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October 26, 2010

सौभाग्यमयी गुलामी के महान स्मृतिपर्व की कीमत


[जनसत्ता में २६ अक्टूबर २०१० को स्मृति पर्व के दंश शीर्षक से प्रकाशित.]

मुस्कराहटें अनमोल होती हैं. ख़ासतौर पर वैसी, जैसी राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के बाद दिल्ली के हुक्मरानों के चेहरे पर खिली हैं. वैसे उनके चेहरों से छलक पड़ती खुशी बिलकुल वाजिब है. आखिर को टूटते घरों, ढहते पुलों, अधूरी तैयारियों के बीच खेलों का सफल आयोजन कर उन्होंने राष्ट्र का गौरव पुनर्स्थापित किया है. क्या यह किसी चमत्कार से कम है? और गौरव भी तो उनके सामने स्थापित करना था जो आज भी हमें मदारियों, संपेरों और जादूगरों से ज्यादा कुछ नहीं समझते और जिनके देशों में आज भी हमारे ऊपर नस्ली हमले होते रहते हैं.

तो बस, हुक्मरानों ने पानी की तरह पैसा बहाया और राष्ट्रगौरव बहाल किया. क्या हुआ कि उनकी मुस्कुराहटों पर खरबों खर्च हो गए. राष्ट्रसम्मान की कुछ तो कीमत होती है. हाँ, इन खेलों के सफलतम के साथ भ्रष्टतम भी होने की खबरों ने इस ख़ुशी को जरा कम कर दिया. मध्वर्गीय नैतिकता इन खबरों से इतना आहत हुई की खबरी चैनलों से लेकर अखबार तक भ्रष्टाचार की जाँच की मांग करने लगे और आखिर में सरकार को हामी भरनी ही पडी. ये एक अच्छी खबर थी(बशर्ते यह जांच किसी नतीजे पर पंहुचे और दोषियों को सजा मिले.)

पर इस खबर का एक दूसरा पहलू भी है. हमारी संवेदनाओं के भोंथरे होते जाने का पहलू. एक कड़वा सच कि बाजार कैसे हमारे अन्दर की इंसानियत को ख़तम कर रहा है. वह भी इतने सलीके से कि हमें पता भी नहीं चलता कि हम कब ऐसी मशीन बन जाते हैं जिसे पैसे के अलावा कुछ नहीं दिखता. संवेदनाएं बची होतीं तो हमें नजर आता कि राष्ट्रमंडल खेलों की कीमत सिर्फ पैसों में नहीं लगी है. इन खेलों के आयोजन की कीमत, रोजगार छिनने से लेकर जान जाने तक, इस शहर के गरीबों से वसूली गयी है.

रेहड़ीपटरी मजदूरों के राष्ट्रीय संगठन 'नेशनल अलायंस ऑफ़ स्ट्रीट वेंडर्स ऑफ़ इंडिया' ( (नासवी) के अध्ययन के मुताबिक विदेशी आँखों से दिल्ली की 'बदसूरत' तस्वीर छिपाने के लिए एक लाख रेहड़ीपटरी कामगारों को जबरिया दिल्ली से बाहर निकाल दिया गया. नासवी के अध्यक्ष अरविन्द सिंह के मुताबिक अगर इसमें अन्य अतिगरीबों को जोड़ लिया जाय तो यह संख्या २.७५ लाख पंहुच जाती है.
दिल्ली से जबरन निकाल दिए गए ये लोग जीतेजागते लोग थे. ये हमारी तरह इसी देश के नागरिक हैं. भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त कहीं भी बसने का अधिकार इनका भी उतना ही है जितना 'माननीयों' का. फिर भी जिनके घर (सरकारी भाषा में झुग्गी-झोपड़ियाँ) बेमुरव्वती से तोड़ दिए गए जबकी रईसों के अनिधकृत कब्जे वाली सैनिक फार्म्स जैसी रिहायशें लोकतंत्र को मुह चिढाती यूँ ही खड़ी हैं.

