी भी मुक्ति के, लिबरेशन के रास्ते अन्ना के आन्दोलन के कनातों के नीचे से गुजरता हुआ देख रही थी, हम अपनी इंकलाबी रूमानियत की बेवकूफाना गलियों में भटकते अन्ना के इतिहास और वर्तमान के अंतर्संबंधों की पड़ताल में लगे थे.

हम समझ ही नहीं पा रहे थे कि अन्नावादी उन्माद के इन समयों में क्रान्ति से लेकर सामाजिक बदलाव के दरवाजे ‘मैं भी अन्ना’ नाम की जादूई चाभी से खुलते हैं. यूँ भी, जब तमाम मार्क्सवादी-लेनिवादी अपनी पार्टी के नाम में अन्नावादी जोड़ लेने पर गंभीर विमर्श में लगे हों तो ‘ऐतिहासिक भौतिकवाद’ के हथियारों से अन्ना के आंदोलन को समझने की हमारी कोशिश भोथरी साबित होनी ही थी. हम ‘शराबियों’ पर बरसते अन्ना के कोड़ों को, पाकिस्तान से लड़ने और लड़ते रहने की उनकी दहाडों को, उत्तर भारतीयों पर राज ठाकराना हमलों के उनके समर्थन के तथ्यों से उनके नेतृत्व के ‘वर्ग चरित्र’ को समझने की कवायद करते रहे, यह समझे बिना कि अब मसला वर्ग से बहुत आगे चला गया है.

इतना आगे कि अब प्रतिबद्धताएं आंदोलनों से नहीं अन्ना के समर्थन या विरोध से तय होनी थीं, और यहाँ कोई भी सवाल उठाना अपराध होना था. बस हमारा अब तक का संघर्ष खारिज ही होना था. हम जिनके लिए क्लर्क के ऊपर का कोई भी अधिकारी ‘व्यवस्था’ का हिस्सा था, उस व्यवस्था का जिससे हम लड़ते ही रहे थे. हम जो खानदानी नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी के खिलाफ खड़े रहे थे, और हम जो भाजपा की संघवादी साम्प्रदायिकता को व्यवस्था में लगा कांग्रेस से भी बड़ा घुन मानते रहे थे. और हम, जिनके लिए कांग्रेस और भाजपा का यह फर्क ‘व्यवस्था’ के हमारे प्रति बरताव में प्रतिबिंबित नहीं होता था. हमारे हर प्रदर्शन, धरने और मोर्चों पर पुलिसिया लाठियां एक सी बरसतीं थीं, इस बात का फर्क किये बिना कि जहाँ बरसीं वहाँ सरकार किसकी है.

हमारे जेहन में तो बात बहुत साफ़ हो चली थी. मसला अब दलों और उनकी स्वघोषित विचारधाराओं का नहीं, जनता के बरअक्स सरकारों का था. हमें साफ़ साफ़ दिखने लगा था कि पैदावार के तीन महीने बाद कृषिमंत्री शरद पवार का खाद्यान्नों के दाम बढ़ने का ऐलान किसानों के हित में नहीं बल्कि जमाखोरी करने वाले व्यापारियों के लिए ही होता था कि गोदामों का मुंह कुछ दिनों के लिए और बंद रखो कि मुनाफा और बढ़ेगा. हमें दिखने लगा था कि भाजपानीत एनडीए सरकार द्वारा खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाने की नीति कांग्रेसनीत यूपीए शासन में क्यों लागू होती है.

सवाल और भी बहुत सारे थे. जैसे कि यह कि अन्ना के आंदोलन के पीछे तमाम कार्पोरेशंस अपनी तिजोरियां लेकर खड़े थे. शायद इसलिए, कि उन्हें जनता को लूटने के लिए भी सरकार को घूस देना गवारा न था. शायद इसलिए भी कि अन्ना के जनलोकपाल में और सब कुछ था, कार्पोरेशंस का जिक तक ना था. अब कोई कंपनी अरबों का फायदा हुए बिना किसी मंत्री को करोड़ों क्यूँ देगी यह सवाल अपने मन में उठना लाजमी था. यह भी कि जनलोकपाल के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ वही जगहें क्यों हैं जहाँ सकारात्मक विभेद की कल्याणकारी नीतियों के चलते दलित वंचित समुदायों के लोग पंहुच पाए हैं. संसद और नौकरशाही, आज के भारत में शायद सिर्फ यही दो जगहें हैं जहाँ उत्पीडित आदिवासियों, जातियों और समुदायों की भागीदारी है. इसके उलट ‘इंडिया इंक’ के नाम से जाने जाने वाले उद्योगपतियों के जमावड़े या एनजीओ क्षेत्र को एक नजर देख भर लेने से इनका उच्च वर्गीय/उच्च जातीय चरित्र साफ़ साफ़ दिख जाता है. शायद इसीलिये, जनलोकपाल के दायरे से एनजीओ क्षेत्र को मिलने वाला देशी/विदेशी अनुदान भी गायब था.

देश की ‘दूसरी आजादी’ की इस लड़ाई से गायब तो और भी बहुत सारी चीजें थीं. उस देश में जहाँ हजारों लोग हर बरस भूख से मर जाते हों, और कुछ हजार फर्जी पुलिसिया मुठभेड़ों में, निजी क्षेत्र को बिलकुल छोड़ कर सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मुद्दे को और किसी मुद्दे के ऊपर रख देने की राजनीति परेशान करने वाली थी. उससे भी ज्यादा परेशान करने वाला वह समर्थन था जो इस आंदोलन को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने दिया था. उसी मीडिया ने जो मजदूरों की रैली की खबर शहर की जनता को हुई दिक्कतों के, ट्रैफिक जामों के सन्दर्भ से देता है.

राजनीति आखिरको तमाम ख्वाहिशों को नीतिनिर्माण के केंद्र में ले आने की जद्दोजहद का नाम है. बेशक अन्ना ही नहीं कोई भी भ्रष्टाचार के सवालों को और सवालों से ऊपर रख सकता है पर फिर और लोगों के सवालों को खारिज करने का हक इसमें शामिल नहीं है. जैसे कि उन्होंने अपनी ही ‘टीम अन्ना’ के एक सदस्य के काश्मीर के सवाल पर दिए गए बयान के साथ किया. जैसे उन्होंने इरोम शर्मीला द्वारा उनको लिखे गए पत्र के साथ किया. वैसे ही जैसे उन्होंने खुद को भारत की सारी जनता का ‘संविधानेतर’ मसीहा घोषित कर दिया और एक दूसरे ‘संविधानेतर’ युवराज गांधी पर तमाम दोष मढते रहे.

इस देश के लोकतंत्र का यह अद्भुत क्षण है जब लोकतंत्र के ऊपर दो दो संविधानेतर सत्ताएं बैठी हों और देश का मध्यवर्ग उन्ही में अपना भविष्य देख रहा हो. पर उससे भी अद्भुत यह है कि मार्क्सवादी होने का दावा करने वाली कुछ पार्टियां और कुछ लोग भी अन्ना में अपना भविष्य ढूंढ रहे हों. काश वह समझ पाते कि उधार के सपनों से न क्रान्ति की जमीन बनती है न उधार की भीड़ से इन्कलाब के हरावल पैदा होते हैं. पर वह यह समझने को कहाँ तैयार हैं. मोदी और नीतीश की तारीफ़ करने वाले अन्ना, शिवसेना की गोद में बैठने वाले अन्ना, विश्व हिन्दू परिषद के दुलारे अन्ना उन्हें अपने, अवाम के साथी लगते हैं.

