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October 01, 2010

बाबरी मस्जिद: इंसाफ के दफ़न के लिए एक मस्जिद की शहादतगाह से बेहतर जगह मिलती भी कहाँ?

बाबरी मस्जिद मामले पे कल इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सुनाने के बाद जो पहला खयाल आया वो ये था की कुछ दफनाने के लिए सबसे मुनासिब जगह कौन सी होगी? क्या कुछ भी कहीं भी दफना सकते हैं? शायद नहीं, क्यूंकि हर समाज आखिरत की रस्मों के लिए ऐसी जगहें ढूँढता है जो पाक हों, पवित्र हों. आखिर को जाने वाले हमारे अपने होते हैं, हमारे अजीज होते हैं.

पर शमशानों और कब्रिस्तानों की पाकीजगी के बाद भी, अगर मरने वाला इन्साफ जैसा कुछ हो तो? क्या ये पाकीजगी इन्साफ को, जम्हूरियत को यहाँ तक की इंसानियत को दफ़नाने के लिए काफी पड़ेगी? शायद नहीं. और इसीलिए, हाई कोर्ट का कल का फैसला कम से कम एक मामले में बिलकुल ठीक है कि इन्साफ को दफ़नाने के लिए बाबरी मस्जिद की शहादतगाह से बेहतर जगह और क्या होती?

आखिर को, १८ बरस पहले बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के बावजूद भगवा आतंकवादी अपने मंसूबों में कामयाब कहाँ हो पाए थे? इक बस ईमारत थी जो वो ढा सके थे, गंगाजमनी तहजीब से लेकर इन्साफ तक सब बचा रह गया था. ये नहीं कि उन्होंने कोशिश नहीं की थी. कोशिश तो खूब की थी, बहुत मेटाडोरों को रथ बना के घुमाया था, बहुत इंटों को रामशिला कहा था, और बहुत लोगों को इंसान से हिन्दू बनाने के कोशिश की थी. यहाँ तक कि दिल्ली कि कुर्सी पर भी काबिज हो ही गए थे एक बार. पर फिर भी इन्साफ और अमन का क़त्ल कहाँ कर पाए थे.

फिर उन्हें गुजरात करना पड़ा था. क्रिया प्रतिक्रिया के नाम पर २००० मुसलमानों का खून करना पड़ा था. वो बहुत मुत्मइन थे कि अब तो उन्हें कोई नहीं नहीं रोक सकता. कि अब तो वो दिल्ली कि गद्दी पे अकेले दम काबिज हो के रहेंगे. उन्हें उनका हिन्दू राष्ट्र का सपना साफ़ साफ़ नजर आने लगा था. जैसे कि किसी जादुई शीशे में उनके आने वाले कल की बहुत खूबसूरत सी तस्वीर हो.

और फिर चुनाव हुए थे. गुजरात छोड़ हिन्दुस्तान के अवाम ने उनको और उनके सपनो को जादुई शीशे से निकाल सच का सामना करा दिया था. हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए दौड़ते उनके अश्वमेधी घोड़ों की लगाम इस अवाम ने यूँ थामी थी कि घोड़ों के साथ उनके सवार भी औंधे मुह गिरे थे. और तब लगा था, कि अभी अमन जिन्दा है और इन्साफ भी. और ये कि इंसानों के इस देश में हिन्दू और मुसलमानों के नाम पे बंटवारे बर्दाश्त नहीं किये जायेंगे.

तब फिर ये उम्मीद भी जागी थी कि इस देश के न्यायालय बाबरी मस्जिद पे जब फैसला देंगे तो इन्साफ के हक में देंगे. वो भगवा आतंकवादी इस उम्मीद से डरते भी बहुत थे. इसीलिए हर तीसरे दिन उनका कोई नेता ये बयां जारी करता था कि ये आस्था का सवाल है और इसपर किसी कोर्ट की कोई राय वो नहीं मानेंगे.

पर वो कहाँ जानते थे कि कोर्ट उनका आधा छूट गया काम पूरा करने वाली है. जानते भी कैसे? माननीय न्यायाधीशों के कोट के नीचे वाला हिन्दू ह्रदय उनको कैसे दिखता. उनको कैसे पता चलता कि जिस रामलला का जन्मस्थान इतिहास भी नहीं जानता वो उसे एक फीट के दायरे तक लाके साबित कर देंगे.