पर फिर भी यह लोग किसी संवेदना का हिस्सा नहीं बने. भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ रही तमाम आवाज़ों में इनके लिए न्याय की मांगे शामिल नहीं हुईं. १० दिन के खेलों के लिए बेघर कर दिए गए इन लोगों के संख्या २ लाख के ऊपर है. फिर से, यह संख्या भी सिर्फ आंकड़ा नहीं है. ये घर इंसानी रिश्तों की गर्माहट से भरे और घरों से अलग नहीं थे. इनमे भी बेटे को बड़ा साहब बनाने के सपने देखती हुई माँ की ऑंखें थी, और गली में क्रिकेट खेलते हुए एक दिन सचिन बनने के ख्वाब थे. अमीर घरों से इन घरों का एक और रिश्ता था . घरेलू काम करने वाली बाई, ड्राइवर, सिक्यूरिटी गार्ड, यानी की 'माननीयों' को अपने सपनों के पीछे भागने का समय और सहूलियत देने वाले लोग ज्यादातर इन्ही घरों से आते हैं. और फिर भी, इन घरों के टूटने पर किसी के मन में कुछ नहीं टूटा, कुछ नहीं बिखरा.

अब इनमे उन लगभग एक लाख मजदूरों को जोड़िये जिनसे लगभग यातानाशिविर की स्थितियों में काम करवाया गया और नासवी के मुताबिक न्यूनतम वेतन के आधे से भी कम भुगतान किया गया. यह भी, की खेलों से जुड़े कार्यस्थलों पर हुई कमसेकम ६५ श्रमिकों की मौत मे किसी एक पर भी जाँच नहीं की गयी. बात बात पर आहत हो जाने वाली मध्यवर्गीय नैतिकता इस मुहिम के लिए सरकार द्वारा दमनकारी पुलिसबल के भारी उपयोग पर आहत नहीं हुई. इस पर भी नहीं कि दक्षिणी दिल्ली के सरोजनीनगर बाजार को रेहड़ीपटरी वालों से खाली करने की मुहीम के दौरान गिरफ्तार किये गए ओमप्रकाश आर्य की पुलिस हिरासत में दी गयी यातनाओं को सह न पाने की वजह से आये हृदयाघात से मृत्यु हो गयी और तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद इस मामले में कोई ऍफ़आईआर तक दर्ज नहीं की गयी.

आखिर को राष्ट्र के सम्मान का मामला था. और सम्मान के लिए बलिदान तो देने ही पड़ते हैं. अब क्या करें की बलि सिर्फ गरीबों की चढ़ती. हमारी तो पुरानी परंपरा भी है. पुल बनाने से पहले नरबली देने की. अंग्रेज बहादुर तक निभाते थे. उनके राज और अपनी सौभाग्यमयी गुलामी के इस महान स्मृतिपर्व पर हम इससे बेहतर और करते भी क्या?

October 17, 2010

A War Criminal concluding the Commonwealth Games is the best it could go!

Published in Sri Lanka Guardian-- Can be accessed at--
http://www.srilankaguardian.org/2010/10/war-criminal-concluding-cwg-is-best-it.html

[First published by the Asian Human Rights Commission.]

Mahinda Rajapaksa, President of Sri Lanka was the guest of honour at the closing ceremony of the Commonwealth Games 2010, New Delhi. He presided over the extravagant ceremony that would declare the arrival of India on the big stage, conclusively.

Presiding over something is nothing new for the President. He has presided over the last leg of the decades long civil war leading to the final victory of the Sri Lankan state over the rebels. In doing that, he has presided over countless cases of extrajudicial killings, of torture, of illegal abductions and of course disappearances. It goes without saying that the victims were almost all civilians, trying to run away from equally barbarous rebels - the Liberation Tigers of Tamil Eelam (LTTE).

The Organising Committee (OC) of the Commonwealth Games 2010(CWG), duly supported by the provincial and central levels, has presided over a similar exercise in quality even if not in degree. Forced to work and live under the most inhuman conditions, more than 60 workers have died at CWG worksites, a number not really incomparable to the Sri Lankan war if one looks at the numbers involved.

The war in Sri Lanka was fought on enormous costs, all of that unaudited, unaccounted. There have been reports that part of the money to wage the war came from the humanitarian relief the Sri Lankan government received from international agencies and governments.

CWG, the biggest games till date, have proved to be the costliest and most corrupt. The cost of the games has turned out to be 114 times higher than the original estimates, spending more than 7 billion USD. All in the name of 'national pride' in a country that does not feel ashamed of ranking 67th in the global hunger index released by the International Food Policy Research Institute. Think of the fact that the total budgetary allocation for the Integrated Child Development Services (ICDS) is a mere INR 8,700 crore, a pittance as compared to the games.