उन्होंने तो सारी लड़ाई बस कांग्रेस और अन्ना के बीच समेत कर रख दी है. बावजूद इस सच के अपने मूल चरित्र में दोनों बस बिलकुल एक से हैं. बावजूद इस सच के भी कि खानदानी मालिकाने वाली कांग्रेस के विरोध का मतलब अन्ना के साथ जा बैठने को मजबूर नहीं कर देता. पर यह आप उन्हें कैसे समझायेंगे जो स्मृतिभ्रंश का शिकार हैं.जिनके लिए इतिहास सीखने की नहीं, भूलें करने और माफी मांगने की चीज है.

खैर, समझ पाते तो वह समझते कि चंद्रबाबू नायडू के दमन से त्रस्त होकर 'उदार' कांग्रेस के पक्ष में माहौल बंनाने का अंजाम तेलंगाना के माओवादियों ने कैसे भुगता था. यह भी कि ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री बनाने में मदद की किशन जी और उनकी पार्टी सीपीआई माओवादी ने कितनी बड़ी कीमत अदा की है. इतिहास से सीखते तो शायद वह समझ पाते कि मसला मुद्दों का नहीं राजनीति का होता है. भ्रष्टाचार के सवाल पर अन्ना के साथ जाने से उनकी कोई जनता आपके और मुद्दों पर आपके साथ नहीं आने वाली. क्रांतिकारियों को अपनी जनता खुद गढ़नी होती है, और यह गढ़ना जनसंघर्षों से लेकर जनता के जीवन के हर मुद्दे पर उनके साथ क्षैतिज साझीदारियाँ खड़ी करने, उनके सुख-दुःख का हिस्सा बनने से ही हो सकता है.

हम अपराधी हैं कि हम अन्ना के साथ नहीं हैं, पर हम शर्मिंदा नहीं हैं. हमें गर्व है कि हारी हुई लड़ाइयों में ही सही हम तमाम सोनी सूरियों के साथ हैं, शर्मिलाओं के साथ हैं, हिन्दुस्तान के आम अवाम की लड़ाइयों के उनके संघर्षों के साथ हैं. फिर आप बेशक अन्ना को दूसरा गांधी ही नहीं, तीसरा जेपी, चौथा मार्टिन लूथर किंग, पांचवा मंडेला या छठवां मार्क्स ही क्यों न घोषित कर दें.

December 07, 2011

Roadies In Reverse Gear: Advani’s Rathyatra To Nowhere



[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in VOICE,01-15 December,2011]

L K Adavani
is a toughie. I know, I could have added a ‘ji’ to his name, as the mainstream media does, but I cannot. The reason is simple. Whenever I think of him, what come to my mind is all those trails of blood that his ‘yatras’ have left behind. Actually, for the sake of political correctness and my belief in engaging even the enemies in a dialogue, once I tried referring to him like that. The consequences were heart wrenching. One, it made me queasy and second, I lost two friends. That was a lesson to remember. Trying to be politically correct maybe prudent but not when it comes to dealing with those whose histories are written with blood, others’ blood of course.


He is a toughie for daring to go for a rath yatra, yet again, traversing the length and breadth of the country. He is a toughie for daring to do that at an age when people would probably not want to do even as much as going to the grocery shop in the neighbourhood. He is a toughie for having the courage to chase his dream, still. Alas, the dreams that take him to that coveted chair he lost last time by finding a ‘deputy’ prefixed to those magical words, Prime Minister.

So, Advani is a toughie, but of a very strange kind. He is one who gets scoffed at by even that person who gets mocked by the whole country for his powerlessness. Believe me, a friend once told me that the single most contribution of Dr Manmoham Singh to Indian politics was calling Advani a PERMANENT PRIME MINISTER IN WAITING! I did ask that friend about his other contributions, like opening up of Indian markets to the world and ushering in the era of LPG, i.e. liberalization, privatization and globalization. After all, one can disagree, as I do or agree as few others, but then these are his contribution, aren’t they?

My friend gave me a look that reeked of condescension. Then came the reply. Yes, it is if the nuts in a machine ‘contribute’ to the production independent of the operator. Nuts, he repeated with a smirk. Did not Advani’s Bhartiya Janata Party(BJP) follow the same policies when they came to the power was the other shot fired by him. Do you remember, with the same condescension, that the BJP led National Democratic Alliance(NDA) ended up opening a ministry for DISINVESTMENT? I was silent. Still thinking of the ‘nuts’, the ones in a machine I mean.

So, the PM scoffs at him. A Chief Minister from his own party, Narendra Modi, snubs him and chooses to skip BJP’s National Executive meeting. The reason he gives is insult added to injury. He could not attend the meet for Navaratras he said. Advani could not have challenged the validity of the reason for sure. Being someone who invoked Lord Rama for all his personal quests did not leave any scope for that, did it? Further, that could have infuriated the matri-shakti, or the mother power, for even Lord Rama worships Goddess Durga. Advani did have an escape route though. He could have used the excuse for rubbishing all those ‘pseudo-secular’ critiques that label his party as a misogynist one. The maverick leader he is, he could have used this as a decisive proof of the feminist credentials of his party, even if that of a subversive kind. I don’t know why he did not.

Maybe he was scared of all the flak Sushma Swaraj, another stalwart of her party, received in 2004 after NDA’s shock defeat in 2004. Her vow to live as a widow if Sonia Gandhi was appointed the Prime Minister was condemned for being misogynist by the women (and of course the men who have become a little civilized unlike her fellows) left, right and center. Advani, I am sure, must have drawn his conclusions then and there. If Sushma could not get away with this I should never ever even try, he must have thought. He must have reminded himself that his specialization lays in playing with fire. He has championed the art of stoking it and running away, ahead to be more precise as the fire always trailed the raths, or the chariots, he rode. For someone with a forte in playing with fire must not dabble in the dangerous domain of feminist discourse, he must have told himself before backing off. Only a toughie can take such tough decisions, isn’t it?

Interestingly, Modi’s snub was not the only one he received, even if it was the most visible one. There were many others, most of them his own protégés who were smirking at his ambitions of becoming Prime Minister of India one day, some day. They knew that it was he and his rath yatras which has brought the party to the power, but they were well aware of the political realities of their country as well.

They knew that the toughie was not smarted by that soft-spoken leader from the cow-belt. They were doubly assured that it was the toughie who has trumped himself. The pretensions of being tough, more so on a particular community, could be anything but a wise political move in a country like ours. Aren’t we a country defined more by the fault lines that run beneath the slogan of unity in diversity? The road to power in this country has always gone through bridging the gaps and not by building up barricades. The toughie has committed that blunder.

In the era where images mean more than the real person behind them, Advani has carved a divisive and unfriendly one for himself. He had established himself as the fire-brand leader and the blue eyed boy of the Rashtriya Swayamsevak Sangh(RSS), the fountain head of sectarian hatred in the country. As an aside, let me say, though, that Advani has always stood true to his RSS roots, more than anyone else in his party. Who else could for those who sow shakhas, or the branches, instead of trees! His acrimonious speeches, his rallies and his campaigns will polarize the society, flare up communal tensions and would bring votes to BJP. They would also mark him as a sectarian leader. He would never have a moral authority that would make smaller parties support him in this coalition era.

