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December 20, 2010

बुद्धत्व बरास्ते रिलायंस ब्रोडबैंड

मनुष्य को ज्ञान कहीं भी मिल सकता है. वह भी किसी भी प्रकार के मनुष्य को. धार्मिक/आध्यात्मिक मनुष्यों को देखें तो महात्मा बुद्ध को ज्ञान वटवृक्ष के नीचे मिला जबकि हज़रत मूसा को पहाड़ पर. विज्ञान में आयें तो आर्किमिडीज के ज्ञानचक्षु स्नानघर में खुले जबकि न्यूटन को सेब के पेड़ के नीचे सलाहियत हासिल हुई. ये तो हुई बहुत बड़े लोगों की बात और हम ठहरे छोटे, सामान्य किस्म के प्राणी. तो हमें आज हमारे कमरे में ही बुद्धत्व प्राप्ति का सुख मिला.

हुआ यह की बहुत पैसे देकर ख़रीदा गया बहुत बड़े बड़े वादे(जैसे कहीं भी कभी भी सुपरफास्ट इन्टरनेट कनेक्शन) करने वाले रिलायंस नेटकनेक्ट ने आज हमें बहुत परेशान किया. यूँ तो इसमें ना कोई नयी बात थी ना बड़ी क्यूंकि ३.१ मेगाबाईट प्रति सेकण्ड की रफ़्तार तो इस भले कनेक्शन ने हमें 'कहीं भी, कभी नहीं' दी वादे चाहे जितने किये हों. पर फिर वही की
"वादे किये हज़ार ये अहसान कम नहीं
ये और बात है कि फिर वो मुकरते चले गए'

तो कुछ अपने बड़प्पन में,(बड़े हों या ना हों, दावा तो कर ही सकते हैं ना) और कुछ रिलायंस के अहसानों तले दबे देश का सामन्य नागरिक होने के नाते ( धीरू भाई का सपना हर हाथ में मोबाइल हो वाले अंदाज में, अब अपने लिए सपने तो सब देखते हैं पर पूरे देश के लिए!!!) हम भी ये छोटी छोटी बातें माफ़ करते गए. पूरे देश में तेज कनेक्शन का तो छोडिये, इलाहाबाद जैसे बड़े शहर में भी नेटवर्क ना मिले तो भी हमने बुरा नहीं माना. (ये और बात है कि मान भी लेते तो क्या कर लेते उन भाइयों का जिनके झगड़े खुद प्रधानमन्त्री बैठ कर सुलझाते हों).

पर आज जब बहुत जरूरत के वक़्त दिल्ली जैसे शहर में भी इस कनेक्शन ने लग के देने का नाम ना लिया तो हमें सोचने पर मजबूर होना पड़ा. (इस देश में मध्यवर्गीय लोग वैसे भी सोचते तो मजबूरी में ही हैं, नहीं तो पैदा होने के बाद क्या पढ़ना है, कहाँ पढ़ना है, १०वीं में विज्ञान पढ़ना है या नहीं, स्नातक विज्ञान विषयों से करना है या कला/साहित्य या समाज विज्ञान में तक सारे फैसले या मजबूरी में करते हैं या भेड़चाल में. हद तो यह कि शादी किससे करनी है जैसा अति-व्यक्तिगत फैसला भी इस देश में ज्यादातर मध्वर्गीय लोगों के लिए उनके माँ बाप या परिवार के अन्य लोग ही करते हैं तो फिर सोचने जैसा कठिन काम करने की जहमत उठाने की जरूरत ही क्या है) तो हमने सोचा और बहुत सोचा कि इस उतराधुनिक पूंजीवादी समय में भी पैसे देने पर उसका मूल्य क्यूँ नहीं मिल रहा. आखिर को मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था लाने वाले लोगों का तो दावा ही यही था कि बाजार महान है, कार्यकुशल है, सरकारी लालफीताशाही से मुक्त है, संक्षेप में बाजार इस धरा पर ईश्वर का साकार रूप है. तो भाई यही बाजार वादे करके सामान बेचता है फिर वादों के मुताबिक़ सेवाएँ क्यूँ नहीं देता.

और यही वह सवाल था जिसने मुझ अज्ञानी की दुनिया ज्ञान के प्रकाश से भर दी. बुद्धत्व के उस एक पल में हमें समझ आया कि बाजार सामान नहीं सपने बेचता है. और सपने खरीदने के बाद उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी जिसका सपना है उसकी है ना की जिसने बेचा उसकी. अब किसी तरफ से देखिये, पहली , अगर रिलायंस ने आपको और हमको धीरुभाई का सपना बेचा तो खरीदने के बाद सपना हमारा हुआ. और अगर अब इस सपने में कोई दिक्कत आई तो ठीक करने की जिम्मेदारी किसकी हुई? दूसरी तरफ से देखिये तो, अगर सपना धीरुभाई का था तो पूरा भी धीरुभाई करेंगे. अनिल भाई अम्बानी तो उस सपने को आप तक पंहुचाने का निमित्त मात्र हैं, सपने में कोई दोष हुआ तो नका क्या कसूर. (पिता ने कोई हत्या की तो बेटे को फांसी चढ़ाना न्याय थोड़े हुआ.)