Much before entering the last leg, the Civil War in Sri Lanka has resulted into the deaths of hundred thousand civilians. A decade before it got over, Sri Lanka earned the unenviable distinction of being second, next only to Iraq in the number of 'disappearances'(a euphemism for forcible abductions, torture and killing of civilian and combatants alike) according to the United Nations Working Group on Enforced or Involuntary Disappearances in 1999. A decade before that, it has had some 3000 people killed extrajudicially in just one district named Amparai.

Half a decade before that, around 10,000 to 60,000 (depending on contradictory estimates) Sinhalese, the majority ethnic group, had been butchered in the name of suppressing the Marxists revolutionary movement by the Janatha Vimukthi Peramuna (JVP).

Not one of these atrocities has been investigated into impartially. The perpetrators, instead of being brought to justice, have been rewarded by regimes after regimes. In the face of the JVP's insurgency followed by the civil war, justifications were not hard to come by. People kept seeing their rights getting trampled over by the state and the rebels alike.

Not a single death at CWG worksites has been investigated into either. The OC, the governments, the quasi-governmental human rights watchdogs, went beyond remaining quiet and actively tried to push the deaths under the carpet.

National pride comes at a price after all. So what if this price is always paid by the most vulnerable and not by the rich. It's just that, a chance encounter.

Barbarism, brutality and the utter disregard for life and dignity has become a 'normal' part of the life of ordinary Sri Lankans. In a much distorted sense of the word, ordinary Sri Lankans had learnt to live with all this. They believed that life could not get worse, that their country had reached the limits already.

Presiding over the deadliest phase of the war, Rajapaksa proved them wrong. The last two weeks of the war alone have resulted into deaths of 7000 civilians as per UN estimates. Other sources like The Times newspaper had put the figures at 20,000, adding that almost all of them were caused by the Sri Lankan army.

The Sri Lankan army resorted to shelling on civilian targets and arrested those who were trying to flee from the LTTE. It fired at civilians without warning, 'suspecting' them of being rebels or 'their' sympathisers. According to human rights organisations, it detained more than 10,000 civilians. Most seriously, it fired even on surrendering LTTE rebels. At the time of victory, Sri Lanka had 300,000 Tamils as Internally Displaced Persons(IDPs) living in the most inhuman conditions in rehabilitation camps in their own country.

The games, too, have resulted in serious violations of the human rights of the poor. In order to present a clean, shining face of Delhi (and India by implication) to the world, the government resorted to forced evictions of street vendors and closed down shelter homes. It demolished thousands of homes (tersely called slums in the official language) rendering a minimum of 2,00,000 people homeless. It chased street vendors out of the city and thus ensured the loss of livelihood opportunities for workers belonging to informal sectors like rag-pickers affecting a minimum of 300000 'citizens' of India.

Sri Lanka, a country of 20 million people chased 300,000 of its citizens out of their homes to win a war. Delhi, a city of 13 million, rendered 200,000 of its citizens homeless to salvage 'national pride'.

Rajapaksa led the war with complete control. The proof for his direct involvement in extrajudicial killings came from none other than General Sarath Fonseka, his commander in chief. He said, much before his arrest and consequent conviction for 'treason' that the orders to execute surrendering Tamil Tiger leaders in the final days of the war had come directly from the defence secretary, Gotabaya Rajapaksa, the brother of the President. The claim was further substantiated by the fact that the general retracted his claim later and asserted that he had 'mis-spoken'.

The world has been asking for an impartial enquiry into the alleged human rights violations and the infringement of Geneva conventions. The UN secretary general has appointed a special panel to advise him on "accountability issues" regarding the alleged war crimes committed by both the government troops and the LTTE. The President kept doggedly refusing to hold any impartial enquiry, while appointing his own commission to hoodwink the international community. Does one need more proof for his complicity?

The war has brought an end to the armed hostilities. It has given rise to the hopes of reconciliation between communities, of the possibilities of rebuilding the nation. The only way to that reconciliation was restoring justice and rule of law to the island nation. It required the government to assuage the feelings of Tamils who had survived so much of loss, both human and material. It required the state to prosecute the perpetrators of war crimes.