Alas, the lure of that elusive post would finally compel him to rub himself clean of that bloodthirsty image. He would also distance himself from the RSS as well, and he would do that in style. He went to Muhammad Ali Jinnah’s Mazar(grave) and called him secular. He had rubbished all that gabbling RSS passes off as its ideology, in a moment. RSS was infuriated for that. Ironically, it was perhaps the first time in their history that an RSS cadre has got historical facts right. RSS has never been much fond of history though, has it?

The toughie has committed another blunder. The second rung leadership has sniffed blood. They knew that this street smart chap can hold his grounds but is doomed. They knew that the post has been declared vacant. It was going to be beginning of a race, a rat race instead of the rathyatra. BJP might not have had the requisite numbers in the parliament, but it was going to have enough contenders to keep the post occupied till the dawn of next century. Bizarre are the ways of politics, aren’t they?

But then, Advani is a toughie and toughies do not quit. They do exact opposite of that as that idiom symbolizing the wisdom of our elders says. When the goings get tough, the toughs get going! What better place Advani could have found to go than roaming around the country announcing in the process that he is still in the fray. And what better vehicle to ride than a rath? He was quite experienced in riding one also. History, however, has its own ways. It does not repeat itself, and if it ever does, it does so first as a tragedy and then as a farce. India of 2011 is not the one of 1992. And then, while speaking on corruption, Advani seems quite out of place unlike the old venomous Advani who made those fiery speeches on Ram Mandir.

Those were the good old days for him, when he was one of the two undisputed leaders of the BJP. Those were the days when BJP was yet to come to power and was, therefore, almost immune from the charges of graft. Not now, when the yatra was to pass through Karnataka, among other places, the erstwhile fiefdom of B S Yeddyurappa the tainted.

Advani has got it all wrong this time. The media made spectacle of Anna Hazare might have given him some hope but one expects a little sanity from a shrewd leader like him. If the spectacles on television could do much, Chandrababu Naidu might have been in power even today and BJP would have made India shine even more than the sun. It’s a different world now. The days when politics unfolded on the streets like a carnival are long gone. It now operates inside the most unlikely spaces. It shapes up inside those makeshift houses where people go hungry and in those shelter camps which came into existence because of an earlier yatra of his. He was once trumped by that soft-spoken north Indian for his acceptability. Now he is trumped by that Gujarati protégé of his who has proved himself far more superior in administering misery on the hapless minorities of his state. Going with the best is the human tendency, even for regressive ends.

This is why this yatra saw him getting booed. People black flagged him at many a places including in Punjab where his party is in government as a junior partner. This was a yatra which might have given him those well-deserved reliefs every day. No black flagging today means the day is better than yesterday when my rath was pelted with rotten tomatoes he must have told himself. Addressing an almost empty rally is better than addressing an empty rally he must have thought the next day. My heart weeps for Jaiprakash Narain though, whose native place Advani audaciously used for kickstarting this failure called a yatra.

I cannot even sympathise with him, for I don’t want to feel nauseated again. I don’t want to lose any more friends either. All I feel bad for is the country, for all his rathyatras would merely reinforce that old and racist image of India as a land of magic, maharajas and the snake charmers.

[Forwarded by the Asian Human Rights Commission]
Republished by Scoop
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December 03, 2011

क्योंकि दिलीप मंडल अन्ना हजारे नहीं हैं.

अरण्यरोदन था, भले जरूरत नहीं थी.
यह कोई ऐसी खबर नहीं थी कि इसको सुनते हुए पार्श्वसंगीत के रूप में अरण्यरोदन जरूरी हो. न ही यह ऐसी खबर थी इस पर प्रतिक्रिया के लिए करुण आर्तनाद की मुकेश के दर्द भरे नगमों से संगत करवानी जरूरी पड़ जाए. हकीकतन, खबर इसकी ठीक उलट थी, मुख्यधारा के मीडिया से अरसे बाद आई एक ऐसी खबर जिससे उम्मीद जगती हो.

दिलीप मंडल का इंडिया टुडे का कार्यकारी संपादक बनना एक उत्साहजनक बात है, खासतौर पर इस सन्दर्भ में कि उनके इस पद पर आने से हाशिए पर पड़ी आवाजों के मुख्यधारा में आने की गुंजाइश तो पैदा होती ही है. आखिर को दिलीप मंडल का इतिहास इन आवाजों के लिए, इन छूट गए सरोकारों के लिए लड़ने का इतिहास है. बेवजह नहीं था कि कथादेश के मीडिया वार्षिकी के संपादकमंडल में एक चेहरा दिलीप मंडल का भी था. उनके इतिहास के मद्देनजर यह उम्मीद की जा सकती है कि खुद को मिले इस मौके में वह मुख्यधारा की मीडिया की उन गलतियों को दुरुस्त करने की कोशिश करेंगे जिनके खिलाफ वह लगातार एक निर्मम लड़ाई लड़ते रहे हैं.

पर उम्मीद के ठीक विपरीत, इस खबर पर आयी प्रतिक्रियाएं बेहद निराशाजनक थीं. कोलावेरी डी के वाइरल होकर 1 करोड़ से ज्यादा हिट्स (तुलना संख्या की नहीं ‘रिस्पांस’ की है) मिलने के बाद यह खबर थी जिसने सोशल नेटवर्किंग की हिन्दी दुनिया में आग लगा दी थी. दुखद यह, कि प्रतिक्रियायों का मूल स्वर हिन्दी भाषा की दरिद्रता और क्षुद्रता दोनों का प्रतिनिधि स्वर था. प्रतिक्रियाएं तमाम थीं और बात सिर्फ एक. शब्द भी वही थे जो लौट लौट कर आ रहे थे. ‘बिक जाना’, चांदी का जूता हो तो, कारपोरेट मीडिया और जाने क्या क्या.

अफ़सोस कि इन तमाम बातों में गालियाँ बहुत थीं, तर्क कोई नहीं. ठीक वैसे ही जैसे जिंदगी चलाने के लिए किसी एनजीओ की नौकरी करने वाले वामपंथी साथी को यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर साम्राज्यवाद का दलाल बताएं. जैसे कि उनके वेतन का पैसा उसी साम्राज्यवादी/पूंजीवादी व्यवस्था के अंग भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय से न आकर किसी अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा संगठन से आ रहा हो. जैसे कि सही गलत सब कुछ तय करने की कोई एक कमेटी हो जिसके वह आजीवन सदस्य हों. यह भी कि जैसे उस कमेटी के दरवाजे बाकी लोगों के लिए हमेशा हमेशा के लिए बंद हों.

मुखालफत का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं, लड़ना होता है.