और साबित करने का आधार क्या होगा? ये कि करोड़ों हिन्दुओं की आस्था है, विश्वास है कि रामलला वहीँ पैदा हुए थे.पर ये करोड़ों हिन्दू हैं कौन? कहाँ रहते है? और कोर्ट को उनके यकीन का पता ऐसे साफ़ साफ़ कैसे चल गया? कोर्ट ने कमसेकम हमें तो नहीं बताया कि इन करोड़ों हिन्दुओं ने उनको पोस्टकार्ड भेज के बताया था कि उनका ये यकीन है. अलबत्ता, चुनाव दर चुनाव भाजपा को धता बता के ये तो बताया था कि अयोध्या का मसला हिन्दुओं का नहीं भाजपा का मसला है, चुनाव का मसला है. वोटों की तिजारत का मसला है.

या कोर्ट ने कोई और हिन्दू इजाद कर लिए थे? 'इस सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है/ इसलिए ये लाजमी बनता है/ कि सरकार इस जनता को भंग कर दे/ और अपने लिए कोई और जनता चुन ले// वाले अंदाज में.

और फिर अगर कोर्ट 'हिन्दुओं' के यकीन पे ही चलने वाली है तो और भी बहुत सारे यकीन हैं. जैसे ये खाप पंचातिया यकीन कि गैर जाती में शादी करने वाले हिन्दुओं को क़त्ल कर देना चाहिए. हरयाणा में बहुत सारी पंचायतों ने ये किया भी. और हिन्दुओं की आस्था के चलते किया. अब कोर्ट को उन हत्यारों के खिलाफ सारे मुकदमे वापस ले लेने चाहिए. या ये कि शायद उन्हें 'हिन्दू धर्म गौरव' जैसा कोई पुरस्कार दे देना चाहिए.

बहुत सारे हिन्दुओं(ख़ास तौर पे संघी) का ये भी यकीन है कि कुछ जातियां नीची होती हैं. शायद वक़्त आ गया है कि कोर्ट जातिगत भेदभाव को क़ानूनी बना दे, आखिर करोड़ों हिन्दुओं के 'यकीन' का मामला है. कोर्ट को भारतीय संविधान के जाती-विरोधी प्राविधानों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर देना चाहिए और निर्देश जारी कर देना चाहिए कि जो जातिगत उत्पीडन नहीं करेगा वो सजा का भागी होगा.

और हाँ, कोर्ट को संघियों को ये निर्देश भी दे देना चाहिए कि वो इस मुल्क में बाकी बची सारी मस्जिदें, चर्च, गुरद्वारे, गिरजाघर गिराना शुरू कर दें(यूँ संघियों को किसी निर्देश की जरूरत है नहीं, गुजरात और उड़ीसा में पहले ही बहुत गिरा चुके हैं) जिससे कोर्ट हर गैर-हिन्दू धर्मस्थल का कम से कम तीसरा हिस्सा हिन्दुओं को दे सके. यकीन का मामला जो ठहरा. शुरुआत शायद काशी और मथुरा से कर सकते हैं, वो नारा तो याद ही होगा कि काशी मथुरा बाकी है.

और हाँ, कोर्ट को भारत को संघी आस्थाओं के मुताबिक हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए. आखिर को दुनिया के अकेले हिन्दू राष्ट्र नेपाल के धर्मनिरपेक्ष बनने के बाद एक हिन्दू राष्ट्र की जरूरत भी है.

बहरहाल, इस बीच हम सारे लोगों, जो हिन्दू और मुसलमान नहीं हैं, या हैं भी तो हिन्दुस्तानी होने के बाद हैं, इन्साफ के कफन-दफ़न की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. इन्साफमरहूम इस मुल्क की सबसे अजीम रवायत थे. इस मुल्क की जिन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा. उनके दफ़न के लिया बाबरी मस्जिद की कब्र से बेहतर जगह होती भी तो क्या.

14 comments :

  1. समर, न्यायालय का फैसला तो मुझे भी रास नहीं आया, पर इससे बेहतर फैसला क्या हो सकता था? ये सोचने की बात है.
    बाबरी मस्जिद अगर तोड़ी गयी थी, तो उसके पहले भी वहाँ एक हिंदू धार्मिक स्थल था, ये ए.एस.आई. की जांच से पता चल चुका है.
    मेरे ख्याल से उस जगह को सरकार को अधिगृहीत करके उसे खाली छोड़ देना चाहिए था. जो जगह विवादित हो वहाँ आस्था का प्रश्न कैसा?