The president responded to all this by celebrating the first anniversary of LTTE's defeat in the most triumphalist tones, indeed almost humiliating the Tamils. The parade and the fanfare on the day was greater than that of Independence Day celebrations of Sri Lanka. Worse, this was nothing strange given the fact that Rajpaksa's government has started celebrating the day of collapse of JVP's insurgency as the day of "national victory", think whatever of almost 30000 innocent ones that perished to the bullets of the government.

The government of India too did the same. Instead of instituting impartial inquiries into the criminal negligence causing the death of the workers to the massive corruption by the OC, it decided to bail out the officials employing even the army to clear the mess. The political leadership of the country issued impassioned appeals to the citizenry to ensure the national pride remains intact. It was a macabre dance of patriotism, not very different from one in Sri Lanka.

It was not for nothing that the OC was compelled to issue a denial that it was advising staff to ignore one of its major founding principles - to protect human rights. It should have, in the same statement, also repented the fact that it had suspended Pakistan from the membership of Commonwealth in November 2007 on similar grounds. However bad it could be, after all, Pakistan's record in ensuring human rights would certainly not be worse than Sri Lanka.

Maybe the preparation for the games and the most serious violations of the rights of the urban poor in India were a dry run for the upcoming 'projects' of the Indian state to enhance national 'pride'. Maybe India has decided to learn a few lessons from President Rajapaksa. He is presiding over the dismantling of democracy in Sri Lanka. Maybe India is looking forward to the Rajapaksin solution for Kashmir and the North East.

It has got the best teacher available then. Welcome Mr Rajapaksa!

October 14, 2010

What better place than the grave of a mosque could a 'secular democracy' find to bury justice?

[Published as an essay in 'Making Sense of Ayodhya Verdict:Towards Efforts for Peaceful Solution' edited by Asghar Ali Engineer & Ram Puniyani. First Published By the Asian Human Rights Commission. Republished in the Milli Gazette and the Counter Currents.]

Numbness was the first response to the verdict on Ayodhya dispute. Everything and everyone went numb. And then, an eerie silence settled in the room where we were anxiously watching the live streaming of Indian news channels, 5000 miles away from India. We were 6, four Sri Lankans and 2 Indians.

It is like one of many judgments by Sarath N. Silva, said Basil Fernando, a reputed Sri Lankan crusader for human rights and rule of law. He was referring to many controversial and unjust decisions delivered by Silva as Chief Justice of Sri Lanka. Listening to the sadness pervading his voice, I remembered his recent article where he has referred to another recent decision of Sri Lankan Supreme Court as 'death of democracy'.

Numbness slowly gave way to an animated debate on the merits (rather, lack of them) of the decision. I was, however, far away from that debate and my thoughts were taken over by this haunting idea of ‘death of democracy’. Is this the beginning of the end? Is it the death of democracy? Or is it that of justice?

Thinking of death dragged me to another creepy domain of burial. Can we bury anything anywhere was the question that preoccupied me now. No, a definitive no, was the answer then that presented itself to me. All societies look for the most sacred placed for burial grounds as a matter of fact. After all, one does not belong to a land if s/he does not have someone buried under the ground, said Márquez in One Hundred Years of Solitude. Death gives one memories, the basic prerequisite for the sense of belonging. For this reason, burial grounds have not only been sacrosanct but most sacrosanct of the lands.

But then, what if the death is of Justice itself? Which cemeteries would be sacred enough to bury justice? None of the regular ones, I am sure. The country would need a new one for that.

The verdict of Allahabad High Court has not let us down in that. After all, what better place than the grave of a martyred mosque could the judiciary of a secular democracy have found to bury justice?

The verdict has ensured the completion of the saffron project, a project which saffron terrorists have miserably failed to achieve for last 18 years. All they could achieve then was demolishing an old building and nothing more. Everything else, from the cultural harmony called as 'gangajamani tahjeeb’'to justice, remained intact. Not that, they did not try. They tried their best. They converted matadors into some strange things and called them chariots. They got many people making bricks and called these bricks 'ramshilas'. Then they took these chariots and bricks on a tour of India leaving a trail of blood behind.

Nothing of this was strange though. What else can one expect from those who sow ‘branches’ instead of ‘trees’ as one Hindi writer has put it long ago?

They also tried to convert men, ordinary men, into Hindus and somewhat succeeded as well. They could fulfil one of their dreams of occupying power in Delhi.