समाज परिवर्तन के लिए कारपोरेट मीडिया की आलोचना हमारे समय का एक बेहद जरूरी कार्यभार है, लगभग क्रांतिकारी भी. दिलीप मंडल अपनी क्षमता मुताबिक़ करते भी रहे हैं. ठीक वैसे ही जैसे अरुंधती रॉय करती रही हैं, या फिर नोआम चोमस्की. वैकल्पिक मीडिया की दृष्टि से देखें तो ठीक यही काम जॉन पिल्जर जैसे फिल्म-निर्माताओं ने, नाओमी क्लीन जैसी लेखिकाओं ने किया है. पर इन सबने यह काम किया कहाँ है?अरुंधती के लेख कहाँ छपते रहे हैं? मेरे ख़याल से आउटलुक और कुछ भी हो, किसी मार्क्सवादी पार्टी का मुखपत्र तो नहीं ही है! नाओमी क्लीन की, अरुंधती की, चोमस्की की और ऐसे तमाम जनपक्षधर लोगों की किताबें जिन प्रकाशनों से छपती रही हैं उनके मालिकान कौन हैं? ये प्रकाशन कोई रेवल्युशनरी कमेटीज नहीं चलातीं. थोड़ा नजदीक अपने ही देश में आयें तो निर्विवाद रूप से इस देश के सबसे जनपक्षधर पत्रकार पी साईनाथ कहाँ लिखते हैं? ग्रामीण संकट को मुख्यधारा के विमर्श में लाने वाला समाचार पत्र ‘द हिन्दू’ किसी पत्रकार सहकारिता समूह की मिलकियत नहीं बल्कि एक परिवार के मालिकाने वाला समाचारपत्र है. यह भी कि हिन्दुस्तान में तानाशाही के सबसे नजदीक पंहुचने वाले आपातकाल के दिनों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए मर-मिटे इन्डियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों, और तमाम पत्रकारों का वर्गचरित्र क्या था.

काश कि दुनिया संघर्षों से नहीं हमारी सदिच्छाओं से चलती.

मसला साफ़ है की दुनिया हमारी सदिच्छाओं से नहीं चलती. दुनिया के चलने की अपनी एक गति है और यह गति सामाजिक-राजनैतिक शक्तियों के ऐतिहासिक प्रक्रियायों से लगातार टकराने के क्रम में जन्म लेती है. इसीलिए, हमारी सामाजिक--राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के अभी के समाज से बिलकुल मुख्तलिफ होने के बावजूद हमें इसी समाज में रहना है, यहीं छोटी बड़ी लड़ाइयों के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन के लिए बढ़ना है. यह भी कि मजदूरी और सम्मान के लिए लड़ी जाने वाली छोटी छोटी ट्रेड-यूनियनाना लड़ाइयां ही क्रान्ति की पूर्वपीठिका बनती हैं. ऐसे कि जैसे रूस की क्रान्ति मार्क्सवाद के ‘अलगाव(एलीनेशन) या रीइफिकेशन जैसे सैद्धांतिक मसलों पर नहीं बल्कि रोटी, जमीन और शान्ति जैसे बुनियादी मुद्दों पर हुई थी.

नजर हो तो बात साफ़ हो जायेगी कि मुख्यधारा की मीडिया में दिलीप मंडल जैसे लोगों की उपस्थिति सत्ताधारियों के वर्चस्व (हेजेमनी) को चुनौती देने वाला कदम होता है, मुख्यधारा की मीडिया में हमारे समय सन्दर्भों और सरोकारों के लौटने का बायस बनता है. सत्ता की ताकत का अंदर से ‘सबवर्जन’, फिर से, क्रान्ति की बड़ी ‘टैक्टिक्स’ में से से एक रहा है. बेशक ऐसे कदमों के अपने खतरे होते हैं जिनमे बिक जाने का खतरा भी शामिल है. और बिकने को तो फिर दिलीप मंडल ही नहीं, कोई भी बिक सकता है. पर फिर, उम्मीद साईनाथ जैसों के, अरुंधती जैसों के न बिकने से पालें, या फिर हमारी बुर्जुआ नैतिकता के चरम विस्फोट में बिकने को ही नियति मान लें? और फिर, दिलीप मंडल अंतिम संघर्षशील साथी तो हैं नहीं कि अगर वह बिक भी गए (जिसकी उम्मीद मुझे नही है) तो बदलाव के रास्ते बंद ही हो जायेंगे. दिलीप मंडल के ’सम्म्मानित’ नेताओं में से एक शरद यादव दशक भर से भी ज्यादा से भाजपा के साथ हैं, तो क्या बदलाव की लड़ाई रुक गयी? या फिर दिलीप मंडल की राजनीति से उम्मीद रखने वाले सारे शरद के साथ चले गए?

पर फिर, फतवेबाजी, तात्कालिकता, और टीआरपी की खोज में अनवरत संघर्षरत तीक्ष्ण हिन्दीवालों को विमर्शों से खास मतलब ही क्या है? और उनकी बातों में विमर्शों और तर्कों की चीखती अनुपस्थिति मुझे अब चौंकाती भी नहीं है. आश्चर्य सिर्फ इस बात पर होता है कि इन बुद्धिजीवियों के अपने तर्क रोज बदलते रहते हैं और उन्हें इसका इलहाम भी नहीं होता. होता भी हो तो वह उसके लिए शर्मिंदा होते तो कम से कम नहीं ही दिखते हैं.

इनमे से ज्यादातर वह हैं जो अन्ना हजारे के समर्थन में लेट लेट जा रहे थे. लगभग उन्ही तर्कों के साथ जिनके सहारे उन्होंने दिलीप के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. अन्ना हजारे का एक इतिहास है, शिवसेना के साथ खड़े होने का इतिहास, बम्बई में उत्तर भारतीयों पर हमले के समर्थन का इतिहास और साम्प्रदायिक होने की हद तक पाकिस्तान विरोध का इतिहास. मंडल विरोधी (दिलीप जोड़ें या न जोड़ें इनमें से ज्यादातर के चरित्र में फर्क नहीं पड़ेगा) सारे लोग तब हमसे अन्ना का इतिहास भूलने की मांग कर रहे थे. वह हमें बता रहे थे कि कैसे ये मुद्दा इतना महत्वपूर्ण है कि हमें अन्ना के साथ खड़े होना चाहिए, बावजूद इसके कि अन्ना के साथ खड़े होने का मतलब ‘श्री श्री रविशंकर’ से लेकर रामदेव तक विश्व हिन्दू परिषद द्वारा ‘मान्यताप्राप्त’ संतों के साथ खड़े होना भी था.

अब यही लोग कह रहे हैं कि दिलीप मंडल का फैसल उनके ‘इतिहास’ की वजह से गलत है. चूँकि उन्होंने कारपोरेट मीडिया के बाजारवादी, आभिजात्य उच्चवर्गीय और जातिवादी चरित्र का लगातार विरोध किया है इसलिए उन्हें वहाँ नही जाना चाहिए. यह लोग मुतमईन हैं कि दिलीप अपने इतिहास से एक ‘क्लीन ब्रेक’ लेंगे. मुतमईन क्या, उन्होंने तो पहले ही दिलीप के बिक जाने की घोषणा कर दी है. (मुझे डर है कि अब वह कहीं एक ईमानदार पत्रकार को श्रद्धांजलि जैसा कोई कार्यक्रम भी न ठान लें). उनके लिए इस बात की कोई संभावना नहीं है कि दिलीप इंडिया टुडे के अंदर अपने मुद्दों को, दलित-बहुजन मुद्दों को बढ़ा सकें!

