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नव-देशभक्तों के नाम एक जेएनयू वाले का खुला ख़त

जेएनयू की एक बहुत पुरानी शाम से उतने भी प्यारे नहीं देशभक्तों, भारत माता के वीरों (मुँह खुलते ही स्त्रियों को गालियाँ देने वालों को सप...

December 06, 2016

गंगाजमनी तहजीब जिंदा रखने की जिद की कीमत तो चुकाई, पर हारा नहीं अयोध्या

[एलएन स्टार, भोपाल में 4-12-2016 को प्रकाशित]

अयोध्या- घाघरा नदी को कुछ किलोमीटर के लिए सरयू बना देने वाला एक खामोश सा कस्बा! अयोध्या- फिर धीरे धीरे राजनीति की भेंट चढ़ दुनिया के लिए बड़े झमेले का, डर का नाम बन जाने वाले क़स्बा! फैज़ाबाद का जुड़वाँ क़स्बा!

पर फिर, यह सब 'बाहरी' लोगों के लिए. हमारे लिए तो हमेशा वह बहुत प्यारा सा कुछ और ही रहा- गांव से बस 28 किलोमीटर दूर हमारी हाट बाजार, सरयू उस पार नानी के घर जाते हुए पड़ने वाला पड़ाव, बस में बगल बैठे बुजुर्गों की प्यारी सी झिड़की- सरजू माई आय गयीं, हाथो न जोड़बा? वो कस्बा जहाँ पापा पढ़ने आये थे और जहाँ से पहले छात्रसंघ अध्यक्ष फिर प्राध्यापक बन कर लौटे. वह क़स्बा जहाँ का लगभग हर दुकानदार पापा के रहने तक उन्हें नाम से बुलाता था- कस हया जगन्नाथ भैया । वह क़स्बा जिसने मुझसे हमेशा पूछा- तुहूं पापा की तरह तेज तर्रार हया कि बस- चला बतावा दू बटे पाँच दशमलव मा केतना होये। वह कस्बा जिसकी मिट्टी में पुरखों की राख शामिल है, जिसमें पिछले साल मुझे भी पापा को विदा कर आना पड़ा.
जी. लोग अयोध्या की बात करते हैं, हमारे भीतर अयोध्या जीता है. वो अयोध्या जिसको कुछ लोगों ने अपनी राजनीति का ईंधन बना लिया- मंदिर वहीँ बनाएंगे! फिर उसके जवाब में कुछ और लोगों ने. और लीजिये- राम जन्मभूमि आंदोलन के नाम पर पीछे सड़क पर दंगे और लाशें छोड़ता जाता हुआ एक रथ था. फिर उन दंगों और लाशों का बदला लेने का दावा करते हुए कुछ बम थे. बाकी दोनों को न अयोध्या से मतलब था, न किसी मंदिर से, न किसी मस्जिद से. अयोध्या में तो रामलला विराजमान की पूजा भी हो ही रही थी, नमाज पढ़ने को मस्जिदें भी खूब थीं!

उनके लिए अयोध्या उनकी सत्ता पाने की हसरतों का रास्ता भर था! सो दोनों ने कुछ किया नहीं- मंदिर मस्जिद के नाम पर लोगों को लड़ाते रहे, सत्ता में आते रहे. अब मुद्दा कोई भी हो बार बार लोगों को भड़काने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता- सो धीरे धीरे वे भूलते भी गए! मंदिर वाले हों या मस्जिद वाले- अब दोनों को अयोध्या की याद कभी आ भी जाए तो बस चुनावों के वक़्त आती है!

पर अफ़सोस- उनकी सत्ता की हसरतों के रास्ते में पड़ जाने की कीमत अयोध्या को खूब चुकानी पड़ी और उसके हम जैसे बच्चों को भी. बाकी कस्बों में फैक्ट्रियाँ खड़ी होती रहीं, अयोध्या में सुरक्षाबलों के टेंट। बाकी कस्बों के लिए कर्फ्यू बस कभी कभार हो जाने वाला हादसा रहा, अयोध्या के लिए साल में कम से कम 3 बार का त्यौहार- अयोध्या की अपना दशहरा दीवाली और ईद! आप इलाहाबाद विश्विद्यालय से घर लौट रहे हैं और लीजिये- फिर किसी को किसी वजह से मंदिर बनाने की याद आ गयी और आप फैज़ाबाद में अटक गए- आपके और आपकी माँ के बीच में कर्फ्यू खड़ा है!

कभी किसी और शहर और अयोध्या की 30 साल पुरानी और अब की तस्वीर को साथ रख कर गौर से देखिएगा! समझ आएगा मैं क्या कह रहा हूँ! राम मंदिर 'आंदोलन' के तीस साल मेरे बचपन से अब चालीसवें पतझड़ से बस तीन कदम दूर खड़े होने के भी साल हैं. वे साल जिसमें मैंने बाकी हर शहर को बेतरह बदलते, बड़े होते देखा बस अयोध्या ठिठका खड़ा रह गया.

बस इतना बेहतर है कि अयोध्या अब भी वही अयोध्या है जो राम जन्मभूमि 'आंदोलन' के पहले था . वह कस्बा जहाँ आज तक एक भी दंगा नहीं हुआ। जी हाँ, अयोध्या के नाम पर दुनिया हर में दंगे करवाने वालों के मुँह पर गंगाजमनी तहजीब का तमाचा है हमारा कस्बा! वह कस्बा जहाँ बाबरी मस्जिद के मुख्य पैरोकार रहे हाशिम अंसारी चचा के जनाज़े के आगे भीगी आँखों के साथ हनुमान गढ़ी के महंत खड़े होते हैं और पीछे तमाम संतों की फ़ौज।

वही अयोध्या जहाँ ढह रही आलमगीर मस्जिद को फिर से बनाने के लिए हनुमानगढ़ी जमीन ही नहीं देती, निर्माण में आने वाला खर्च उठाने की बात ही नहीं करती बल्कि उसके बनने तक मुसलमान भाइयों को अपने परिसर में नमाज़ पढ़ने का न्यौता भी देती है. ये कहके कि यह भी खुदा का घर है! वो कस्बा जहाँ राम जन्मभूमि 'आंदोलन' वालों के कन्धों पे टंगी 'रामनामी' मुस्लिम जुलाहों के घर से निकल मुस्लिम रंगरेजों के यहाँ रंग तक ही उन तक पहुँचती है. वह कस्बा जहाँ खडाऊं बनाने वालों का नाम पूछियेगा तो झटका खा जायेंगे- हम पूछते थे- और बाकर चचा, खड़ाऊँ बढ़िया बिक रही है कि कम हो गए धरम करम वाले! और उनकी डांट खाते थे- काहे कम होई जैंहें? सबका अपने केस नास्तिक समझ लिहा है?

मैं जानता हूँ कि मेरा अयोध्या वही रहेगा!

November 21, 2016

Demonetisation, Proverbial Last Nail In The Coffin Of Already Beleaguered Peasantry

[This is an AHRC article.
Also Published in the Counter Currents.] 
Putting the cacophonous debate on the merits and demerits of demonetisation of Rs 500 and 1000 currency notes aside, there is no doubt over it having hit the farmers all set to go for Rabi crops sowing hardest. Almost entirely dependent upon cash transactions for everything from buying seeds to fertilisers, the move has ended up turning their earnings into trash overnight with many of them having nothing else to “bank” upon and that too for no fault of theirs. Though banking services have never really penetrated well in the hinterlands of India, the World Bank-Gallup Global Findex Survey 2014 put the number of people with a formal bank account in India at a paltry 53 per cent in 2014. This too came only after a massive push to Prime Minister Narendra Modi’s massive push to his pet Pradhan Mantri Jan Dhan Yojna (PMJDY), banking access had stood at even abysmal 33% the year before.

