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September 13, 2010

लक्स कोज़ी का प्रचार करते हुए आप बिलकुल अच्छे नहीं लगते शाहरुख़ भाई !

प्रिय शाहरुख़..

सबसे पहले तो एक माफीनामा.. कि आपको बिना जाती जानपहचान के शाहरुख़ कह रहा हूँ पर उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगे. आखिर को मैं हिन्दुस्तान की उस पीढ़ी का हूँ जो आपकी फ़िल्में देखते हुए जवान हुई है और जिसने आपमें अपने आपे को देखा है. और उससे भी ऊपर मैं उस पीढ़ी के उन लोगों में से हूँ जिन्होंने किसी के ये कहने पे कि इंडस्ट्री में आपसे अच्छा कोई और स्टार है और लोगों से झगड़े किये हैं. शाहरुख साहब मैं उनलोगों में से हूँ जिनके लिए इंडस्ट्री का सुपर स्टार कौन है ये कोई बहस ही नहीं थी. जिनके लिए अमिताभ बच्चन के बाद बस आप ही आप थे.

मैं उस पीढ़ी का हूँ शाहरुख़ साहब जो बड़े बड़े शहरों में ऐसी छोटी छोटी बातें होती रहतीं हैं सैनेरीटा बोलते हुए ये भूल ही जाती थी कि ये अपना खुद का नहीं आपका डायलोग है. और इसीलिये, इस पीढ़ी का होने के नाते मैं आपपे इतना हक समझता हूँ कि आपको शाहरुख़ कह सकूँ. सच बोलूं तो ये लिखते हुए भी कैशोर्य के उन दिनों की याद आती है तो ऑंखें चमक उठती हैं..

एक और जो बात थी, या की है, जो आपसे जोड़ के रखती थी है और शायद रहेगी, की आपने अपनी जड़ें ना कभी भूलीं ना खोयीं. कि सर्कस या फौजी का शाहरुख़ दिल तो पागल है के शाहरुख से कभी अलग ना हुआ ना दिखा. इसीलिये आपकी कामयाबी सिर्फ आपकी कामयाबी नहीं थी शाहरुख़ साहब. वो हर उस शख्श की कामयाबी थी जो छोटे से एक कसबे में पैदा होके भी आसमान छूने के ख्वाब देखने की हिम्मत करता था.. आपकी कामयाबी इसलिए भी दिल के करीब लगती थी शाहरुख़ भाई कि और सुपर स्टारों की तरह कभी आपको कभी मंदिरों, मजारों, मस्जिदों, दरगाहों के चक्कर लगाते नहीं देखा. कि ये तो छोडिये ही कि आप और आपकी पत्नी में कोई मांगलिक है या नहीं हमें तो ये भी पता नहीं कि आप दोनों ने शादी किस धर्म की रीतियों के मुताबिक की!

आप इसी लिए औरों से अलग थे अलहदा थे.. आप वो थे जो कह सकते थे कि आज बस जाओ और खुल के खेलो.. ये ९० मिनट सिर्फ तुम्हारे हैं.. ये वक़्त तुमसे तुम्हारा खुदा भी नहीं छीन सकता.आप वो थे जो बिना चिल्लाये इतनी मासूमाना सी बात की दुनिया में सिर्फ दो तरह के आदमी होते हैं अच्छे और बुरे, कह सकते थे शाहरुख़ भाई. आप वो भी थे कि लगातार हारती हुई अपनी आईपीएल की टीम के साथ जूझ के खड़े हो सकते थे. और हाँ भूल ही गया था कि जिन ठाकरों के सामने झुकने को कहने पे लोग लेटने लगते हैं उनसे आपने माफ़ी मानने से इनकार कर के हमारा सर फक्र से ऊँचा कर दिया था.