अन्ना के समय उनके लिए मसला भविष्य का होता है, दिलीप के समय अतीत का. वजह, शायद, हम साफ़ साफ़ समझ सकते हैं. खैर, दिलीप मंडल की इस नयी पारी से हमें उम्मीदें हैं कि प्रतिरोध का विमर्श मुख्यधारा का विमर्श बनेगा. दिलीप अगर ऐसा नहीं कर पाए तो हम निर्मम आलोचना के लिए भी तैयार बैठे हैं. पर पहले से ले लिए गए फैसलों के आधार पर फतवे देना हमसे नहीं हो पायेगा.

उनको एक ईमानदार सलाह बस इतनी ही है कि इतिहास से खेलना हमारा नहीं फासीवादियों का काम है. हम सिर्फ तथ्यों पर बात कर सकते हैं, विश्लेषण कर सकते हैं. ‘यकीन’ की, श्रद्धा की, ‘विश्वास’ की राजनीति जिनकी है उनके लिए छोड़ दें. दिलीप मंडल के इतिहास के तथ्य हमारे सामने हैं जिनके आधार पर हमने अब तक उनकी समझ बनायी है. उनके भविष्य के तथ्य भी एक दिन इतिहास का हिस्सा बनेंगे और तब हम अपनी राय सुधार लेंगे, बदल लेंगे, या और मजबूत कर लेंगे. उन्हें समय दें कि शायद हिन्दी में कोई साईनाथ, कोई अरुंधती पैदा हो रही हो.

November 23, 2011

RIP God! Wish You were not killed by those loudspeakers!




[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in VOICE,16-30 November, 2011 titled Making it Loud]

The day had started on a brilliant note. It was unfolding like those perfect Sunday mornings which effortlessly stretch themselves into the late afternoons. It was forcing itself, albeit quite beautifully, upon me by making me ponder over one of the most important questions of bachelorhood that has stretched itself into the early thirties of a not so eventful life. The question, too, did not have much to do with any metaphysical quests or the complexities of modern life. Rather, it was quite a simple and rather endearing one- if I should get off the bed to make some tea for myself or if I still had some time left to lazily stare into the white nothingness of the ceiling. Then, some people somewhere in the vicinity took the burden of snatching me out of the unproductive slumber unto themselves.



And what better way could they have found to ensure that than by unleashing the gods themselves on these lazy limbs wasting the Sunday morning? So they did by switching on what seemed and sounded like a thousand loud speakers blaring religious songs into my hapless ears. This was it for that idle gaze fixed on the roof, that pondering over making tea and all that made a Sunday morning beautiful. What I did not understand, though, was how these people got to know that on the question of god I concurred with that wreck of a person called Friedrich Nietzsche. If only he was around, he would have known how wrong he was. The god was yet not dead, just that he had come to live in my neighbourhood. This one was an intrusive one on top of that who has entered my house riding on the sound waves produced by the loud speakers.


This was not the first time though when the god has come to grace the neighbourhood I have been living in. Quite on the contrary, and despite all the problems I started having with him since my late adolescence, he has always been there. I have grown up with him for he was an integral and inalienable part of popular culture. He was there in the prayers of my parents every single morning. He would come to our mohalla every other day, whenever anyone had any reason to feel happy and declare that to the world at large. There would be Satyanarayana Kathas (tales of a true god). I always wondered about for they told all the tragedies that struck the people who were supposed to listen to the ‘katha’ but forgot. They would tell the tales of how this misfortune went away when they rectified their ‘sin’ and organized the recital of the ‘katha’. Yet, there was no tale in the katha and no one in the mofussil who could tell me what the real tale was about!


This, again, does not mean that I had anything against him during those heady days of growing up. I would definitely ponder about the actual tale that was missing from this katha but would love the prasad, especially the sugary flour we would get after the pujas. Then there would be those fairs (mela) we would wait for throughout the year. The melas would make our sleepy mofussil come alive and fill it up with a kind of frenzy pregnant with a hundred opportunities where there existed none throughout the rest of the year. The melas would serve as our only windows to the big-big world that existed outside the peripheries of the mofussil. They would bring us things testing the limits of our knowledge and bewilder us. They had a bigger role to play than that though. They would make us realize the worth of growing up for they would be the only times when we would get some pocket money completely of our own.


Mofussil towns are, and were always, very different from the big urban centers in that the concepts like pocket money don't exist in the mofussil. After all, the kids do not need to use public transport to go to the buildings referred to as schools. They were schools in the basic minimum sense of the word where the operative part was ‘minimum’. The kids from the mofussil would walk to the school and the ones coming from the villages peripherally attached to it would either walk/cycle to it or would be dropped by their brothers, parents or relatives. Well, I concede that motorbikes have replaced most of these cycles since those times of 20 years ago when I walked to one such school.

Not one of these schools would have anything even remotely akin to something called canteen. Canteen, in fact, was a word I got familiar with only when I left my mofussil for senior secondary studies, and there would be no need for carrying any money. Coming back to the point,because we would not need any money of our own to live in the mofussil, we would not get any pocket money. That was a concept that remained completely alien to us till the melas came as saviours giving us money that was our own. I did not have any particular liking for the god, or even for the concept of the god, but then I was quite happy for the fact that he brought us melas at least twice a year.

Nothing of this was comparable to the intoxicating trance that used to descend over our Kasba during the Dusehara festivals. That used to be the only time we felt proud of living where we did. The town would be full of pandals( tableaus) reconstructing the imagery of the victory of good over evil. Well, I accept that I have always had my doubts about what actually constituted good and evil but that did never stop me from living those days to the full.In the dark distant past when we did not have any cable television or computers, when facebook was almost a generation away Dusehara celebrations were our only shot at freedom to celebrate. It gave us a semblance of a night life, the only week in a year when we could afford to return home really, really late.

It also gave us our best friends. The friendships had started developing over edibles bought in the melas and shared with the buddies we found ourselves really close to and it was the time for them to cement themselves into relations that would last a lifetime. Well, let me also concede that these friendships based themselves over many a things that could qualify to be called sinful, at least on the thresholds. We would roam around almost all night and attend every single devi-jagaran or ratjaga (all night singing and worshiping the goddess). We won’t do that for any religious reasons though. The ratjagas would give us our only shot at spotting the beautiful girls of our mofussil and waiting for that elusive smile that would make us fall in love with them.

Our chants would be replete with elbowing each other and announcing our love for the girl we would most often not even know the name of. Those would prove to be one of the most precious moments of our lives. Singing some devotional song or chanting that ubiquitous ‘jai mata di’ we would be poking our ‘best friend’and telling him about the girl in blue suit, decades before That Girl in Yellow Boots was to come. There would be sacrifices, of course very silly ones, too. One would not take a moment to relinquish his love if the other professes it before him!

Forget the fact that more often than not we would not get a chance to talk to that ‘true love’ of ours even once in a lifetime. We were happy with the god (in fact, the goddess) that one could steal a glance at her, and got a smile in return as well at times, of course as presumed by him and vehemently supported by the buddies. Forget the fact that the true love kept changing year after year.

Forget the fact that nothing remained the same after we left the mofussil for higher studies. Forget the fact that we were shocked to find our ‘true loves’ having aged at a pace much higher than us, often married and with babies, when we got back for those holidays that shrank every year.