Further, though the PMJDY did increase the number of accounts opened, it did not actually mean usage of the same for transactions as studies after studies found out. In fact the number of Zero balance, or unused accounts was so high, 76% of the all opened by September 2014, that banks had to take recourse to deposit Rs 1 in scores of them to save the  scheme from embarrassment of being a disastrous failure! The numbers betray the real status of the access an average farmer has to bank accounts. What they do not is the fact that the Reserve Bank of India order debarring cooperative banks from accepting or exchanging old notes has badly affected most of even those farmers who have real, operating accounts in these banks, often the only ones serving the rural areas.
Despite the real concerns over functioning of some of them, particularly in Maharashtra, cooperative banks often serve as the life line for the farmers abandoned by mainstream banks. For example, district co-operative banks have more than 17,000 branches in Uttar Pradesh alone largely catering mostly to sugar cane farmers and having distributed short term crop loans to 32.24 lakh farmers in 2015-16 (until now) alone! Similarly, mainly rural customers of Kerala’s 1,551 primary cooperative banks with deposits over Rs 1, 37,000 crore have been affected badly by the RBI diktat.
It is in this context that the recent request by the Union Agriculture Minister of India to finance ministry for allowing farmers to use them for buying seeds makes perfect sense. It also betrays the fact that the move has been disastrous for already beleaguered peasantry and may as well end up as the proverbial last nail in the coffin of agriculture.
The request makes even more sense because farmers of India have been reeling under a relentless agrarian crisis even before and needed help, not the demonetisation jolt. Forget years of successive droughts having broken their backbones, the extent of damages caused by them across India even this year is hidden to none. The crisis has been severe enough, after all, to put provincial governments and union government at war with each other for claiming credit for relief work, at times going to the absurdity of rushing Water Trains without a drop of water to the affected areas.
It has been severe enough to claim thousands of lives- Maharashtra government, for instance, admitted that 2053 farmers had killed themselves from January 1, 2016 to 30th June as against total 3228 suicides it admitted in 2015. Worse even, this year has seen the crisis earlier hitting the farmers worst in Maharashtra, Bundelkhand and Telangana engulfing newer areas like Karnataka. The state has already seen 457 farm suicides since April this year! In such a scenario , allowing the farmers to use old currency notes to buy seeds, especially after a good monsoon this year might have led to relative easing of pressure off their shoulders.
What makes no sense, however, is the Finance Ministry’s outright rejection of the demand arguing that this may become a conduit to offload black money. Have the implications not been near catastrophic for the farmers, one could have laughed at this lame an excuse! To begin with, the Union Minister of Agriculture had made the request with ample security measures in place, collecting photocopies of identity documents and other details for the selling agencies such as National Seed Corporation, Indian Council of Agricultural Research or state agriculture departments for instance. He had also proposed to allow no refund of money or return of seeds purchased through old currency notes. Further, the same finance ministry has allowed the use of old notes for various essential services, including buying movie tickets in Maharashtra!
Evidently, the finance ministry has not merely erred gravely in denying the demand of a cabinet colleague, it has also exposed farmers’ to even more distress in doing so. The decision does not augur well for anyone- neither the farmers with no cash to go for Rabi sowing despite time slipping out of their hands, nor the country as it could only aggravate the farm crisis and bring a spurt to farm suicides already on an exceptional high this year. 
The finance ministry should immediately reconsider its decision and allow the use of old notes for buying seeds unless it is okay with farm crisis claiming many more lives. It is just that the blame of inviting such a disaster will lie squarely with it in that case.

November 20, 2016

नोटबंदी के बाद भारत: वर्तमान अनिश्चित, भविष्य चिंतित

[नवभारत में 20 नवम्बर 2016 को रविवासरीय परिशिष्ट में प्रकाशित।]

भारत किस दिशा में बढ़ रहा है? आगे आने वाले साल देश और देशवासियों के लिए कैसे होंगे! प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद के ढाई सालों में बुद्धिजीवी हलकों में ये सवाल लगातार पूछा जाता रहा है. सांप्रदायिक तनाव बढ़ाते गौरक्षकों के बढ़ते हमले हों या विश्वविद्यालयों पर सरकारी नियंत्रण की कोशिशें, विरोध को देशद्रोह का पर्याय बना देने के बयान हों या भारतीय सेना को सवालों के परे ले जा खड़े कर भारत को पाकिस्तान जैसे भविष्य के खतरे में डाल देने को लेकर चिंताएं, सरकार और उसके समर्थकों ने इस सवाल को बल भी खूब दिया है. हाँ, नोट बंदी के फरमान के बाद अब यह सवाल हर आम इन्सान की जुबान पर है!

पर इस सवाल से जूझने के पहले एक नुक्ता साफ़ कर लेना जरुरी है! ये कि दुनिया के हर हिस्से में, हर समाज में ज्योतिषियों और नजूमियों की मौजूदगी साबित करती है कि भविष्य की चिंता और उसे पहले से जान सकने का कौतूहल सबसे सहज मानवीय स्वभावों में से एक है. अब चूँकि परिवार, समाज, देश ये सब शुरू इंसानों से ही होते हैं, उन्हीं की संवेदनाओं का सामुदायिक विस्तार होते हैं सो उनको भी अपने भविष्य का कौतूहल होना लाजिमी है! शायद ये कौतूहल ही दुनिया के तमाम राष्ट्रों में उनकी स्थिति और भविष्य पर राज्याध्यक्षों के उन सालाना भाषणों की परंपराओं में दिखता है जिन्हें ‘स्टेट ऑफ़ द यूनियन’ (संयुक्त राज्य अमेरिका) या ‘स्टेट ऑफ़ द नेशन’ (फिलीपींस) जैसे नामों से जाना जाता है. इन भाषणों में मूलतः सरकारें अपने देश के हालात का लेखा जोखा जनता के सामने रखती हैं, बताती हैं कि देश कहाँ खड़ा है, आगे किधर जा रहा है!

काश कि भारत में भी ऐसी कोई परंपरा होती. इसलिए भी कि प्रधानमंत्री की मोदी की या तो अंधसमर्थन या अतिविरोध पैदा करने वाली विभाजक छवि के अनुरूप इस सवाल के जवाब के दो अतियों में मिलने की जगह एक दस्तावेज सामने होता जिसे देख एक निष्पक्ष राय बनायी जा सकती. पर अफ़सोस, उसकी अनुपस्थिति में हमें खुद ही इस सवाल से जूझना होगा. वह भी कोशिश कर के उन आंकड़ों और तथ्यों की रोशनी में जो मोदी समर्थन और विरोध की अतियों को लेकर पक्षपाती न हों! सो सिर्फ उन आंकड़ों पर नजर डाली जाय जो खुद सरकार ने दिए हैं!

शुरुआत करते हैं देश में बढ़े सांप्रदायिक और सामुदायिक तनाव से- खासतौर पर इसलिए क्योंकि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने गौरक्षा के बहाने की जा रही हिन्सा पर सवाल उठा, 80% गौरक्षकों को मूलतः अपने आपराधिक कारनामों को छुपाने की कोशिश में मुब्तिला बता एक असल दिक्कत साबित कर दिया था! ठीक इसी तरह दिल्ली में 2012 के बार्बरिक सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद पूरे देश की नजर महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर भी टिकी हुई है सो इन दोनों को एक पल को किनारे रख सिर्फ अनुसूचित जातियों पर हमलों पर नजर डालें.