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  2. मुक्ति-- पहले तो ये की पुरातत्व विभाग की कोई ऐसी रिपोर्ट नहीं है जो ये साबित कर दे की वहां कोई मंदिर था. पर अगर मान भी लें, तो जरा बताओ इस देश में कितने मंदिर बौद्ध धर्मस्थलों को तोड़ के बने हैं? पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्या वंश के अंतिम बौद्ध राजा बृहद्रथ की हत्या के बाद बौद्धों पे जो कहर तोड़े गए थे वो? अब अगर सारे बौद्ध अपने धर्मस्थल वापस मांगे तो?

    और रही विवाद की बात, तो इस फैसले का एक सीधा मतलब है की हिन्दू धर्मांध आस्था के नाम पे जो भी करें कोई सजा नहीं होगी. और यही सबसे खतरनाक बात है.

    जहाँ बाबरी मस्जिद थी वहां बाबरी मस्जिद बननी चाहिए, न्याय का बस यही मतलब है.

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  3. Samar bhai, ab apako court ke faisale se bhi pareshani hai. tab aap hi batayiye isaka hal(practical solution) kya hai. Aur haan main apake 'bhagwa atankwad' shabd se ittaffak rakhata hoon. What will you say about 'Naksal atankwad'?

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  4. @ Amit-- Amitbhai, court ke faisale se pareshani hai kyunki ye faisla nyay par nahee, panchayati mansikta par adharit hai. Ye case ek title suit tha mere dost, ki ye jagah kiski hai? Court ne baki sab bola hai par ye sawal chhod diya. Kya is faisale ka ye matlab nahi hoga ki aage bhi bhawanaon ke adhar pe agar log mandir/masjid todate rahen to court jagahen bantati rahegi??

    Shayad abhi meri baat thodi ajeeb lag rahee ho par farz karo ki ye faisala Hindustan ki Court me nahi waran Bangladesh ki Court me aaya hota aur mudda masjid nahi Mandir todane ka hota. Tab hamari pratikriya kya hoti? Sawal isiliye Asthaon ka nahi, insaf ka hai.

    Dusri baat, Atankwaad shabd ke sath sabse bada masla ye hai ki ye sirf tab prayog kiya jaa sakta hai jab samooh Nagrik janta (civilian populations) par hamla karne lagen. Bhagwa atankwadiyon ne Gujrat me, orisaa me yahi kiya hai. Atankwaad tab atankwaad nahi hota jab samooh STATE se lad rahe hon. tab wo political movement hota hai.

    Par phir bhee, bahut afsos ke sath ye manunga ki hindustan ke maowadi dhire dhire atankwadi hone kee taraf badh rahe hain. Wo bhee bahut barbar tarike se. Ek mare gaye police officer ka sar kaat dena, ek mar chuke dushman ki lash naa uthane dena, civilian bus uda dena ye atankwaad hai.

    aur isiliye, aaj kee tarikh me Maoiwadi atankwaad jaisa kuchh to ubhar raha hai, par ummed karta hun ki wo phir se rajnaitik disha me laut ayenge.

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  5. शायद इसी तेवर की जरूरत है समर भाई...
    एक बेहतरीन और बेहद मजबूत प्रतिक्रिया के लिए बधाई...

    http://mohallalive.com/2010/10/01/arvind-shesh-react-on-high-court-decision-about-ramjanmbhoomi/

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  6. bahut accha likha samar ji aapne,
    jameen pr malikana hq ke prashn ko adhura hi chhod diya gya , is liye yh faisla politicaly tarkik nhi kaha ja skta.