Forget all this, for nothing of this takes away the celebration of the life that was so intrinsic to the festivities. The festivities, in turn, trumped religiosity inherent to these festivals. Whether or not the ratjaga celebrated the victory of good over evil, it did celebrate the triumph of love (the possibility of love at least) against the repressive system hell bent against any assertion of individual choice. The ratjaga might not have been anything comparable to starry nights that defined the metropolitans but they did give us something to feel proud of, something to talk about to our blessed cousins growing up in cities.

The festivals, and the festivities attached to them, celebrated something more than that. They marked the triumph of the collective while accommodating the individual. The mofussil did never have any event managers, they do not have ones even today. Everything that got organized was organized by the community often obliterating the caste and religious divides. No Dusehara was ever possible in my mofussil without the lighting and firecracker works done by the Muslims and no procession of Moharram would ever be complete without active and enthusiastic participation of Hindus. The mela at Karbala will always have its ulta baja (the drumming that marks sadness) played by the Dalits.

Well, this is not to say that everything was beautiful in the mofussil, but it certainly was inclusive. The festivities brought cheers to us for everyone knew everyone and participated. The ratjagas gave the budding singers their first shot at public singing and the emerging percussionist his or her first at playing tabla or dhol. Loud speakers would of course be there but they would never be able to drown out our voices, neither would the lighting be able to outshine our smiles.

Yes, I had, and still have, a problem with the god for a thousand reasons. Yet, I could live with him for all the festivities that came in his name. Not anymore, for the mindless noise blazing out of the thousand loud speakers with no recognizable human voice. Nietzsche was wrong but not in his assertion that the god is dead. He was in fact murdered by his urban devotees and the alienation that permeates their lives. The weapons used, I am sure, were the loud speakers.

November 21, 2011

टुकड़ा टुकड़ा शाहकार है रॉकस्टार

दुनिया का कोई समाज खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करता. रॉकस्टार देख कर बाहर निकलते हुए मेरे दोस्त प्रशांत ने सिर्फ इतना भर कहा था. रॉकस्टार देखे और उसकी समीक्षाएँ पढ़ते/गुनते/झेलते हुए गुजरे इस एक हफ्ते में प्रशांत की यह बात कानों में लगातार बजती ही रही है.

अफ़सोस यह, कि खंडित होना रॉकस्टार की बनाई मूर्ति की नियति नहीं थी. अपने तई तो इस फिल्म ने बहुत कुछ नया गढ़ने की कोशिश की है और इंटरवल के पहले हिस्से में सफल भी रही है. रॉकस्टार बेशक एक खूबसूरत प्रयोग है, एक ऐसा प्रयोग जिसके टुकड़े शाहकार होने की ऊंचाई तक जा पंहुचते हैं. एक ऐसा प्रयोग जो दिल्ली जैसे शहर और इसके ‘क्रीम’ समझे जाने वाले हिन्दू कोलेज जैसी संस्था के आभिजात्य आवरण को चीरकर उसके अंदर के कस्बाई लोगों की कहानियां कहने का दुस्साहस करता है. वह कहानियाँ जो बहस और विमर्श तो छोड़िये ही, हमारी दीद से भी खारिज कर दी गयीं हैं.

सोचिये तो, कि हिन्दू कोलेज के बारे में सोचते हुए क्या किसी के दिमाग में कैंटीन मैनेजर खटाना जी का ख़याल भी आ सकता है? या फिर चिक-लिस्ट जारी करने वाला वह दृश्य जहाँ दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‘बहनजी’ बताकर खारिज कर दी जाने वाली कस्बाई लड़कियों का दर्द छलक आया है. बहनजी, जिनके बहनजी होने का राज सिर्फ इतना होता है कि ना उन्हें अच्छी अंग्रेजी बोलनी आती है ना हाई-फैशन की गलियों से गुजरना. रॉकस्टार ने, कमसेकम, इंटरवल के पहले के पूर्वार्ध में कस्बाई मानसिकता को न केवल छुआ है बल्कि कहीं कहीं तो यथार्थ से भी आगे के यथार्थवादी ढंग से परदे पर उतार दिया है.

जनार्दन उर्फ जोर्डन उर्फ रनवीर कपूर को दर्द की दीक्षा देते हुए खटाना जी को समझना उस किसी शख्स के लिए शायद कभी संभव नहीं होगा जिसने अपने बहुत पीछे छूट गए कसबे में खुद को देख बेसाख्ता मुस्कुरा पड़ी एक लड़की की दूसरी मुस्कराहट के इन्तजार में खुद को देवदास न बना डाला हो. यह दर्द वही समझ सकता है जिसने मुकेश के दर्द भरे नगमों को ५ रुपये में एक कैसेट पर ‘डब’ करवा कर सुना हो, जिसने अताउल्लाह खान की ‘दर्द’ भरी गजलों से ज्यादा उनकी सच्ची झूठी कहानियों पर आंसू बहाये हों. यह उन्ही कस्बाई लड़कों के लिए संभव है जो एक लड़की के इकतरफा प्रेम में जिंदगी के एक लंबे दौर तक उदास रहने को काम समझते थे और फिर अपने पिता की दुकानों पर बैठ धीरे धीरे तोंदिल अधेड़ों में बदल जाते थे.

यह वह जगह है जहां आकर चुक जाना रॉकस्टार की नियति बन जाता है. यह वह जगह है जहाँ आकर रॉकस्टार को जनार्दन को पीछे छोड़ जोर्डन की कहानी कहनी पड़ती है. वह कहानी जिसमे हमारे नायक को ‘दर्द’ तलाशना है, वह दर्द जो उसे बचपन में अपना शोषण ना होने से लेकर अपने माँ-बाप के अब तक जिन्दा होने की वजह से अजनबी सा लगता है. और फिर दिल टूटने का दर्द तो नीली जींस के ऊपर घर का बुना स्वेटर पहनने वाले इस लड़के के नसीब में था भी कहाँ.

रॉकस्टार के प्रयोगों की ख़ूबसूरती उस अंतर्संघर्ष के निरूपण की ख़ूबसूरती थी जो कस्बाई जेहनियत के महानगरीय आभिजात्य संस्कृति से चाहे-अनचाहे टकरावों से पैदा होती है.यह खूबसूरती जनार्दन के जोर्डन बनने की यात्रा में भी बनी रह सकती थी बशर्ते फिल्म उस यात्रा के रास्तों को पहचानने की, उन पर चलने की कोशिश करती. पर यहाँ तो न सड़कें थीं न सफर, बस मंजिल ही मंजिल थी. वह भी ऐसी मंजिल जो हसीन हादसों के इत्तेफ़ाक से हासिल हुई है.

हाँ, रॉकस्टार का जनार्दन किसी अंतर्संघर्ष की तपिश से पैदा हुआ कलाकार नहीं, एक सफल इत्तेफाक भर है, एक इत्तेफाक जो रॉक की ऊँचाइयों तक जा पंहुचता है. किन रास्तों से यह बताना फिल्म भूल गयी है. अपनी किसी दोस्त (जो लड़की है) की शादी में काश्मीर चले जाने की वजह से घर से निकाल दिए जाने का इत्तेफाक. (वैसे इसमें इतना गलत क्या था कि बात डांटडपट से ऊपर जाकर घर से निकाल देने पर रुके यह आखिर तक समझ नहीं आया.)