खुद राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़े दिखाते हैं कि देश में दलितों के खिलाफ अपराध में 2013 की तुलना में 2014 में 19 प्रतिशत का इजाफा हुआ जिनमें 744 तो हत्या के मामले थे! 2015 में इनमें 4.4 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज हुई है- 2014 में 47,064 के बरक्स 2015 में दलितों के खिलाफ अपराध के कुल 45,003 मामले दर्ज हुए. पर फिर, कुल संख्या को 2012 के बरक्स देखें तो साफ होता है कि दलितों पर हमलों में एक तिहाई से भी ज्यादा का इजाफा हुआ है. इसमें यह भी जोड़ें कि ब्यूरो के ही मुताबिक जहाँ भारत में दंड संहिता के अंतर्गत सभी संज्ञेय अपराधों में दोषसिद्धि की दर 45% है वहीँ दलित और आदिवासियों के खिलाफ अपराधों के मामले में यही दर सिर्फ 28 प्रतिशत है. स्थिति की भयावहता और साफ़ हो जाती है!

पर क्या स्थिति सिर्फ सामुदायिक और सांप्रदायिक विद्वेष के मामलों में ही ख़राब है? न, ब्यूरो के ही आंकड़ों पर और नजर डालें तो समझ आता है कि सरकारी कृषि नीतियों की वजह से खेती के दम पर जीने के दुरूह होते जाने के दौर में भारत के गाँव भुखमरी और किसानों की आत्महत्यायों के साथ साथ एक दूसरी आग की चपेट में भी हैं.

बीते साल भारत में कृषि सम्बंधित दंगों में भी 2014 में 628 से बढ़ 2,683 पर जा पहुँचे और इनमें दर्जनों से ज्यादा जानें गयी हैं! कृषि दंगों में 327% का यह इजाफा तब हुआ है जब विकास के दावे वाले गुजरात में ऐसे 126 दंगों के स्वीकार के बावजूद लगातार किसान असंतोष झेल रहे पंजाब जैसे राज्यों ने इनकी संख्या शून्य बताई है! इन दंगों के मूल में सामुदायिक विद्वेष नहीं बल्कि किसानों में बढती जा रही निराशा है जो उनके और सरकारी सुरक्षाबलों में सीधे टकराव के रूप में सामने आती है! इस साल नोटबंदी के पहले ही महाराष्ट्र से लेकर बुन्देलखंड तक देश सूखे से हुई हजारों मौतों और पानी वाली रेलगाड़ियाँ चलाने की जरूरतों से जूझता रहा है. नोटबंदी के बाद देश भर से रबी की बुवाई के बेतरह प्रभावित होने की ख़बरों के बीच अगले साल की तस्वीर बहुत आशाजनक नहीं लगती.

पर क्या इन निराशाजनक सूचनाओं के बीच कहीं से कोई उम्मीद की किरण भी नजर आती है? क्या मुश्किल में पड़े ग्रामीण भारत को डिजिटल इंडिया बचा नहीं सकता? अफ़सोस, अखबारी दावों और जुमलों से इतर यहाँ भी खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यह लगभग नामुमकिन है! अभी जुलाई में लोक सभा में एक सवाल का जवाब देते हुए वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारामन ने श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के हवाले से माना था कि भारत में नए रोजगारों के सृजन के दर में कमी आई है! अफ़सोस यह आधा सच था- उन्होंने खुद ही आगे जोड़ा था कि 2014 में 4.21 लाख नए रोजगारों की तुलना में 2015 में कुल 1.35 लाख नए रोजगार सृजित हुए थे! तीन चौथाई की गिरावट ‘कमी’ नहीं बल्कि ढह जाना होती है!

अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों पर भी नजर डालें तो आलम यही है! निर्माण क्षेत्र दशक भर में सबसे बुरी स्थिति में है, निर्यात गिरा है और खुद विश्व बैंक की व्यापार करने की आसानी की सूची बता रही है कि 2015 में भारत में व्यापार शुरू करना पहले से और ज्यादा मुश्किल हो गया है! अब नए व्यापार शुरू नहीं होंगे तो रोजगार सृजन का क्या होगा? रोजगार नहीं होंगे तो विकास का क्या होगा? जोड़ते रहें और स्थिति फिर अच्छी नहीं नजर आती!



हद यह कि प्रधानमंत्री मोदी की एक बड़ी ताकत मानी जाने वाली आक्रामक विदेश नीति भी यहाँ भारत की मदद करती नजर नहीं आती. आर्थिक मंदी की मार झेल रहे ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन से निकलने के आप्रवासन नियमों को कड़ा करना शुरू कर दिया था और अब उसने वह लागू भी कर दिए हैं. इन नए नियमों की सबसे बड़ी मार भारतीय आईटी और अन्य कुशल पेशेवरों पर पड़ी है! अभी यही चोट नहीं सँभली थी कि आप्रवासी विरोध के वादे के साथ चुनाव जीते डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता सँभालते ही आप्रवासियों को वापस भेजने का फैसला दोहरा दिया! बेशक कुछ लोगों ने इस घोषणा को हिस्पैनिक और मुस्लिम आप्रवासियों पर केन्द्रित बता ध्यान भटकाने की कोशिशें कीं, पर आज उनके प्रमुख सलाहकार स्टीव बैनन ने सिलिकॉन वैली (अमेरिका में प्रौद्योगिकी का गढ़) के कुछ ज्यादा ही ‘दक्षिण एशियाई’ होने का बयान देकर साफ़ कर दिया है कि असली निशाना कौन है!

दरअसल नोटबंदी के ‘कड़क’ फैसले के पीछे की इन सारी स्थितियों को ध्यान से देखें तो साफ़ समझ आता है कि यह दरअसल एक हताश दाँव है! समाज और अर्थव्यवस्था की हालत में मोदी सरकार की उद्योग जगत को दी गयी 1.14 लाख करोड़ रुपये की कर्जमाफी जोड़ें (मनमोहन सरकार ने अपने 10 सालों में इसकी आधी भी नहीं दी थी) और समझ आएगा कि भारतीय बैंक किस बोझ से चरमरा रहे थे! अफ़सोस कि जनता तो पैसे होने के बावजूद खाने और इलाज बिना मर ही रही है, बैंक भी शायद ही इस नए जमा धन पर जरुरी ब्याज का बोझ झेल पायें!

कुल मिलाकर यह कि बिना प्रशासन का प्रदर्शन अक्सर प्रहसन में बदल जाता है और देश उसी प्रहसन का मोल चुकाने की स्थिति में आ खड़ा हुआ है! सांप्रदायिक तनाव, सामुदायिक विद्वेष, कृषि संकट से उपजता गुस्सा और डूबती अर्थव्यवस्था का घोल भारत को एक अभूतपूर्व संकट की तरफ ले जा सकता है. पर फिर भी, अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, बशर्ते सरकार सुनने को और कुछ करने को तैयार हो!
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Demonetisation, Proverbial Last Nail In The Coffin Of Already Beleaguered Peasantry