और बस इसी वजह से, आज यहाँ, अपने मुल्क से हज़ारों मील दूर आपको एनडीटीवी पे देख के आँखे चमकनी चाहियें थी, दिल को अच्छा लगना चाहिए था, यादों को आपकी फिल्मों की गलियों में लौट जाना चाहिए था. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं शाहरुख़ भाई. क्यूंकि इस बार जब आप दिखे तो बुरे आदमियों से लड़ते नहीं दिखे. इस बार जब आप दिखे दिखे तो वो आदमी नहीं याद आया जिसने बहुत बरस पहले एक लड़की को भगा के ले जाने से इनकार करते हुए उसकी माँ से कहा था कि जिंदगी में हमेशा दो रास्ते होते हैं, एक छोटा और एक बड़ा. और जिसने वो छोटा शोर्ट कट रास्ता चुनने से इनकार कर दिया था.

इस बार आप मुझे, हमें, हम सबको लक्स कोज़ी की तरफ से ईद की मुबारकबाद देते दिखे शाहरुख़ भाई. और पहली बार आपको देख के आँखें चमकी नहीं पर गीली हो गयीं. लगता नहीं कि आपको पता नहीं होगा पर आपको फिर से बता दें शाहरुख़ भाई ये अच्छे लोग नहीं हैं. कि इनके दामन पे रिज़वानुर का खून है. कि आपने सारी ज़िंदगी जिन मुहब्बतों की वकालत की है ये उन्ही मुहबत्तों के दुश्मन हैं.

ईद बहुत पाक मौका होता है शाहरुख़ भाई. और इन वक्तों में, अपने मुल्क, अपने लोगों से इतने दूर ईद पे मुल्क की याद बहुत आनी थी, आयी भी. पर इन यादों में, यकीन करिए, आपका मुस्कुराता हुआ सा चेहरा शामिल न था. इमानदारी से कहूँ तो इस ईद की सबसे खराब याद लक्स वालों की तरफ से आपको देखना ही है साहब..

देख लीजिये शाहरुख भाई.. आपका नाम खान है.. और आपकी दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग हैं अच्छे और बुरे. और अगर आप इन अशोक तोडियों के साथ खड़े नज़र आये तो हमें, जो आपके नाम पे लड़ने को तैयार होते थे, बहुत कुछ सोचना पड़ जाएगा शाहरुख़ भाई.

इस उम्मीद में कि अगली बार आपकी मुहब्बत शर्मिंदा नहीं करेगी
आपका
समर

8 comments :

  1. समर ,दिल को छू गया आपका ये ख़त |उम्मीद है शाहरुख़ भी पढेंगे ....

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  2. thanks pankaj and thanks Himanshu

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  3. समर जी आपने बेशक बहुत उम्दा पत्र लिखा है पर जिन ऊंचाइयों पर आपने शाहरुख़ साहिब को बैठाया उस से मै इत्तेफाक नहीं रखता. ये सच है की शाहरुख़ ने बिना किसी godfather के सब कुछ हासिल किया लेकिन एक बार पैर जमने के बाद वो गुटबाजी के अभिन्न अंग है, जिस से कोई भी इनकार नहीं कर सकता. रही बात चलचित्रों में उनके बागी तेवरों की तो वो सब उन महान कहानीकारों की रचना थी जिन्हें उन्होंने जीवंत किया था. शाहरुख़ साहिब ही है जो लक्ष्मी निवास मित्तल जी की बेटी में नाचे थे और उसके बाद उन्होंने कहा था कि मुझे जहाँ पैसा मिलेगा मैं वहां ज़रूर मनोरंजन के लिए जाऊँगा. अगर ऐसा आदमी मोटी रकम के लिए एक ब्रांड कि तरफ से ईद की बधाइयाँ बाट रहा है तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. खैर भाव हैं और और उसे ज़ाहिर करने का हक भी लेकिन मै बस इत्तेफाक नहीं रखता. ये फिल्म जगत है जहां सिर्फ पैसा बोलता है उअर कुछ नहीं और मैं इसे बुरा भी नहीं मानता क्योंकि इसी शोहरत के वजह से, उसी चमक दमक से लोग उसकी तरफ भागते हैं! शायद कभी कुछ ऐसा भी होगा इस देश में जब गुणों की वजह से भी किसी की क़द्र होगी, क्योंकि हमरे यहाँ नाम कभी इतने बड़े हो जाते हैं की इंसान छोटा लगने लगता है. शायद ज़िन्दगी की कीमत सबसे पुराणी सभ्यता ने बहुत सस्ती कर दी है!!

