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December 11, 2010

मध्यवर्ग की सत्ता


[9 दिसम्बर 2010  को जनसत्ता मे प्रकाशित]

मध्यवर्ग की अल्पजीवी स्मृति और उससे भी कमजोर विक्षोभ से ज्यादा सुकून देने वाली बात हिन्दुस्तानी हुक्मरानों के लिए शायद ही कोई हो. आजादी के 60 सालों में निम्नवर्ग की आवाज़ लगभग पूरी तरह से छीन लेने के बाद अत्याचार और सांस्थानिक लूट के खिलाफ कभी कभी फूट पड़ने वाला मध्यवर्गीय आक्रोश ही है जो हुक्मरानों को पूरी तरह निरंकुश हो जाने से रोकता है. पर फिर, शासकवर्ग को इस क्रोध और गुस्से की धार का पूरा अंदाज़ा भी है.

सबसे पहले बात गुस्से की. सत्ताधारी खूब जानते थे कि राष्ट्रमंडल खेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबरों से आहत मध्यवर्गीय नैतिकता ज्यादा देर आहत नहीं रहने वाली. और अगर रहे भी तो हुक्मरानों को ज्यादा परवाह करने की जरूरत नहीं थी क्यूंकि दुनिया के इतिहास में मध्यवर्ग कभी सड़कों पर उतर कर संघर्ष करने वाले वर्ग के बतौर नहीं जाना गया. कम से कम भारत में बम्बई पर हुए आतंकवादी हमले (जहाँ मध्यवर्ग सीधे निशाने पर था) जैसी घटनाओं के बाद अगर कभी मध्यवर्ग सड़कों पर उतरा भी है तो उसी तेजी से ऊँची दीवालों से घिरी और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी वाली अपनी रिहाइशों में लौट भी गया है. (बम्बई में दिखे तमाम गुस्से के कुछ ही दिन बाद हुए चुनावों में मतदान का 45 प्रतिशत से भी कम रहना इस सम्बन्ध में बहुत कुछ साफ़ कर देता है.)

तो हुक्मरान बिलकुल ठीक समझ रहे थे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दिख रहा यह गुस्सा भी सिर्फ एक वक्ती उबाल है और इससे निपटने के लिए महामहिम ओबामा के आगमन की बस एक खुराक काफी होगी. तो अपने साथ व्यापार और अमेरिकी ग्रीनकार्ड के सुनहरे सपने लेकर महामहिम ओबामा आये और बस, राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार की खबरें पहले तो अखबारों के पहले पन्ने से गायब हुईं और फिर अंदर के पन्नों से भी.

ओबामा के आगमन के उल्लास में डूबे हुए मध्यवर्ग और मीडिया के लिए राष्ट्रमंडल खेलों की बात तो खैर छोड़ें ही, बम्बई में हुए आदर्श हाऊसिंग सोसायटी घपले की खबरें भी सुदूर अतीत का हिस्सा बन गयीं. कारगिल में अपनी जान पर खेल कर इनके ‘राष्ट्र’ की रक्षा करने वाले सैनिकों के नाम पर फ्लैट्स पर कब्ज़ा करने वाले राजनेता और भ्रष्ट बाबूशाही दोनों के खिलाफ मीडिया और मध्यवर्ग का गुस्सा कश्मीर पर एक कड़वा पर सच बयान देने के बाद अरुंधती रॉय के खिलाफ दिखाए गए गुस्से बहुत बहुत कम ही दिखा. और यह सब इस बात के बावजूद कि राष्ट्रवाद का सारा ठेका इसी बुर्जुआ मीडिया और मध्यवर्ग ने उठा रखा है.

मध्यवर्ग की कमजोर स्मृति से पूरी तरह वाकिफ सत्ताधारी मध्यवर्ग की दूसरी कमजोरी भी बिलकुल ठीक ठीक पहचानते हैं. शासकवर्ग यह समझता है कि मध्यवर्ग को सिर्फ दो चीजें परेशान करती हैं. पहला जब हमला सीधे मध्यवर्ग पर हो (जैसे बम्बई पर हुए आतंकी हमलों में या जेसिका लाल हत्याकांड में) और दूसरा जब मामला धन का हो. परन्तु यहाँ भी मध्यवर्गीय स्मृतिभ्रंश का रोग ध्यानविचलन की दूसरी मध्यवर्गीय कमजोरी के साथ सत्ताधारियों की मदद को हमेशा तैयार रहता है. हर सुबह अखबार के पहले पन्ने पर छपी किसी खबर से उद्वेलित होने वाला मध्यवर्ग अगली सुबह किसी दूसरी खबर से उद्वेलित होकर पहली को भूल जाने में देर नहीं करता.