Putting the cacophonous debate on the merits and demerits of demonetisation of Rs 500 and 1000 currency notes aside, there is no doubt over it having hit the farmers all set to go for Rabi crops sowing hardest. Almost entirely dependent upon cash transactions for everything from buying seeds to fertilisers, the move has ended up turning their earnings into trash overnight with many of them having nothing else to “bank” upon and that too for no fault of theirs. Though banking services have never really penetrated well in the hinterlands of India, the World Bank-Gallup Global Findex Survey 2014 put the number of people with a formal bank account in India at a paltry 53 per cent in 2014. This too came only after a massive push to Prime Minister Narendra Modi’s massive push to his pet Pradhan Mantri Jan Dhan Yojna (PMJDY), banking access had stood at even abysmal 33% the year before.
Further, though the PMJDY did increase the number of accounts opened, it did not actually mean usage of the same for transactions as studies after studies found out. In fact the number of Zero balance, or unused accounts was so high, 76% of the all opened by September 2014, that banks had to take recourse to deposit Rs 1 in scores of them to save the  scheme from embarrassment of being a disastrous failure! The numbers betray the real status of the access an average farmer has to bank accounts. What they do not is the fact that the Reserve Bank of India order debarring cooperative banks from accepting or exchanging old notes has badly affected most of even those farmers who have real, operating accounts in these banks, often the only ones serving the rural areas.
Despite the real concerns over functioning of some of them, particularly in Maharashtra, cooperative banks often serve as the life line for the farmers abandoned by mainstream banks. For example, district co-operative banks have more than 17,000 branches in Uttar Pradesh alone largely catering mostly to sugar cane farmers and having distributed short term crop loans to 32.24 lakh farmers in 2015-16 (until now) alone! Similarly, mainly rural customers of Kerala’s 1,551 primary cooperative banks with deposits over Rs 1, 37,000 crore have been affected badly by the RBI diktat.
It is in this context that the recent request by the Union Agriculture Minister of India to finance ministry for allowing farmers to use them for buying seeds makes perfect sense. It also betrays the fact that the move has been disastrous for already beleaguered peasantry and may as well end up as the proverbial last nail in the coffin of agriculture.
The request makes even more sense because farmers of India have been reeling under a relentless agrarian crisis even before and needed help, not the demonetisation jolt. Forget years of successive droughts having broken their backbones, the extent of damages caused by them across India even this year is hidden to none. The crisis has been severe enough, after all, to put provincial governments and union government at war with each other for claiming credit for relief work, at times going to the absurdity of rushing Water Trains without a drop of water to the affected areas.
It has been severe enough to claim thousands of lives- Maharashtra government, for instance, admitted that 2053 farmers had killed themselves from January 1, 2016 to 30th June as against total 3228 suicides it admitted in 2015. Worse even, this year has seen the crisis earlier hitting the farmers worst in Maharashtra, Bundelkhand and Telangana engulfing newer areas like Karnataka. The state has already seen 457 farm suicides since April this year! In such a scenario , allowing the farmers to use old currency notes to buy seeds, especially after a good monsoon this year might have led to relative easing of pressure off their shoulders.
What makes no sense, however, is the Finance Ministry’s outright rejection of the demand arguing that this may become a conduit to offload black money. Have the implications not been near catastrophic for the farmers, one could have laughed at this lame an excuse! To begin with, the Union Minister of Agriculture had made the request with ample security measures in place, collecting photocopies of identity documents and other details for the selling agencies such as National Seed Corporation, Indian Council of Agricultural Research or state agriculture departments for instance. He had also proposed to allow no refund of money or return of seeds purchased through old currency notes. Further, the same finance ministry has allowed the use of old notes for various essential services, including buying movie tickets in Maharashtra!
Evidently, the finance ministry has not merely erred gravely in denying the demand of a cabinet colleague, it has also exposed farmers’ to even more distress in doing so. The decision does not augur well for anyone- neither the farmers with no cash to go for Rabi sowing despite time slipping out of their hands, nor the country as it could only aggravate the farm crisis and bring a spurt to farm suicides already on an exceptional high this year. The finance ministry should immediately reconsider its decision and allow the use of old notes for buying seeds unless it is okay with farm crisis claiming many more lives. It is just that the blame of inviting such a disaster will lie squarely with it in that case.

November 08, 2016

Bhopal Encounter: MP Government sheds even the pretence of the rule of law



[This is an AHRC Article
Re-Published in Counter Currents].
bhopal-encounter-killing
bhopal-encounter-killingThe fact that the Madhya Pradesh state government has shed even the pretence of fair-trial, a cornerstone of the rule of law, has emerged as the only uncontested truth four days after the incredulous police encounter that resulted in the killing of 8 under-trial jail escapees. The circumstances of the reported jailbreak from the supposedly highest security prison in the state, and all that followed, are still fuzzy.
Police claims about the circumstances of the jailbreak are downright bizarre. Think about it for a moment: under-trials, belonging to a proscribed group – Students Islamic Movement of India (SIMI) – escaped after killing an armed guard with spoons and steel plates, unlocking themselves with the keys made of wood, and scaling three layers of jail walls, the last being 25 feet high, undetected, as not a single close circuit television camera installed in the jail was working. There is humour somewhere here in this story.
One cannot laugh at what followed after this reported jailbreak however. An Inspector General of Madhya Pradesh Police (IGP), in charge of the Bhopal area, claimed that the escapee under-trials, spotted on a cliff with no escape route, some 8 kilometres away from the jail, were armed with country made pistols. The Home Minister of the state, who is responsible for all law and order issues, supported the claim. Another IGP, the Chief of Anti-Terror Squad, however, claimed later that the escapee under-trials had no firearms with them at the time of the “encounter”. Cops under his command conducted the “encounter”.
The message is clear. The IGP, Bhopal, tried to justify the killings as unavoidable: blaming the slain for firing at the police parties closing in on them. The IGP (ATS) believed in no such pretense. He asserted on camera that the under-trials were unarmed and added, “so what”! “Even if the police are not being fired at, they can use such force.”
The problem is that the law of the land disallows police from using such lethal force against unarmed persons, even those accused of having committed heinous crimes. The Supreme Court of India has repeatedly criminalised use of such force against those causing no threat to the life of others and have recommended stringent sentences with death penalty for such “trigger happy” cops indulging in such extrajudicial executions; for example, in cases like Prakash Kadam & Etc. v. Ramprasad Vishwanath Gupta & Anr. (Criminal Appeal Nos.1174-1178 of 2011) and the People’s Union for Civil Liberties v. State of Maharashtra & Ors. (Criminal Appeal No. 1255 of 1999).
The Supreme Court of India has also devised a detailed guideline for police “encounters” resulting in deaths. The guidelines ask for immediate registration of a First Information Report in the deaths, the institution of a probe, and no out of turn promotion to the cops involved until the probe is over, and submission of six monthly status reports to the National Human Rights Commission. Evidently, either the IGP (ATS) is unaware of the law or is absolutely certain of the impunity the cops enjoy in the state!
The actions of Madhya Pradesh government in the wake of the encounter suggest the source of this confidence, despite the flouting of clearly established legal procedures. Forget taking punitive action against the those responsible, for allowing the killing of unarmed undertrials, as per IGP (ATS’) own admission, and in that being the case, against IGP (Bhopal) for concocting evidence, the Chief Minister of the state went on to facilitate the cops involved in the encounter. He did that on Madhya Pradesh Foundation Day, the day after the killings. He also announced a cash reward of Rs. 2 lakh each to the cops who participated in the encounter and Rs. one lakh each for those who participated in the search operation. Worse even, he asked the audience if it was not the right way to deal with the ‘terrorists’, perhaps deliberately hiding the fact that they were just undertrials, not convicts!
Of course, he later ordered for a judicial probe into the encounter, as is mandated by the Supreme Court! The fate of this probe launched after the State government already rewarding the cops involved in the extrajudicial killing of the under-trials is anyone’s guess!
Is it not high time for the Supreme Court to step in and stop the farce by taking suo moto notice and instituting a probe, monitored under its purview? If it cannot do that, it might consider exempting Madhya Pradesh from the need of enforcing the law of the land, including the rights the Constitution guarantees to the citizenry.