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  7. aaiye abaroo-e-ganga wo din hai yad tumko ,jab karwa hamara utra tere kinare, us din se aaj tak ham ho gaye tumahare, kaun si khata hai kis bat ki saja hai, har faisla tumahara hamne kabul kar li ,is faisle ki aakhri manjil hamein bate de, jo chain aur sukun se hum apna ghar basa lein, baccho ke sath apne khuch pal khusi mana le.

    kisi ne facebook par paste kar rakha tha.

    aapke purane tarka se asahmat nahin hua ja sakta ki koi aaye kisi ka makan gira de, aur phir kahe ki yeh ghar tumhara hai ya mera is baat ka faisla kanoon karega. upar likhi aapki tamam baaton se sahmat hote huye kahna pad raha hai ki kuch na kuch to hai jo is fiasle ke paksha mein humein kadha karne ke liye aamada kar raha hai aur kuch aisa bhi hai jisse aapki chinta jayez hai.
    baherhal ek aur baat share karna chahta hoon. wo yeh ki babari aur rjb dispute bhadra janon ke do communal groups ka masla raha hai, jise asmita aur pahchan ka sawal banaya gaya. Aur is mein pista rahe hain aam log jinke mohalle mein ek nahin kai masjid hote hain, ek nahin kai shivale hote hain. zara sochiye ki jo vyakti apne 40 baras se bhi adhik aayu ke jivan mein kabhi ghazipur, mau, gorakhpur, azamgarh ya mirzapur se ilaj ke liye hi sahi kabhi banaras jaise nazdik ke shaher tak nahin gaya ho, aakhir woh kyunkar ayodhya jane ke liye unmadit ho jata hai.
    ek nayee baat media ke madhyam se samne aayee hai ki 1992 ke baad ki generation rigid nahin hai, communal nahin hai, aur na jane kya-kya nahin hai. to kya maan liya jaye ki problem generation ka hi hai, cultural nationalism ka nahin. aur agar aisa hai to sach mein hum aur humare jaise bahuton ke liye yeh faisla astha se pahle insaaf ke taqaze ko madde nazar rakhte huye liya gaya ek faisla hai.
    Shesh kushal hai, likhiye, taki tutati huyee samvednaon ke taaron ko jodne ki himaqat jagti rahe.

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  8. Form Dileep Gautam-
    email-dgindian@yahoo.com

    JO Mandir aur masjid banvane ke paksha me hain, main unse kahana chahunga ki hindu mandir chahata hai aur muslin masjid chahata hai to meri bhi ek mang hogi use baudhaa bihar hona chahiye kyunki Babari Masjid ke phaisale me jo jis satabdi se khoj kia gaya tha uske kuchh satabdi pahale jane par baudhaa bihar hone ki pusti hoti hai lekin main chahunga ki wahan koi Hospital ya University bane. Main batana chahunga ki babri masjid ke phaisale jo diye gaye hain, wah bilkul galat hai kyonki koi phaisala dastavej ke adhar par diya jata hai na ki astha ke adhar par. Phaisale ke samaya yah kaha gaya gaya tha ki Ram Lala Mandir hamari dharmik astha ka saval hai isliye Ram mandir ko rakhate huye phaisala sunaya gaya. Jo mulnivasi sathi ram mandir ke paksha me hain kya ve ram mandir me "Ghanta" bhi hila payenge?

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  9. Sreeman .. Sabse pahile Babree masjid kahna band karain .. Ya to Ram mandir kahin athva vivadit asthal ...Jahan per hum pooja kertian aayein hain vahan masjid kyon bane .. kya masjid ke liye koi auir jagah nahi hai .. do you have any specific reason to create masjid there .. Hum to kevel 3 asthano ki baat kertain hain . ... Agar baudh apane purne dharmink asthal nahi maang rahein hain to hum bhi hummarte sare purane dharmik asthal ( including taj mahal, Jama masjid ) nahi maang rahein hain ..ye to vaisein hi hai jaise bhaiya nahi bahan ka gharouda tod diya .... aur bahan ro ke shikayat bhi na karin ....

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  10. bas karte reho hindu muslim,,,, main sahi tu galat,,

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  11. समर भाई हक़ और तथाकथित इन्साफ के ऊपर लाजवाब सवाल के रूप में ये लेख हमेशा याद किया जायेगा/
    और उन आस्थाओं को भी जिसे कोई नहीं जानता/

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  12. समर भाई मैंने आपका ये लेख पढ़ा बहूत ही खुबसूरत है .

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  13. समर भाई मैने आपका ये लेख पढ़ा ,बहूत अच्छा लगा .मेरा अभिवादन स्वीकार करें .

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  14. समर भैया बढिया लिखा है...

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