फिर खटाना जी जैसे दोस्त के घर न जाकर पूरे दो महीने निजामुद्दीन दरगाह पर रहने का इत्तेफाक. इस इत्तेफाक से उपजा वहाँ के कव्वालों से टकरा उनके हारमोनियम की संगत में अपना गिटार उतार देने का इत्तेफाक. (यूँ ईमानदारी से कहूँ तो गिटार और हारमोनियम की ये संगत इस फिल्म के सबसे बड़े दृश्यों में से है, या शायद समकालीन बोलीवुड के भी). फिर गिटार बजाते हुए एक बड़े शहनाईवादक उस्ताद द्वारा देख लिए, और उस्ताद के प्रभावित होने का इत्तेफाक. फिर म्यूजिक कंपनी के ऑफिस से लगभग असफल होकर निकलते हुए उस उस्ताद के पंहुच जाने का इत्तेफाक.

हाँ, इस मामले में यह फिल्म अपने समय की नब्ज को बिलकुल ठीक ठीक पहचानती है, पकड़ती है. शेयर बाजार के इत्तेफाकों से तय होते उतार चढ़ाव की लहरों पर सवार होकर धनकुबेर बनने के सपने देखनेवाले इन समयों में, कौन बनेगा करोड़पति खेलते इन समयों में, या फिर रियालिटी स्वयंवरों के इत्तेफाकों से निकले फैसले लेकर जीवनसाथी चुनने के इन समयों में सफलता के लिए इससे ज्यादा संघर्ष दिखाने की जरूरत भी क्या थी. वह दौर कोई और था जब बम्बई नाम के उस शहर में ‘स्ट्रगलर’ नाम की एक पूरी जमात हुआ करती थी. काश उन्हें भी कोई हीर कौल मिल जाती फिर तो हमारे पास दिलीप कुमार से लेकर अमिताभ बच्चन तक सब बहुवचन में होते!

खैर, खटाना भाई के दिए ज्ञान को पल्लू में बाँध रेडीमेड दर्द की तलाश में निकले हमारे जनार्दन को फिर बस एक ही रास्ता दीखता है, कोलेज की मशहूर दिलतोड़ू हीर से प्रेम का इजहार कर खारिज कर दिया जाना और उससे पैदा हुए दर्द को अपनी रचनाशीलता के ईंधन में डाल महान कलाकार बनने की यात्रा पर निकल पड़ना! उसके बाद जो है, अंग्रेजी में कहें तो बस ‘इतिहास’ है.

पर फिर, इस इतिहास में दर्द, वह भी इतना सारा, आया कहाँ से यह इतिहास शामिल नहीं है. बस स्टॉप पर बोर हो रही जनता का मनोरंजन कर रहे ‘जनार्दन’ की दिल्ली पुलिसिया पिटाई को भी भरपूर ‘फुटेज’ देने वाली यह फिल्म उसके दर्द के स्रोतों का कहीं कोई फुटेज नहीं देती. उसके तो खैर छोड़िये ही, जनार्दन के पूछे सवाल कि ‘कहीं तुझे मुझसे प्यार तो नहीं हो गया’ का विलंबित जवाब देती हीर कौल की ‘हाँ’ छोड़ें तो फिल्म में और कहीं कुछ भी ऐसा नहीं है जो इस दर्द का बयान कर सके.

इसका भी कि हीर के प्राग जाने और बीमार हो जाने के पीछे की वजह क्या है/थी. इसका भी कि मनोवैज्ञानिक बीमारी के अस्थि मज्जा (बोन मेरो) कैंसर में बदल जाने के पीछे इश्क-ए-हकीकी था या गम-ए-मजाजी! फिर से, सिर्फ एक दृश्य हीर के हाल की थोड़ी सी खबर देता है, जब उसका पति जोर्डन के बारे में सवाल कर्ता है और वह सिर्फ इतना कह पाती है कि ‘पता नहीं’!

शायद इस पता नहीं में ही जोर्डन के गुस्से का राज है. पर यह गुस्सा है किसके खिलाफ? उबलता हुआ आक्रोश तो ठीक है पर सिर्फ एक गाने में लहराते तिब्बत के झंडों से या कश्मीरी जनता की उपस्थिति से कुछ साफ़ नहीं होता. यह भी कि साडा हक छीना किसने है, इसे वापस लेना किससे है.

यही वह जगह है जहाँ आकार यह फिल्म बोझिल सी हो जाती है. काश्मीर की खूबसूरत वादियों में बारहा दौड़ती मोटरसाइकिल का बिम्ब कहीं अंदर यह भी महसूस कराने लगता है कि पहली ही बार के देखे में हम यह फिल्म बार बार देख रहे हैं. या शायद, यह गुस्सा हमारे समयों की छाती पर धंसा हुआ वह झंडा है जिसको सेंसर बोर्ड बार बार धुंधला कर देता है. जोर्डन का आक्रोश वह आक्रोश है जो गरीब जनता के छीने जाते हकों के बरअक्स छीजते जीवन मूल्यों वाले मध्यवर्गीय सपनों का भारत है, ३२ रुपये से नीचे जीने वाली ७० प्रतिशत आबादी के सामने चलो अमेरिका के सपने वाला इण्डिया. इस इण्डिया का गुस्सा बस इतना ही हो सकता है. इसके अस्तित्व की तलाश भी बस जिंदगी में पहली बार चाय बनाने के संकट से उपजी अपने आपे की खोज भर हो सकती है. फिल्म इस दिशा में इशारा भी करती है जब म्यूजिक कंपनी का मालिक कहता है कि सब कुछ 'इमेज' है.

टुकड़ों टुकड़ों में शाहकार यह फिल्म एक इमेज एक मूर्ति तो गढ़ती है, पर एक खंडित मूर्ति, और प्रशांत की बात बिलकुल सच है कि दुनिया का कोई समाज खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करता.

November 11, 2011

Of Despicable Duplicates: Can the copycat outshine the real Mahatma?




[From my column OBVIOUSLY OPAQUE in VOICE,01-15 November, 2011]

Imitations, they say, are the best form of flattery. It could not be otherwise, for being an imitation, even if a bad one comes far too easily than being an original in today’s copycat world. They come with an advantage too. Once caught, imitations could always take advantage of being the indisputable proof of the worthiness of what was getting imitated and thus subvert the whole process of imitation into celebration of the original.

The logic worked more often than not. A Salman Khan looked at ‘fake’ ‘Being Human’tee shirts as the strongest proof of his stardom. Cheap replicas of an ‘Anarkali’ worn by some actress in some movie flooding the markets spoke volumes about the success of the movie, and the starlet, even if the trade pundits opined in the opposite. There was Ghajini too, leaving its mark on the minds and the heads, literally, of the youth of the country.

All of a sudden we had all the streets taken over by the young people, all male, walking with that strange hair style adorning, I wonder if that’s the right description but then that is beside the point, their heads. How much I shiver at the thought of that would have happened if Occupy Wall Street Movement started by then? That would definitely have looked like quite a surreal scene straight out of some scifi flick.

For now, we can take relief in the fact that it did not, and the Wall Street, and every other thing that is occupied and is getting occupied, is being occupied by normal human beings like us. Those who are the 99 per cent, own less than the ten per cent of earth’s resources and therefore cannot afford the lobbyists.