October 14, 2016

Armed with 50 grams of food in viscera, authorities deny starvation death

[This is an AHRC Statement.]
[Srikant Dixit. Photo from Sudhir Mishra's Facebook Post]
Srikant Dixit, a 40-year-old farmer did not die of hunger, claim authorities in Uttar Pradesh.
These authorities base their conclusion on the post-mortem report, which states that there was 50 grams of food in the man’s stomach. Yes, for authorities, finding 50 grams of food in the stomach of a man starving for 12 days is enough to refute a starvation death. This is despite the likely possibility that the deceased’s aged mother, who had been begging for wheat flour, fed it to her son with water in her last ditch attempt to make him survive.
Authorities find they have to deny starvation deaths, as the state government holds the District Magistrate responsible for any starvation causality. Ironically, no District Magistrate in the state, and perhaps in whole country, has ever been penalized for starvation deaths. The reason behind this is simple. Forget statistics proving otherwise, from those of government agencies, the United Nations, or other watchdogs, no one dies of hunger in India according to local officials.
Local officials always find, in fact, invent, reasons other than hunger for such deaths. They may list the cause as diarrhea, for children of the indigenous communities in Madhya Pradesh that starved to death. It might be tuberculosis for the middle-aged and elderly people, from rickshaw pullers in metropolitan cities to destitute elderly singles in villages. Thankfully, for the authorities, the list of such diseases to attribute the cause of death is endless.
So, what if the Constitution of India, which these authorities are obligated to uphold, guarantees right to life with dignity to every single citizen, be s/he rich or poor. Guaranteeing a right is meaningless unless there are institutions to implement and monitor the implementation of these guarantees on the ground. The Indian authorities can happily bank upon the double delight of the absence of any such institutions, coupled with a rotten, farcical, and dysfunctional justice system that virtually never penalizes violation of constitutional guarantees.
Think about it: there is no dearth of government welfare schemes to help people like Srikant Dixit. But not a single one of these schemes reached him in his Pakariya Village under Asaundra Tehsil of Barabanki District when he needed them the most. His family was not categorised as Below Poverty Line, which would have entitled it subsidised rations, which in turn could have saved him. He did not have any job card under Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MNREGA), which would have entitled him to at least 100 days of work a year either.
He survived as a daily wage labour working odd jobs he got, if any. And, like all such workers, he had nothing to fall back upon if he fell ill, as the welfare schemes are all in paper on some official’s desk, and not in his village. He might have thought of registering a complaint, seeking redress, but then there are no such places for the poor in India. The courts take decades to adjudicate murders; they have no any time for someone seeking a ration card that he needed! Even if there were such a court by some miracle, he would not be able to afford an advocate, for the very same reason he needed the BPL ration card!
Srikant did not die in a day; no one does. The people and authorities around would not have been unaware; every village in Uttar Pradesh has at least three authorities: an elected village chief, and a village secretary, and revenue clerk from local administration. They would have known and should have intervened. They are obligated to do that. They did not. The very fact that the death occurred despite them being around speaks about how institutions work.
Sadly, this is not the story of just one man. It is the collective collapse of a system that first fails to protect the citizens and then denies the failure with impunity: no one is fired, no one gets penalised, and no redress offered to victims.
Until both the people of the nation and its authorities can look at the reality around them the way it is, and call a starvation death a starvation death, all manners of perverse actions will abound. The day the nation and its people are able to see reality as it is, they will not be able to ignore how their institutions and, in particular, their justice institutions, are generating utter misery. That will be the beginning of the end of dysfunctional institutions and authorities that work against the people, spinning blatant lies as gospel truth.

October 03, 2016

Who is responsible for this murderous justice system?

[This is an AHRC Statement.]

Seldom does just one verdict betray the rot that permeates the judicial system right from the policing to judiciary. The Supreme Court of India’s recent verdict on 24 September, 2016 was one such verdict. In acquitting death row convict Dhal Singh Dewangan, a resident of Chhattisgarh, the verdict exposed the façade that passes off for forensic investigation in India, the shoddiness with which lower judiciary deals with evidence and the denial of justice to those most in need of the same- the poor and the marginalised. The judgment, sadly, also exposed the bitter truth that despite all the occasional outrages over this or that gory crime, there is hardly any momentum for justice system reforms in India.

Even a most cursory look at the circumstances of the cases expose the travesty of justice- for both the accused and the victims. The Sessions Court in Durg of Chhattisgarh had convicted Mr. Dewangan for the murder of his wife and 5 daughters in 2012. The High Court of Chhattisgarh had later upheld the verdict in 2013 and confirmed the death sentence. The Supreme Court’s verdict shows that they both did it on the basis of only circumstantial evidence, that too such one which did not establish a “complete chain of evidence”.

To begin with, the accused was found lying unconscious in his house with all others dead, killed by sharp weapons to be precise. The police rushed him to the nearest primary health centre (PHC) and yet did not place anything on record about his status- whether he was faking it and if not, then what made him unconscious. Not a very brilliant example of investigation, isn’t it?

Further, the police failed to seize the clothes the accused was wearing immediately after reaching the site of the crime. Even more interestingly, the seizure memo records that the accused was wearing a “Istamali’ (later explained as a Lungi, an Indian version of wraparound, though both are not the same) while arrest memo showing him wearing “full pant and shirt” adding “nothing found on the person of the accused except clothes worn by him”. What is missing here is when did the accused change his clothes as police itself had found him unconscious and rushed him to the primary health centre! The police have even failed to examine the constable who accompanied the accused to the PHC to explain the anomaly.

Yet, the worst in the investigation was yet to come. The police had not collected any finger prints at the crime site- not from the house and not even from the iron knife found there and claimed to be the weapon used for committing the murders! Just the thought that this fact slipped the attention of all- the police which failed to take fingerprints and the judges at first sessions and then high court who still awarded death sentence to the accused should send a shiver down the spine of those believing in rule of law and its corollary- protecting the life and person is the responsibility of the state and thereby law enforcement and delivering redress of judiciary, if the law enforcement fails to do that.

The Supreme Court, therefore, was absolutely correct in reaching the conclusion that the evidence produced did not “form a complete chain of evidence as not to leave any reasonable ground for the conclusion consistent with the innocence of the appellant nor do the circumstances exclude every possible hypothesis except the guilt of the accused.” So it was in setting aside the conviction and ordering the accused’s immediate release if not wanted in any other case.

However, the judgement leaves many more questions than it answers, such a shoddy status of investigation in India being capable of taking people to gallows being first and foremost of them. Equally important and discomforting question emanating from the judgement is the denial of justice to the victims. They would never get justice now as the judgement hasn’t took the investigation to task and ordered it for reopening the case. A woman and her five daughters are now killed, but apparently by no one.

And then, the case is more a norm and not exception. The all-India conviction rate in 13,25,989 cases under IPC crimes tried in 2015 stood at less than half 46.9%. Take the petty crime cases with plea bargain away and it would be far worse. Yes, bulk of this conviction rate comes from slow justice system forcing scores of undertrails admitting to their guilt irrespective of having committed the crime or not, after spending more time in jail than the total sentence the crime carries. To put it in proper figures- despite being under continuous media and civil society gaze after the infamous Delhi gang rape cases in 2012, the conviction rate in rape cases tried in 2015 stood at just above 29%- or almost half of overall conviction rate, and even abysmal 19.8% in attempt to rape cases.

Only thing sadder than this is the fact that no one would even seek justice for them, there would be no “No one killed mother and 5 daughters” campaigns, no one would take out candle light processions for them, no one would be screaming in studios of news channels about the crime against women. And this would be not because their lives are so insignificant, so incidental to Indian society, at least the often very well meaning civil society activists part of it.


It would be because despite all their claims on the contrary, right to redress and justice being the very core, the hinge on which all other rights rest is something they miss more often than not. 

September 28, 2016

उड़ी का बदला लेने वाले पठानकोट पे सो रहे थे क्या?