Even while shedding crocodile tears about abdication of the duties of a king(rajdharm) by their chief minister in Gujarat, they were supervising butchering of 2000 Muslims, some still in wombs, literally. They were convinced that they were unstoppable. In their delusions they were assuring each other of the imminent takeover of Delhi on their own, without the crutches and constraints of a coalition.

They could see their ‘Hindu rashtra’ taking shape in the delusional magic mirrors they carried in secret. They could hardly conceal their smiles, proverbial smiles of the murderers.

Then came the elections. They found their dreams shattered, and their hopes smashed by the country barring Gujarat. The people of the country held the horses running for building a Hindu nation by their reins, stopping the chariots in the middle of its track. Their bricks left stacked in one obscure corner of Ayodhya, unused. They brought both the horses and the riders down and reaffirmed that we are a living nation with firm belief in our core values.

Justice and peace, both, have survived the frontal onslaught. The electoral demise of saffron fanatics has reassured the people that the courts would stand by the high ideals of justice. That whenever a verdict would come, it would be just and honest. The saffron terrorists have feared this predicament too. So, one used to have one or the other of their folks threatening the nation every other day. They used to shout at the height of their lungs that they would not listen to any courts on this issue of 'faith'.

How could they know that the court was going to complete their unfinished agenda? How could they see the Hindu heart tucked safely behind their black courts? How could they know that the judges would be able to determine the birth place of lord Ram with the precision of square feet? They could not even suspect that the judges would be able to create a juridical person out of someone who is not even a 'historical person'. They never knew that all their fears were unfounded and that the judiciary would be complicit with them. Even in the wildest of their dreams they could not have imagined that the verdict would prove to be a classic case of infusing myths with new and distorted meanings.

Intriguingly enough 'evidence' used by the judges to reach the conclusion was far more interesting than the actual decree. In basing their judgment on the ‘faith and belief’ of millions of Hindus, the judiciary has trumped even the most ardent of Hindu fanatics. What the judges did not tell, however, was the question that how they came to know of this ‘faith and belief’ with this conclusive conviction? Who are these Hindus? Where do they live? Did they send post cards to the judges telling them about their faith and belief? Or, did the courts organise some sort of referendum or even opinion poll? We did not get to know any of them. Though we kept seeing the Bhartiya Janata party, and its saffron agenda, getting rejected by millions of Hindus elections after elections.

The only possible inference that could be drawn from these elections was exact opposite of what the judges did. The election results symbolised the rejection of the sectarian agenda of the party and its tall claims of being representative of the Hindus. They proved that the saffron brigade raked this issue time and again for votes and nothing else and failed tremendously in that.

Has the court invented some different Hindus? In the Brechtian lingua franca, he spells out beautifully in one of his poems “The people have lost the confidence of the government; the government has decided to dissolve the people and to appoint another one”. Did the court really find some new Hindus whom none else could have found till now?

And if the judges were to follow Hindu beliefs only, how could they decide to pick and choose just this one? There are many other beliefs shared by millions of Hindus, like the one amply demonstrated by the kangaroo courts of Haryana called 'khap panchayats'. The belief that marrying out of one's own caste is a 'criminal' act and deserves no punishment less than a brutal barbaric killing! Maybe the court should withdraw all the cases against those who killed couples while upholding this 'belief' and faith of Hindus. It should even institute some award like ‘pride of the Hindus’ and confer it upon those killers.

The court should also legitimise caste based discrimination as it emanates out of one of the oldest 'beliefs' of Hindus and is sanctioned by Hindu scriptures. After all, the Hindus believing in caste should definitely outnumber those believing in Ram temple and so this action would serve the cause of the Allahabad High Court model of justice more than anything else. The court should also direct the government of India to scrap all anti-caste provisions of the Indian constitution and make not believing in caste a ‘criminal offence’.

The court should direct the saffron brigade to start demolishing rest of the places of worship belonging to the minority religions (not that they need any such directive! They have already burnt/demolished many of the churches in Odisha and Gujarat). This would help the courts being able to give at least a third of all these lands to Hindus. After all, it’s a question of belief of millions of Hindus, nothing less. The court could very well begin with Kashi and Mathura, the remaining two on the main agenda of the RSS, BJP and their hydra- headed monsters.