इसीलिये जब 1.76 करोड़ का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो मध्यवर्ग को सिर्फ 1 लाख करोड़ का राष्ट्रमंडल खेल घोटाला भूलने में कितना समय लगता? ऊपर से तुर्रा यह कि २जी स्पेक्ट्रम घोटाला आभिजात्य और मध्यवर्ग दोनों के आर्थिक हितों से सीधे सीधे जुड़ता है, जबकि राष्ट्रमंडल खेलों का खंजर गरीबों के सीने पर चलाया गया था. इसीलिये मध्यवर्ग और उसके सबसे बड़े प्रतिनिधि के बतौर जाने जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद राष्ट्रमंडल खेलों के सफल आयोजन को भारत का राष्ट्रीय गौरव स्थापित करने वाले महापर्व के बतौर देखते ही हैं. जैसे कि भारत देश दिल्ली नाम की इसकी राजधानी के बराबर हो और दिल्ली की चमचमाती सड़कें मीलों पैदल चल कर पानी लाने वाली राजस्थानी औरतों के दुःख का स्थाई इलाज हों. या कि जैसे जगमगाती दिल्ली के बाहर रहने वाले लोग और कुछ भी हों, भारतीय ना हों.

अब बात दूसरी यानी मध्यवर्गीय गुस्से की धार की. मध्यवर्गीय क्रोध केवल अपने ऊपर किये गए हमलों पर उबलता है. देश की गरीब जनता पर किया गया कोई भी हमला मध्यवर्ग की आँखों में कभी नहीं चुभता. इसके ठीक विपरीत, अक्सर इन हमलों के पीछे मध्यवर्ग की मौन सहमति ही होती है.

इन हमलों की रोशनी में देखें तो राष्ट्रमंडल घोटाले आर्थिक सन्दर्भों में 2जी स्पेक्रम घोटाले से छोटे होने के बावजूद अपनी अमानवीयता और शहरी गरीबों के अधिकारों के दमन में भारतीय लोकतंत्र के साठसाला इतिहास की असफलता के निकृष्टतम उदाहरण के बतौर उभरते हैं. बावजूद इस सच के कि खेलों के आयोजन की कुल कीमत मूल अनुमानों से करीब 114 गुना बढ़ कर 7 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पंहुच गयी (वह भी उस देश में राष्ट्रीय गौरव स्थापित करने के नाम पर जिस देश को इंटरनेशनल फ़ूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा जारी ताजा वैश्विक भूख सूची(ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में 67वें पायदान पर खड़े होने में कोई शर्म नहीं आती) राष्ट्रमंडल 2010 अबतक का सिर्फ सबसे बड़ा और भ्रष्टतम खेल आयोजन नहीं है. फिर भी याद रखने की जरूरत है कि राष्ट्रगौरव के स्वयम्भू पहरेदार कभी ये सवाल पूछते नहीं पाए गए कि जिस देश में हर दिन खाली पेट भूखे सोने वालों के संख्या अफ्रीका के कुछ सबसे गरीब देशों की कुल जनसँख्या से ज्यादा हो, उसी देश में 10 दिन के खेलों के लिए 1 लाख करोड़ से ज्यादा की धनराशि व्यय कर देना किस किस्म के राष्ट्रगौरव का परिचायक है? इस देश की जनता द्वारा विभिन्न करों के रूप में दिए गए धन की इस आपराधिक बर्बादी का सच समझने के लिए एक दूसरा आंकड़ा देखना बेहतर होगा कि खेलों पर 1 लाख करोड़ खर्च करने वाली इसी सरकार के बजट में समेकित बाल विकास सेवाओं(आईसीडीएस) के लिए कुल 8700 करोड़ रुपये का प्राविधान है. फिर से, उसी देश में जहाँ सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक कुल बच्चों के 40 प्रतिशत से ज्यादा कुपोषित हैं और जहाँ की शिशु मृत्युदर बांग्लादेश से भी खराब है.

पर न ये कुपोषित बच्चे मध्यवर्गीय परिवारों के हैं न ही हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर इस देश के 40 करोड़ से ज्यादा नागरिक. और रोज रोटी कमाने और जिन्दा रहने की जद्दोजहद में लगे इन लोगों की जरूरतें 2020 तक भारत को महाशक्ति बनता देखने की मध्यवर्गीय ख्वाहिशों से बिलकुल अलग हैं. अब चूँकि मीडिया, खासतौर पर अंगरेजी मीडिया, पर यही वर्ग काबिज है तो राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले के आर्थिक पहलू से अलग (अ)मानवीयता के पहलू पर इसे लोगों का ध्यान हटाना ही था.