हम कभी फौज से कोई ख़ास प्यार नहीं कर पाए. लड़ाकू पायलट बनने के सपने, और उसे लगभग पूरा कर लेने के बाद भी, जी एनडीए में फाइनल सेलेक्शन लिया था-पिता ने इनडेम्निटी बांड ही न भरा तो रह गए! हमें हमेशा फौजी भी समाज का वैसा ही एक जरुरी हिस्सा लगे जैसे और सारे- जैसे शिक्षक जिनसे परिवार भरा हुआ है और जो न हों तो फौजी फौजी बन ही न पायें, या सफाईकर्मी- जो न हों तो दुश्मन की जरुरत न पड़े, हैजे से शहर के शहर ख़त्म हो जाएँ. बाकी मामलों में भी वैसे ही- कुछ अच्छे, कुछ बहुत बुरे, बाकी सामान्य. ऐसे भी फौजी जो चलती ट्रेन में डाकुओं से महिलाओं को बचाने के लिए अकेले 35-40 से जूझ जाएँ तो ऐसे भी जो न्यायिक आयोग के मुताबिक निर्दोष लड़की मनोरमा की हत्या कर दें, बलात्कार की पुष्टि भले न हो. ऐसे भी जो पाकिस्तानी शेलिंग के बीच डोडा में काश्मीरी बच्ची को बचाने गोलीबारी के बीच घुस जाएँ, ऐसे भी जो प्रमोशन और मैडल के लिए निर्दोष मजदूरों को फर्जी मुठभेड़ में मार दें- बाद में अगर पकड़े जाएँ जैसे केचप कर्नल पकड़ा गया तो सेना अदालत की दी हुई उम्रकैद काटें नहीं तो सच में प्रमोशन पायें. 

बाकी हम तो युद्धविरोधी घोषित देश'द्रोही' ठहरे! 


हाँ, कुछ और लोग तो थे जिनके देशभक्ति के दावे थे, और जिन्होंने उस भक्ति को सेना के लिए बिना शर्त बिना सवाल प्यार और सम्मान में समेट दिया था. वे अब कहाँ हैं? जैसे एक सुषमा स्वराज थीं. विपक्ष में एक शहीद के बदले दस सिर माँगती थीं, अभी विदेश मंत्री हैं, लाईं? एक राजनाथ सिंह थे. ख़ुद सीमा पर जाने को तैयार रहते थे- गृहमंत्री हैं- गए? कहते रहते हैं कि पहला हमला न करेंगे पर पाकिस्तान ने किया तो गोलियाँ न गिनेंगे. न गिनीं? गुरदासपुर, पठानकोट, कुलगाम, पैम्पोर, पुलवामा और अब उड़ी  के बाद? एक मोदी तो थे ही- मौखिक बमबाज! मुँह से बमबारी करते थे, पाकिस्तान घुस जाते थे। अभी प्रधानमंत्री हैं- गुरदासपुर, पठानकोट, कुलगाम, पुलवामा, उड़ी- सब हो गया- घुसे? अलबत्ता पाकिस्तानी  प्रधानमंत्री  नवाज़ शरीफ के सालगिरह के जश्न में बिना बुलाये जरुर घुस गए थे! खूब गले मिले थे, मिठाई खाए थे! 


तमाम देशभक्त इनसे कुछ नहीं पूछ रहे- अब कहाँ गयी सारी देशभक्ति, सारा सेना प्रेम. (हिम्मत भी न हो शायद). न ये कि हमला वमला तो छोड़िये, इन्हें भी पता था कि अभी की वैश्विक स्थिति में संभव ही नहीं है, पर इन सेनाप्रेमी देशभक्तों की अपनी सरकार के 2 साल, गुरदासपुर के साल भर और पठानकोट के 8 महीने बाद भी पाकिस्तान भारत का सबसे चहेता देश कैसे बना हुआ था. (कमाल ये भी कि ये दर्जा भी इन्हीं की पुरखी अटल बिहारी वाजपेयी  सरकार ने दिया था!) न ये कि ये सिन्धु नदी समझौते को रद्द करने का खयाल तब क्यों नहीं आया था, और आया था तो किया क्यों नहीं? न तब, न अब.न ये कि इसका मतलब पठानकोट वाले उड़ी वालों से कम शहीद थे क्या! क्या पता ये सच में मानते हों, वरना पाकिस्तानी जांच दल को उसी वायुसेना अड्डे पर बुला बिरयानी क्यों खिलाते! 


और हाँ, ये भी कि अब सार्क मीटिंग का बहिष्कार कर रहे हैं तो पठानकोट के बाद सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह दोनों क्यों गए थे? एक एक करके! फिर से वही, पठानकोट वाले कम शहीद थे क्या? 

कहने को तो ये इनको नहीं कह रहे कि हमला कर दो- सीमा पर फौज देख लेगी अन्दर हम. न, उनसे कुछ नहीं पूछ रहे ये. फिर किससे पूछ रहे हैं? उनसे जिनसे पूछना आसान है? जिनको देशद्रोही बता देना देशभक्ति के फर्जी सर्टिफिकेट पाने का सबसे आसान रास्ता है.

September 13, 2016

Police sniffing in kitchens while rapists roam the streets

[This is an AHRC Statement.]
The latest statistics put out by the National Crime Record Bureau gives the Haryana state of India a dubious distinction. It stands second in the number of complaints lodged with the police, second only to Uttar Pradesh. That the population, in general, views police as the last resort in cases of injustice, puts the statistics in perspective.
Haryana, the state with the worst sex ratio in India is particularly notorious for crimes against women, ranging from female foeticide to gang rapes and “honour” killings. It has also seen large-scale violence, including unconfirmed reports of gangrapes of commuters recently, and it took the deployment of the Army to bring the situation under control.
Yet, the government seems to be bothered about something very different from the overwhelming injustice and violence. It is extremely concerned with the protection of cows.
One of the very first things the state government did after assuming power was constitute a Haryana Gau Seva Ayog (Haryana Cow Service Commission). The Commission was given more teeth with the formation of a specialised Cow Protection Task Force (CPTF) within the police, with the mandate of checking cow slaughter and consumption of beef, which are crimes in the state but not across India. A point to note is that it is only the meat of the progeny of cow that qualifies as beef for the bans.
The Commission and the cops in CPTF have taken their jobs seriously. This is exemplified by their decision to check the samples of Biryani, a traditional rice and meat delicacy, from hotels in Mewat area of the state, in order to enforce the beef ban. Media reports also indicate that police have been even mulling making checks in private residences. A senior officer of the state animal husbandry department asserted that there would be more raids if they were to receive complaints.
What would these ‘complaints’ be like? Who would make them? These would of course be private citizens. Here is a question: which section of the Indian Penal Code allows the police to enter kitchens of private citizens on “information” given by other private citizens? Further, what if the “informers” make complaints to settle personal scores, something routine in India and in the state? What if the complaint is found to be false? It would get the family marked out as “beef suspects” regardless and thus make them vulnerable to violence by vigilantes for life? CPTF and the Commission intend to save the cows, but who will save their victims?
The answers are found in the political geography of the raids, which were not statewide. The raids targeted only Nuh, a district with significant population of Muslims, a minority in India. Furthermore, that they were conducted just before Eid-al-Adha (the festival when Muslims sacrifice animals) make them even more suspect, and hint at this being a brazen attempt to polarize communities and give rise to sectarian violence.
Such attempts are not new for the state. Cow vigilantes have been at it for years now. This time, however, it is not the vigilantes, but a Commission appointed by the state itself that is playing this role. Moreover the State is using the police, oath-bound to adhere to the secular Constitution of India and to not indulge in religious witch-hunt of any community.
This does not augur well for anyone: neither the citizens being hounded by their own government, nor the Haryana state, which stands second in crime complaints in India.
The state government has shown that there is virtually no one to stop the farce, rein in the Gau Seva Commission, and stop it from breaking the law itself!
It is time for higher ups, including Prime Minister Narendra Modi, to rein in the state government being run by his own political party. Mr. Modi had himself said once that 80 percent of cow vigilantes are day-time-vigilantes-night-time-criminals. His understanding of the realities could help him check the actions of the state government.
Independently, the Supreme Court of India needs to look at this attack on the rule of law, being as it is the custodian of the law.