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  4. प्रशांत बाबू प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया.

    आगे आपकी राय से मेरी कोई नाइत्तिफाकी नहीं है पर फिर भी शाहरुख़ खान का मामला जरा अलग है.
    ऐसे ही देखें की जब अमिताभ बच्चन साहब गुजरात और मोदी के ब्रांड अम्बैसडर बने घूम रहे हों, जब राज ठाकरे के एक ऐतराज पे करन जौहर माफ़ी मांगने पंहुच जाते हों और लोग अपनी फिल्म प्रदर्शित करने की अनुमति लेने मातोश्री जाते हों ऐसे में एक आदमी तो है जो लड़ता है. और यही लड़ना उस आदमी को भीड़ से अलग करता है प्रशांत.
    रही बात दूसरी, पैसा ले के कहीं भी नाचने की तो इस मुल्क में नेताओं से लेकर अभिनेताओं तक कौन नहीं नाचता. वहां भी शाहरुख़ की ये कातिलाना इमानदारी तो है..
    और हाँ, यकीं करो दोस्त, हम लोग जो शाहरुख की फिल्मों के साथ जवान हुए हैं उनके लिए शारुख बड़ा की कोई और ये बहस ब्रायन लारा बड़े या सचिन की बहस से कमतर नहीं थी.
    और इसी लिए, ऐसे आदमी को यूँ देखना उदास करता है!

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  5. hmmm....quite typical of you Samar Sir, but I am seeing a trend these days which I wanted to share. I am witnessing that people are taking sides not based upon what is right or just or otherwise but what will "sell" or give them some way into the mainstream of socio-polictical affairs.
    Whether we talk of Kashmir or ethnic harmony, we have completely overlooked about one side and trying to advocate for the other side of the story, for instance no one talks about kashmiri non-muslims who have been suffering the wrath of being focefully evacuated from their homeland and now have been living in exile for more than decades together, no one talks about people who are poor in general who are suffering irrespective of their ethnic or primordial identity, rather only muslims or for that matter only Hindus on either side.
    I think this trend is to be observed and restricted as far as possible since by merely raising slogans and making morcha, dharna the issue is never resolved but people thrive on it years after years. In some cases political groups do not want the issue to be resolved since if the issue is their identity will no longer exist.
    I hope you would indeed find some value in what I have tried to submit.
    Warm regards
    Rajendra (aapka snehi junior)

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  6. Dear Rajendra
    This one is a nice comment indeed. Loved reading it a lot. so, let me try explaining my, as i can't argue for others, position on a few of them.
    To begin with, the very opening lines of yours 'quite typical of you Samar sir' says it all about me, that I have not changed. Grew from those days of romantic revolutionarism may be, but not changed. And for me it has never been about 'selling' either my friend. Intellectuals don't profess their love for superstars you know, it's way too 'non-serious' for them. And here I am washing myself off any assumed/presumed sense of intellectuality, proving, as a by product, that I am not into this selling business.
    then, the third observation of yours, about selectively choosing and speaking about issues is indeed a problem. I, however, have never shied away from speaking truth or taking sides even when they are very uncomfortable. I jave always been there right from supporting Tasleema Nasreen's freedom of expression to organising meetings on Communalisms, with a capital S. Yet, your criticism is very correct so there we are. Meanwhile, you can have a look at one of my recent articles...

    http://www.countercurrents.org/pandey240710.htm

    P.S.
    you dint need to tell me that you are a snehi junior of mine, I knew it was you sir! I can't forget such sweet friends you know!
    Samar

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