We can also take relief in the fact that they did not bear those white caps known as Gandhi-topis! Like all reliefs in today’s melancholic world, however, this one was to be short lived as well. Someone was going to force this ‘topi’ on the heads of the youth with a sort of moral authority that never was.

He was an imitation but not the one that would make the original any prouder, any more desirable. He was a terrible photocopy of the original, blurring the text to such an extent that they first became incoherent and then, read with the glasses of the killers of the original,gave a meaning completely antithetical to what the original one has preached and practiced all his life.

As I have said even earlier in my articles for this column only, that old frail chap clad in a loincloth, the one who walked with a stick, was not flawless, neither do I agree to all his ideas. Quite contrary to that, I am vehemently opposed to some of them, and thank heavens, unlike the new copycat Gandhi, his philosophy allows me to think like that and still be certain of my safety and security. He was as fallible as a human being can get. He had his strengths and his weaknesses. He fought with the enemies but never despised them. He abhorred what he called ‘sin’ but told not to hate the sinner. He believed in engaging and not assaulting even those opposed to him. There was another thing in life he never compromised upon, the right of democratic dissent.

There was another thing very close to the original’s heart. The idea of secularism entwined with the idea of justice. His idea of secularism was, of course, very different from how we understand it today, or in the modern/western (I don’t want to use these words inter alia but is there a way out?) sense we see it today.

Secularism, for him, was not the separation of religion of public sphere but offering equal protection to all religions by the state. This was something he did never compromise upon, right from the days of Khilafat movement to his death by the bullet of a Hindu fanatic belonging to the same Rashtriya Swayamsevak Sangh(RSS) that forms the backbone of the so called movement of the new copycat Gandhi.

The original one, the Gandhi, had the courage to speak his mind and own responsibility for what he said and did. There were times when he found himself flowing against the current. There were times when he found all his friends, all his supporters in disagreement with him. There were times his candidate lost for the post of presidency of Indian National Congress against Netaji Subhash Chandra Bose, another stalwart of our freedom struggle. Yet, he never lost a friend. He never made an enemy. His moral authority was so huge that the same Netaji was to call him Mahatma in his first ever broadcast after the formation of the Indian National Army.

His moral authority was earned and was not imposed on him by the media as was going to be the case with his murky copycat some six decades later. His fallibilities made him more human, more humane, and so much more likeable. They also made it so much easier to relate to him. He was not merely a trope to bring out the best and worst of human interactions. He was not, and could not be used as a literary device, for he was neither going to become a devil nor a prophet. He was not going to even claim that. This is what makes him Gandhi, the hero of the people, the one who left indelible marks on the history and future of his people.

It was not without reasons that public sphere and popular discourse of his times often become synonymous with his life. I could have called him best person who ever lived on this earth like Einstein but will not. For me, Ernesto Guevara aka Che was the most complete human being as was for Sartre. And then, I would thank the original one again for being able to say that. As it is, for this blasphemous comment the new one might have let his menacing supporters loose for my blood, or even more possibly, would have brought out his Shivaji’s sword out of sheath.

More I think of this more I get ascertained that no imitation would have done this huge disservice to the original, in the ‘hitherto’known history of the world.

Remember the original one who was the last man standing in the face of all the mayhem brought in by the torturous partition of the subcontinent and look at this army deserter who takes recourse to abusing Pakistan at the drop of a hat. Look at the original one who fought for Pakistan’s dues singlehandedly and this one who stops just short of celebrating violent attacks on a member of his own core committee!

I wonder what part of the committee is left now, for all the desertions reported by the media hint at not even the core remaining in that core committee. This self-designated Gandhi, plan B-Z (it has yet not completely abandoned the BJP despite all the’ rat/h’ races!) of the RSS and its hundred arms, would not have read the history of Kashmir conflict, I am sure. Neither is there any remote possibility of this small tyrant of a village who derives sadistic pleasure by flogging the ‘alcoholics’, what if they bought it from the government owned ‘thekas’ and paid all taxes, having heard the name of Jawaharlal Nehru. After all claiming to be a second Gandhi,or a third JP or a fourth Hitler is far easier than serving the punishment of staunchly secular Nehru, isn’t it? Had he read him, he might have seen the case in a different light.

Let’s forget the merits of the case Prashant Bhushan espoused for a moment though. Let’s just remember the Honourable Supreme Court’s recent pronouncement that one cannot be convicted even for the ‘membership’ of a ‘proscribed’ organization if s/he is not inciting or engaged in acts of violence. So even if, I repeat, even if Bhushan’s comments were ‘anti-national’, was the attack on him justified? Who listens to the Supreme Court though? Definitely not the ones who are the court, the law, the constitution and even the people unto themselves? Nay, they are above than them all, as his lieutenant who is yet to come clean on his NGO’s accounts claimed.

They are the ones who will never, for once,think of Babasaheb Ambedkar and realizing their folly one fine day, they would invite two girls a Dalit and a Muslim to offer juice to that copycat, forgetting the fact they are marking the girls for their lives. They would do it on the same stage where another of their core committee members would crack highly casteist jokes and sing objectionable songs like ‘the streets of Patna are crying , those destined to graze the cattle are running the country’. Pat comes another salvo, this time from the horses (the twice born one?) deriding the Chandal- Chaukadi, denigrating a caste protected under the provisions of Scheduled castes and tribes act! Invoking Babasaheb, again, is far easier than concealing the casteism that has become part of their DNA, isn’t it?

Oh yes, I almost forgot about their goddess of honesty who was charging fares for the same flight from two different organisers and was actually pocketing it! Though, this was just another feather in her very honest cap, err Anna topi, that included gems as getting her daughter admitted to a medical school under North-East quota!

That Gandhi was in favour of disbanding the Congress, but was not interested in annihilating it, leaving the ground open for Jansangh, the illegitimate father of the BJP. For argument sake even if we accept that the Congress is the most corrupt one, would the BJP be a distant second? And the Haryana Janhit Congress (HJC) of Kuldeep Bishnoi? History can’t forget the ‘legacy’ of Bhajan Lal so easily.

Ask any such questions and the Gang Anna starts singing in unison this is all a ploy! this is all a ploy! Uff, so reminiscent of those sheeps from that brilliant masterpiece of Orwell, The Animal Farm! Ask them why they should not be subjected to same levels of scrutiny as others and they go in hiding, sending the ‘masterfake’ into maunvrat (vow of silence)!

I remember the original one going for fasts many a times, but never a maunvrat. A maunvrat for him would have been something similar to escaping, like conceding defeat, and he was not known for that. He went for fasts to purify himself, ‘atmsuddhi’ as he used to call it. He kept on dealing with issues and engaging with people during those fasts. The reason was simple. His answers could have been inadequate but he was never bereft of them. His actions could h ave been misperceived, but no one doubted his integrity ever.

Precisely for these reasons, the fake one has started moving towards his nemesis. Greatness, after all, is earned and when one has it imposed on him he gets destined to the fate of this fake one.

Meanwhile, I am really very happy for the original one, Mohandas Karamchand Gandhi. I am sure he, too, would be immensely relieved for the fact, wherever he is, for not bearing the cap named after him even once.