September 12, 2016

A Judicial Joke Funnier Than Pokemon Go

[Published in The Wire on 09 September, 2016] 
A representative image from Reuters
Pokémon GO, a location based augmented reality game, is the newest entrant in the ever-increasing list of things to offend the ever so fragile religious sentiments of some Indians. To play Pokémon Go, users install the app on their smartphones. The app ‘reads’ a user’s location via the device’s GPS and accordingly displays an item in the app that the user can choose to collect. The game has apparently offended some people by displaying virtual eggs in places of worship. Distressed by the “blasphemy”, these aggrieved individuals approached the Gujarat high court and filed a Public Interest Litigation (PIL) against the game. The high court, on its part, was quick to offer redress. It admitted the PIL and sent notices to the union and state governments as well as the game makers, US-based Niantic Inc.
Ironically, Niantic Inc. has neither released the game in India nor does it have any immediate launch dates in sight. Consequently, those playing the game are the ones who have downloaded it either from foreign servers, or APK sites. The Gujarat high court is apparently least bothered with such trivial details. Neither was it bothered with its own Chief Justice R. Subhash Reddy’s lament that there are more than 22 lakh cases pending in various courts of Gujarat. The court had all the time in the world to redress the hurt religious sentiments of a few by a game that is not even released in India.
It is this frivolity that is the real bane of the Indian judicial system. In addition to the backlog of pending cases, it is this habit of accepting even the most absurd claims for litigation, while making access to justice almost impossible for the genuinely aggrieved, which has caused a ‘crisis of credibility’ for the judiciary, as highlighted by Chief Justice of India T.S. Thakur’s own lament in March this year.
There is no dearth of such silly cases in Indian courts even as the genuine ones wait their turn for years, even decades. A whopping 59,468 cases were pending before the Supreme Court as of February 19, 2016 and 1,216 of these have been pending for more than a decade. Collective pendency at the high courts stood at 4,153,957 cases, with 777,630 of them pending for over a decade. The lower judiciary, comprising of district and subordinate courts, had 26,488,405 cases pending by the same date, with 2,043,737 of them having been pending for over a decade.
Add to this the agonising wait for hearings in ‘unlisted’ cases – the ones which do not have a fixed date for the next hearing. As of August 18, 2016, the number of unlisted cases stood at a whopping 33,57,575 cases, as per National Judicial Data Grid, the Indian Supreme Court’s own portal to disseminate information regarding case disposal and pendency.
In sum, as so many cases await even a hearing date, the judiciary does not think twice before taking up such silly cases!
The disease, unfortunately, is not a new one. Indian courts have seen numerous such cases, the most recent ones include sedition cases against popular south Indian actor-politician Ramya for saying that Pakistan is a nice country and not hell. The list also includes a variety of similar sedition cases against a lot of people, based on the flimsiest of grounds: against Rahul Gandhi, for instance, for supporting Jawaharlal Nehru University (JNU) students who were accused of sedition and thus being seditious himself “by association”.
Despite the fact that only the state can charge people with sedition, private individuals lodged most of these cases. Why should judges let such pesky facts come in the way of justice, though?
Similarly, Tamil actress Khushboo was slapped with 22 criminal cases in various courts of Tamil Nadu and even in one distant Indore, Madhya Pradesh, for speaking about premarital sex and advising adolescents to be safe and use precautions. The Supreme Court eventually scrapped all of them in 2010, but not before causing a lot of distress to the actor.
In its historic judgement, the court also reminded Indian judges that the judiciary’s paramount duty is to ensure that no innocent person is subjected to prosecution and humiliation on the basis of false and wholly untenable complaints.
Six years have passed since that judgment and it does not look like judges have learnt any lessons. On the contrary, the disease seems to have spread. Earlier the problem was limited to the lower levels of the judiciary, with super-enthusiastic judges trying to solve perceived historical wrongs and give justice to mythical figures like Mother Sita, but now it has crept upwards.
A Bihar court has, in fact, accepted a petition against Lord Ram for mistreating Sita by banishing her to live in exile in a forest with no suitable justification for doing so!
The Supreme Court, for its part, has initiated no action against either the persons who lodge such cases to harass and humiliate their targets or the erring judges who accept them. The fate of such cases often follows the same trajectory: case gets filed, persons accused get summoned, petitioners enjoy their 5 minutes of fame and the accused suffer through their harassment. Then the cases are disposed of without the court even issuing a reprimand to the frivolous petitioners!
In this context, the case against Pokemon Go does not seem all that surprising. One can bet that the same thing will happen in this case too and only after the Indian judicial system has been rightly mocked in the international arena.
One hopes CJI T.S. Thakur has taken note, for, the crisis of the credibility in the Indian judiciary has just become a tad bit graver.

दुनिया हार से सीखती है, इस जीत से सीखेगा जेएनयू। जय भीम, लाल सलाम।


10 सितंबर 2016 को सूरज ढलते न ढलते लाल है लाल, जेएनयू लाल है के नारों से गूँज उठे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के लिए उस शाम में कुछ भी नया नहीं था। न वाम खेमे की जीत, न परिषद की शर्मनाक हार। न सांप्रदायिकता को देश का सहजबोध बनाने की मुश्तरका कोशिशों के ख़िलाफ़ जेएनयू का संघर्ष, न जीत। लगातार नए निज़ाम के निशाने पर रहे विश्वविद्यालय को देश का ‘दुश्मन’ बना देने की साज़िशों के बावजूद जेएनयू को जिए हुए हम जैसे तमाम लोगों को इस शाम होने वाला फ़ैसला भी पता था, और उस पर होने वाली दोतरफ़ा प्रतिक्रियाएँ भी। मूर्तियों के खंडित होते रहने के दौर में विरोध का एक प्रतिदर्श बचाए रखने की ज़िद वालों का जीत का उन्माद भी और बहुलवादी भारत में राष्ट्रवाद का हेंगा चला उसे हिन्दूवादी बना देने के सपने देखने वालों से सीने में फिर से उतर गए हार के नश्तर का दर्द भी।

यहाँ एक मिनट के लिए चुनावी जीत की बात परे रख सोचते हैं कि सवा अरब के देश में सत्ता पर क़ाबिज़ लोगों की आँखों में बस 8000 विद्यार्थियों वाला जेएनयू इतना क्यों चुभता है। जवाब है, अवाम के हक़ और इंसाफ़ के लिए किसी भी ताक़त से लड़ जाने की अपनी रवायत और विरासत की वजह से। आख़िर को ये जेएनयू आपातकाल से लेकर देश बेचू नयी आर्थिक नीतियों तक से लगातार जूझने वाला जेएनयू है, उच्च शिक्षा में आरक्षण लागू होने के दशकों पहले से प्रगतिशील प्रवेश नीति लागू कर दूरदराज़ से आए छात्रों को और सभी छात्राओं को अतिरिक्त अंक देने वाला जेएनयू है, छात्रसंघ के नेतृत्व में संघर्ष कर जेंडर सेंसिटाइजेशन कमेटी अगेंस्ट सेक्सुअल हैरेसमेंट बनवाने वाला जेएनयू है।अकारण ही नहीं है कि देश के सुदूर इलाक़ों में जनता के बीच काम कर रहे जितने सामाजिक कार्यकर्ता जेएनयू ने दिए उतने उससे हज़ार गुना संख्या वाले संस्थान भी शायद नहीं दे सके हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो विकल्पहीनता के तर्क का सिर्फ़ नकार ही नहीं, एक जीता जागता उदाहरण देता है जेएनयू और यह सत्ता को डराने के लिए बहुत है।