अगर आपको यह बात दूर की कौड़ी जैसी लग रही तो जरा परमाणु जवाबदेही बिल(न्यूक्लिअर लाइबिलिटीज बिल) पर नजर डालें. भारत सरकार ने पूरी कोशिश की कि अगर कोई परमाणु दुर्घटना हो जाय तो जवाबदेही रिऐक्टर बेचने वाली कम्पनी की न हो. फिर विरोध हुआ तो सरकार ने कहा की कि रिऐक्टर बेचने वाली कम्पनी की जिम्मेदारे केवल उस हाल में होगी अगर दुर्घटना के पीछे उसका इरादा रहा हो. अब बताइए भला, कौन सी कम्पनी मानवीय चेहरे के साथ वैश्वीकरण के इस दौर में जानबूझ के दुर्घटना करना चाहेगी.अब सोचिये कि अगर भोपाल गैस काण्ड के बाद भी ऐसी संभावित त्रासदी की जिम्मेदारी अगर रिऐक्टर कम्पनी की नहीं है तो 'नेटकनेक्ट' के काम ना करने की जिम्मेदारी रिलायंस की कैसे हुई? आखिर दोनों ही सपना बेच रहे हैं, एक २०२० तक 'महाशक्ति भारत' का सपना तो दूसरा धीरुभाई का सपना. सामान तो बस उस सपने का साकार या मूर्त रूप है और निराकार की परंपरा वाले इस देश में साकार की कीमत ही क्या. ना याद हो तो लें.. ब्रम्ह सत्यं जगत मिथ्या .

और इसी विचार ने ने मेरे मानस पटल पर ज्ञान का तीसरा विस्फोट किया. (हो पहले ही जाना चाहिए था पर हम ठहरे मंदबुद्धि). हमने खुद से ही पूछा कि अगर सामान बाजार द्वारा बेचे जाने वाले सपने का सिर्फ मूर्त रूप है तो बाजार क्या है. इसके पीछे भी तो कोई अमूर्त अज्ञात सत्ता होगी. और यह लीजिये.. उत्तर हमने(वैसे तो एडम स्मिथ से लेकर तमाम नवउदारवादियों ने कहा था पर श्रेय लेने में क्या जाता है.) पहले ही दे दिया था. बाजार इस उत्तराधुनिक समाज में ईश्वर का साकार रूप है. और ईश्वर भले निराकार हो, वह धरा पर आता अवतारों के स्वरुप में ही है. तो फिर ३३ करोड़ देवताओं वाले इस समाज के पूंजीपति मनुष्य नहीं वरन अवतारी पुरुष हुए. और उनमे भी सबसे बड़े, आजकल, हुए अम्बानी बंधु. अब जरा अम्बानी बंधुओं के बारे में सोचें. आखिर उनका बेचा सपना/सामान भी तो उन्ही सा होगा. तो उनका बेचा नेटकनेक्ट हमें बस वैसे ही धोखा दे रहा है जैसे उन्होंने देश को दिए हैं. उनका बनाया नेटकनेक्ट मंहगा भी बस उतना ही है जितनी मंहगी वो देश को देश के ही समुद्र से निकाली गयी गैस बेचते हैं. और उनके बेचे सामान को ठीक करना छोटे मोटे मैकेनिक के बस का कहाँ.. उसके लिए भी देश के प्रधानमन्त्री (कार्यालय सहित) चाहिए जैसे बंधुओं के बीच के विवाद को दूर करने के लिए चाहिए थे..

तो बस.. दर्द का हद से बढ़ना है दवा बन जाना वाले अंदाज में हमारा दर्द गायब. वैसे भी बुद्धत्व प्राप्त व्यक्ति को दर्द कैसा.

2 comments :

  1. चलो बरास्ते रिलायंस तुम्हें बुद्धत्व की प्राप्ति तो हुयी :-)
    और ये रिलायंस का कनेक्शन तो यार सच में कभी-कभी इतना झेलाता है कि जी करता है कि कि कि... जाने दो यार. जी कुछ करके भी क्या कर लेगा.

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  2. itne rokr gyan mila v to chalo ab dusro ko nsiyat dene ke kam aayega ye Budhatva...

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