The court can also direct the Government of India to initiate the process of declaring India as a Hindu state, even if there is no sizable section of Hindus in India demanding this. But then, there was no sizable voice of Hindus believing in Ram janmbhhomi either! And maybe, the world needs a ‘Hindu Rashtra' especially after the demise of Nepal as one!

Meanwhile, all of us who are not Hindus or Muslims, but citizens first, should start the process of giving a tearful burial to the idea of justice. Justice and democracy was the most defining characteristics of our nation. All our claims of being the biggest democracy of the world, and being the only one in the region not to collapse in military dictatorships were based on that premise. The proud claims of being a 5000 year old civilisation rested on that very idea as well. Sad that the justice is no more, but then what better place than the grave of a mosque we could have got to bury it in this secular democracy? The grave of a mosque demolished by criminals in saffron on top of that!

October 08, 2010

मेरे घर के रास्ते में क्यूँ पड़ता है राम का घर!

बहुत पहले लिखी थी ये कविता. १९९६ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के कुछ ही समय बाद. मैं घर आ रहा था और मेरा घर अयोध्या से सिर्फ २८ किलोमीटर दूर है.

फैजाबाद पंहुचा तो पता चला कि अयोध्या 'सील' हो गयी थी. और शहरों(वस्तुतः कस्बों से)से अलग है अयोध्या. कर्फ्यू कम ही लगता हैं यहाँ, वजह साफ़ कि अन्दर के बाशिंदे ज्यादातर भले लोग है.इतिहास गवाह है कि अयोध्या फैजाबाद नामक जुड़वाँ शहरों में १९९२ के पहले कभी कोई दंगा नहीं हुआ. बाद में भी सिर्फ एक, और वह भी बाहर से आये 'कारसेवकों' ने किया.

तो कर्फ्यू की जरूरत पड़ती नहीं यहाँ तो बस शहर 'सील'हो जाता है. सारी सीमायें बंद. कोई गाडी कोई व्यक्ति इधर से उधर नहीं जायेगा. और ये 'बाहरी' लोग नहीं आयेंगे तो अमन चैन सलामत रहेगा. साल तो नहीं याद पर सावन मेले का समय था जब फंसा था उस बरस. आखिरी २८ किलोमीटर के लिए दो दिन फैजाबाद में इन्तेजार करने के बाद इलाहाबाद लौट गया था. इतना दुखी था कि रास्ते में ननिहाल पड़ता है, सुल्तानपुर, वहां भी नहीं रुका.

वापसी की उसी ट्रेन यात्रा में लिखी हुई कविता थी ये. आज याद आयी तो लगा कि आस्थाओं से लबालब इस निर्मम समय से इस कविता को भी जूझना चाहिए.


क्षमा करना माँ
कभी नहीं लगे तुम्हारे राम
श्रद्धा के काबिल..
तुम व्रत रख रख के दोहरी होती रही
हम बच्चों के लिए..
परिवार के लिए..
और मैं देखता रहा था तुम्हे
हंसने और रोने के बीच की किसी जगह से..
चाहा कई बार
कि बताऊँ तुम्हे
कितने निरर्थक हैं
तुम्हारे सारे उपवास..
क्या असीसेगा तुम्हारी इच्छाओं को
तुम्हारे सपनों को
वो
जो नहीं दे सका स्नेह अपनी पत्नी को
पर फिर लगा माँ
कि तुम माँ हो.
राम को दूँ या ना दूँ
तुम्हारा सम्मान परे है
किसी भी प्रश्न से!

नहीं पूछा फिर ये सवाल
कभी
कि क्यूँ इतनी श्रद्धा है तुम्हे राम में
माँ?
पर फिर एक दिन याद आया
माँ
कि प्रश्नों के परे तुम हो
तुम्हारा सम्मान है..
राम नहीं.
तो माँ
आज कहने दो
कि कभी नहीं लगे
तुम्हारे राम श्रद्धा के काबिल..
यूँ तो सीता की अग्नि परीक्षा
से
शम्बूक वध तक
ढेरों कारण हो सकते थे
हैं
पर माँ
राम से नफ़रत की मेरी वजह
बहुत छोटी थी.
कि मैं इलाहाबाद में पढता था
राम अयोध्या में रहते थे..
और अयोध्या मेरे घर के रास्ते में..
सिर्फ २८ किलोमीटर दूर बाकी रह जाता था घर
माँ
राम के इस घर से
पर कितनी बार
कितनी तो बार
जब भी मुझे आना होता था अपने घर
तुम्हारे पास
अपने पास
राम का ये घर
अड़ जाता था मेरे घर के रास्ते
अपनी तमाम बंदूकों
संगीनों
और वर्दियों के साथ!