यह पहलू है राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर की गयी बर्बरता का. राष्ट्रमंडल खेलों की विभीषिका केवल आर्थिक अपराध के दायरे की विभीषिका नहीं थी. दिल्ली के शोषित और वंचित तबकों के लिए राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किसी भीषण त्रासदी से कम नहीं था. यह एक ऐसी मानवजन्य सुनामी थी जिसने सैकड़ों और हज़ारों में नहीं वरन लाखों की संख्या में लोगों की जिंदगियां तबाह की. और वह भी इस देश के किसी भूलेबिसरे से दुर्गम्य कोने में नहीं वरन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ दमन के उन्ही वक्तों में तमाम मीडिया चैनल्स लोकतंत्र और राष्ट्र के पहरुआ होने के बड़े बड़े दावे करते फिर रहे थे.

इस विभीषिका का सच दिल दहला देने वाला सच है. और यह सच यह है कि खेलों का आयोजन दिल्ली में रहने वाले शहरी गरीबों के खिलाफ देश की सरकार द्वारा छेड़े गए किसी गृहयुद्ध से कम नहीं था. वैसे तो खेलों के आयोजन की तुलना गृहयुद्ध से करना थोडा अजीब लग सकता है पर यह एक ऐसा सच है जो आंकड़ों से उजागर होता है. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बाहर से आने वाले ‘माननीयों’ के सामने दिल्ली का चमचमाता चेहरा पेश करने के लिए सरकार ने दिल्ली से कमसेकम 2.5 लाख लोगों को बाहर निकाल फेंका था. अब इसकी तुलना श्रीलंका से करें जहाँ तीन दशकों तक चले युद्ध की अंतिम परिणिति तीन लाख लोगों के आतंरिक विस्थापन में हुई थी. श्रीलंका की आबादी कुल मिला के 1 करोड़ है जबकी दिल्ली की 1 करोड़ 30 लाख. यह कहने की जरूरत शायद बाकी नहीं कि आनुपातिक रूप में इन दोनों में कौन सा ज्यादा विध्वंसकारी था.

श्रीलंकाई गृहयुद्ध के अंतिम चरण में वहाँ की सरकार ने नागरिक आवासों पर भारी बमबारी कर उन्ही जमींदोज कर दिया. वहीं राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में लगी दिल्ली सरकार ने कमसेकम 40000 घर (सरकारी भाषा में झुग्गीझोपडियाँ) तोड़कर 2 लाख से ज्यादा लोगों को बेघर कर दिया. मानवाधिकार उल्लंघन के इन उदाहरणों के साथ साथ राष्ट्रमंडल खेलों के कार्यस्थलों पर की गयी आपराधिक लापरवाहियों की वजह से हुई 65 से ज्यादा श्रमिकों की मृत्यु की न्यायिक जांच से दिल्ली सरकार का इनकार श्रीलंकाई सरकार का अपने सैनिकों द्वारा किये गए युद्धअपराधों की निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय जाँच से इनकार करने से कतई अलग नहीं है. अंत में, श्रीलंकाई सेना के निशाने में तमिल अल्पसंख्यक थे, जबकी दिल्ली में शक्तिशाली मध्यवर्ग की आँखों में किरकिरी की तरह चुभने वाले गरीब. यह शायद श्रीलंका के अनुभव से ली गयी प्रेरणा का ही असर था कि राष्ट्रमंडल खेलों के समापन समारोह की सदारत के लिए श्रीलंका के युद्धअपराधी राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को आमंत्रित किया गया था.

यह राष्ट्रमंडल खेलों का वह पहलू है जिसकी जाँच की कोई मांग किसी भी दिशा से नहीं उठी. नैतिकता और राष्ट्रवाद दोनों के अलम्बरदार भारतीय मध्यवर्ग और उसके प्रतिनिधि मीडिया को ना इस पर कोई आपति हुई ना ही उन्होंने इस पर कोई सवाल ही पूछने की जहमत उठाई. आपत्ति होत्ती भी क्यूँ, गरीबों से खाली करायी गयी जमीनों पर महल और कारखाने तो उसी के बनने हैं. इसके उलट, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स जैसे जनपक्षधर संगठनो के खेलों से सम्बंधित गतिविधियों के दौरान हुई श्रमिकों की मृत्यु की सूचना माँगने पर दिल्ली सरकार का सीधा जवाब कि उनके पास कोई ऐसी सूचना नहीं है और इस पर मुख्यधारा की मीडिया की ख़ामोशी सबकुछ साफ़ कर देता है.

इसीलिए लोकतंत्र के पक्ष में खड़े हर नागरिक का दायित्व बनता है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के शोर में राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले की जाँच को दबने से रोकें वरन इन खेलों में हुए भ्रष्टाचार की जाँच के साथसाथ दिल्ली के गरीबों के खिलाफ किये गए युद्धअपराधों की निष्पक्ष जांच की मांग को शामिल करे.

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