October 01, 2010

बाबरी मस्जिद: इंसाफ के दफ़न के लिए एक मस्जिद की शहादतगाह से बेहतर जगह मिलती भी कहाँ?

बाबरी मस्जिद मामले पे कल इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सुनाने के बाद जो पहला खयाल आया वो ये था की कुछ दफनाने के लिए सबसे मुनासिब जगह कौन सी होगी? क्या कुछ भी कहीं भी दफना सकते हैं? शायद नहीं, क्यूंकि हर समाज आखिरत की रस्मों के लिए ऐसी जगहें ढूँढता है जो पाक हों, पवित्र हों. आखिर को जाने वाले हमारे अपने होते हैं, हमारे अजीज होते हैं.

पर शमशानों और कब्रिस्तानों की पाकीजगी के बाद भी, अगर मरने वाला इन्साफ जैसा कुछ हो तो? क्या ये पाकीजगी इन्साफ को, जम्हूरियत को यहाँ तक की इंसानियत को दफ़नाने के लिए काफी पड़ेगी? शायद नहीं. और इसीलिए, हाई कोर्ट का कल का फैसला कम से कम एक मामले में बिलकुल ठीक है कि इन्साफ को दफ़नाने के लिए बाबरी मस्जिद की शहादतगाह से बेहतर जगह और क्या होती?

आखिर को, १८ बरस पहले बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के बावजूद भगवा आतंकवादी अपने मंसूबों में कामयाब कहाँ हो पाए थे? इक बस ईमारत थी जो वो ढा सके थे, गंगाजमनी तहजीब से लेकर इन्साफ तक सब बचा रह गया था. ये नहीं कि उन्होंने कोशिश नहीं की थी. कोशिश तो खूब की थी, बहुत मेटाडोरों को रथ बना के घुमाया था, बहुत इंटों को रामशिला कहा था, और बहुत लोगों को इंसान से हिन्दू बनाने के कोशिश की थी. यहाँ तक कि दिल्ली कि कुर्सी पर भी काबिज हो ही गए थे एक बार. पर फिर भी इन्साफ और अमन का क़त्ल कहाँ कर पाए थे.

फिर उन्हें गुजरात करना पड़ा था. क्रिया प्रतिक्रिया के नाम पर २००० मुसलमानों का खून करना पड़ा था. वो बहुत मुत्मइन थे कि अब तो उन्हें कोई नहीं नहीं रोक सकता. कि अब तो वो दिल्ली कि गद्दी पे अकेले दम काबिज हो के रहेंगे. उन्हें उनका हिन्दू राष्ट्र का सपना साफ़ साफ़ नजर आने लगा था. जैसे कि किसी जादुई शीशे में उनके आने वाले कल की बहुत खूबसूरत सी तस्वीर हो.

और फिर चुनाव हुए थे. गुजरात छोड़ हिन्दुस्तान के अवाम ने उनको और उनके सपनो को जादुई शीशे से निकाल सच का सामना करा दिया था. हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए दौड़ते उनके अश्वमेधी घोड़ों की लगाम इस अवाम ने यूँ थामी थी कि घोड़ों के साथ उनके सवार भी औंधे मुह गिरे थे. और तब लगा था, कि अभी अमन जिन्दा है और इन्साफ भी. और ये कि इंसानों के इस देश में हिन्दू और मुसलमानों के नाम पे बंटवारे बर्दाश्त नहीं किये जायेंगे.

तब फिर ये उम्मीद भी जागी थी कि इस देश के न्यायालय बाबरी मस्जिद पे जब फैसला देंगे तो इन्साफ के हक में देंगे. वो भगवा आतंकवादी इस उम्मीद से डरते भी बहुत थे. इसीलिए हर तीसरे दिन उनका कोई नेता ये बयां जारी करता था कि ये आस्था का सवाल है और इसपर किसी कोर्ट की कोई राय वो नहीं मानेंगे.

पर वो कहाँ जानते थे कि कोर्ट उनका आधा छूट गया काम पूरा करने वाली है. जानते भी कैसे? माननीय न्यायाधीशों के कोट के नीचे वाला हिन्दू ह्रदय उनको कैसे दिखता. उनको कैसे पता चलता कि जिस रामलला का जन्मस्थान इतिहास भी नहीं जानता वो उसे एक फीट के दायरे तक लाके साबित कर देंगे.

और साबित करने का आधार क्या होगा? ये कि करोड़ों हिन्दुओं की आस्था है, विश्वास है कि रामलला वहीँ पैदा हुए थे.पर ये करोड़ों हिन्दू हैं कौन? कहाँ रहते है? और कोर्ट को उनके यकीन का पता ऐसे साफ़ साफ़ कैसे चल गया? कोर्ट ने कमसेकम हमें तो नहीं बताया कि इन करोड़ों हिन्दुओं ने उनको पोस्टकार्ड भेज के बताया था कि उनका ये यकीन है. अलबत्ता, चुनाव दर चुनाव भाजपा को धता बता के ये तो बताया था कि अयोध्या का मसला हिन्दुओं का नहीं भाजपा का मसला है, चुनाव का मसला है. वोटों की तिजारत का मसला है.

या कोर्ट ने कोई और हिन्दू इजाद कर लिए थे? 'इस सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है/ इसलिए ये लाजमी बनता है/ कि सरकार इस जनता को भंग कर दे/ और अपने लिए कोई और जनता चुन ले// वाले अंदाज में.

और फिर अगर कोर्ट 'हिन्दुओं' के यकीन पे ही चलने वाली है तो और भी बहुत सारे यकीन हैं. जैसे ये खाप पंचातिया यकीन कि गैर जाती में शादी करने वाले हिन्दुओं को क़त्ल कर देना चाहिए. हरयाणा में बहुत सारी पंचायतों ने ये किया भी. और हिन्दुओं की आस्था के चलते किया. अब कोर्ट को उन हत्यारों के खिलाफ सारे मुकदमे वापस ले लेने चाहिए. या ये कि शायद उन्हें 'हिन्दू धर्म गौरव' जैसा कोई पुरस्कार दे देना चाहिए.

बहुत सारे हिन्दुओं(ख़ास तौर पे संघी) का ये भी यकीन है कि कुछ जातियां नीची होती हैं. शायद वक़्त आ गया है कि कोर्ट जातिगत भेदभाव को क़ानूनी बना दे, आखिर करोड़ों हिन्दुओं के 'यकीन' का मामला है. कोर्ट को भारतीय संविधान के जाती-विरोधी प्राविधानों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर देना चाहिए और निर्देश जारी कर देना चाहिए कि जो जातिगत उत्पीडन नहीं करेगा वो सजा का भागी होगा.

और हाँ, कोर्ट को संघियों को ये निर्देश भी दे देना चाहिए कि वो इस मुल्क में बाकी बची सारी मस्जिदें, चर्च, गुरद्वारे, गिरजाघर गिराना शुरू कर दें(यूँ संघियों को किसी निर्देश की जरूरत है नहीं, गुजरात और उड़ीसा में पहले ही बहुत गिरा चुके हैं) जिससे कोर्ट हर गैर-हिन्दू धर्मस्थल का कम से कम तीसरा हिस्सा हिन्दुओं को दे सके. यकीन का मामला जो ठहरा. शुरुआत शायद काशी और मथुरा से कर सकते हैं, वो नारा तो याद ही होगा कि काशी मथुरा बाकी है.

और हाँ, कोर्ट को भारत को संघी आस्थाओं के मुताबिक हिन्दू राष्ट्र घोषित कर देना चाहिए. आखिर को दुनिया के अकेले हिन्दू राष्ट्र नेपाल के धर्मनिरपेक्ष बनने के बाद एक हिन्दू राष्ट्र की जरूरत भी है.

बहरहाल, इस बीच हम सारे लोगों, जो हिन्दू और मुसलमान नहीं हैं, या हैं भी तो हिन्दुस्तानी होने के बाद हैं, इन्साफ के कफन-दफ़न की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. इन्साफमरहूम इस मुल्क की सबसे अजीम रवायत थे. इस मुल्क की जिन्दगी का सबसे अहम् हिस्सा. उनके दफ़न के लिया बाबरी मस्जिद की कब्र से बेहतर जगह होती भी तो क्या.