ऐसे परिसर में फ़रवरी के बाद, दरअसल मोदी सरकार के आने के बाद से ही अनवरत हमलों के बाद प्रतिरोध को ही मज़बूत होना था। इसीलिए हम जैसे ‘जेएनयू वाले’ दुनिया में जहाँ भी बैठे हों- दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के इस चुनाव में जीत जाने की सम्भावना की बात सुनते थे, मीडिया में ऐसी ख़बरें देखते थे तो बस हँस पड़ते थे। कहाँ तो बिहार जैसा पिछड़ा कहा जाने वाला प्रदेश भी जुमलों और मीडिया मैनजमेंट को नकार प्रतिरोध की राजनीति के साथ खड़ा था और कहाँ जेएनयू के हार जाने के शगूफ़े! वह भी तब जब परिसर के ग़ुस्से के मद्देनज़र इस चुनाव में परिषद की अध्यक्ष पद की दावेदार को भी कहना पड़ा था कि उनका भारतीय जनता पार्टी से कोई रिश्ता नहीं है और वह उनकी बेवक़ूफ़ियों पर जवाब नहीं देंगी! सो फिर से वही, अंतिम फ़ैसला तो यही होना था। वाम-जनवादी जीत और राष्ट्रवाद के हिन्दुवादी और हिंसक प्रतिदर्श की हार।

पर फिर इस चुनाव में सबकुछ पुराना भी नहीं था। वाम खेमे में डर न सही, चिंता बहुत साफ़ थी। एक तरफ़ कुछ लिंगदोह मॉडल लागू होने के असर और कुछ विभाजित वाम के चलते पिछले चुनावों में दशकों बाद परिषद की सेंट्रल पैनल में जीत थी तो दूसरी तरफ़ मीडिया ट्रायल के बाद आए हज़ारों नए छात्रों के साथ पूरा समय भी कहाँ मिला था। पर इन सबसे ऊपर बहुजनवादी राजनीति के साथ बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स असोसीएशन (बापसा) का उदय, जो अब तक के सारे वाम समीकरणों को बिगाड़ सकता था।

अस्मिता या किसी मुद्दे पर आधारित संगठनों का जेएनयू में आना आम बात रही है। 2006 में यूथ फ़ॉर इक्वालिटी(वाईएफ़ई) उसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इक्वालिटी का मज़ाक़ उड़ा अपना नाम रखने वाले उस संगठन ने भी वामपंथी खेमे के चेहरे पर चिंता की लकीरें पैदा की थीं पर फिर उनमें और बापसा में एक बुनियादी फ़र्क़ था- ज़मीन का फ़र्क़। वाईएफ़ई जेएनयू के प्रगतिशील सहजबोध के ख़िलाफ़ खड़ी थी और बापसा उस के साथ। बापसा वामपंथ की अपनी ज़मीन पर खड़ी है- बराबरी और सामाजिक न्याय, हाशिए पर पड़े लोगों के हक़ और हकूक की ज़मीन।

अफ़सोस, इसी ज़मीन पर वामपंथी खेमे की ग़लतियों की तमाम इबारतें भी दर्ज हैं। पहली अपनी सक्रियता को राजनैतिक सांस्कृतिक सवालों से परे कर आर्थिक मुद्दे पर ट्रेड यूनियनिज़्म में समेट देना। दूसरी उससे भी बड़ी- सांप्रदायिक फ़ासीवाद के बेहद बड़े ख़तरे से लड़ने के दबाव में उसने सड़क पर सामाजिक न्याय की लड़ाई की ज़मीन ही नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व का हिस्सा भी लगभग छोड़ ही रखा था।

दलित-बहुजन साथियों ही नहीं, हम सबको सभी बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में दलित बहुजन समुदायों की लगभग अनुपस्थिति बेहद साफ़ दिखती है। मंडल के बाद की भारतीय राजनीति में बहुजन और दलित अस्मिता के उभार के बावजूद ऐसी छवि आत्महत्या का प्रयास करने जैसी ही थी और वही हुआ भी। एक तरफ़ बहुजन अस्मिता की लड़ाई के नाम पर मुलायम सिंह यादव, लालू यादव से लेकर दलित अस्मिता के साथ बहन मायावती जैसे नेताओं का उभार और दूसरी तरफ़ हिंदी पट्टी में वामपंथी धमक वाले इलाक़ों का सिमटता जाना। याद करिए कि बिहार में बेगूसराय से लेकर उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर-मऊ जैसे इलाक़े कभी लेनिनग्राद काहे जाते रहे हैं, कम्युनिस्ट सांसद विधायक चुनते रहे हैं।

यह कहने का मतलब बिलकुल नहीं है कि सांप्रदायिकता से लड़ाई कोई छोटी या बाद की लड़ाई थी। पर फिर-सामाजिक न्याय की लड़ाई भी उतनी ही ज़रूरी थी। लालू यादव ने यह बात पहचानी और मुस्लिम-यादव गठजोड़ बना दोनों लड़ाइयों को साथ लड़ सकने, या कमसेकम ऐसा भ्रम बनाए रखने का, उदाहरण दिया। वामपंथ ऐसा नहीं कर सका और अप्रासंगिक होता गया।  

अपनी जमीन पर ऐसे संकट के साथ फिर इन चुनावों के ठीक पहले परिसर में हाल के दौर में सबसे मज़बूत वामपंथी संगठन आइसा के एक राष्ट्रीय नेता और जेएनयू के ही छात्र पर बलात्कार का आरोप लग जाना वामपंथी खेमे के लिए एक और झटका था। उम्मीद के मुताबिक़ आइसा के आरोपी पर तुरंत कार्यवाही करने के बावजूद परिषद से लेकर मीडिया तक इस घटना को ले उड़े थे और इसे एक व्यक्ति का अपराध (या एक संगठन का ही) बल्कि जेएनयू का मूल चरित्र साबित करने में जुट गए थे।

फिर इसके बाद वह हुआ जो अकल्पनीय था। ऐसे हमले के बीच वाम एकता के नाम पर वह आइसा और एसएफ़आई साथ आ गए जो वामपंथी ज़मीन पर सिर्फ़ अपनी दावेदारी के लिए अब तक एक दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन रहे थे। जेएनयू को जानने वालों के लिए यह ख़ुशी की बात होने के बावजूद एक झटका देने वाली ख़बर भी थी। आख़िर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के छात्रसंगठन एसएफ़आई और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबेरेशन के बीच ‘असली’ वामपंथी होने की लड़ाई कोई नयी लड़ायी नहीं है। सिंगूर नंदीग्राम के दिनों में वामपंथियों ने इस झगड़े का चरम देखा है जब आइसा/लिबरेशन के कार्यकर्ता सीपीएम/एसएफ़आई के कार्यकर्ताओं को देखते ही संशोधनवादी ही नहीं बल्कि तापसी मलिक का हत्यारा तक कहते रहे हैं। बेशक उसके बाद ज़मीनी सच्चाइयों के मद्देनज़र बिहार चुनावों में दोनों को साथ आना पड़ा हो, जेएनयू में वे अलग और लगभग दुश्मन ही रहे हैं।

ऐसे हालात में ‘वाम एकता’ के दावे के बावजूद एआईएसएफ़ और डीएसएफ़ जैसे दो वामपंथी संगठनों को छोड़ कर ही सही उनका साथ आना इस चुनाव के परिणाम को तय करना ही था। ख़ैर, इससे नाराज़ डीएसएफ़ ने संयुक्त सचिव पद पर चुनाव लड़ा और तमाम दुष्प्रचार के बावजूद दूसरे स्थान पर रहा। यह वाम खेमे के लिए दूसरी सबसे बेहतर ख़बर और इस बात का सबूत मानी जा सकती है कि जेएनयू में अब भी मुख्य बहस वाम-जनवादी-सामाजिक न्याय खेमे के भीतर ही है।

पर फिर बापसा का अध्यक्ष पद पर दूसरे स्थान पर रहने के साथ बाक़ी पदों पर भी शानदार प्रदर्शन वाम खेमे के लिए एक चेतावनी भी है और कोर्स करेक्शन का मौक़ा भी। यह चुनाव संगठनों की जीत हार से ज़्यादा दक्षिणपंथी खेमे के हमलों के बीच जेएनयू को ज़िंदा रखने के सवाल पर लड़ा गया था सो अब तक संघर्षों के हिरावल रहे वामपंथ की जीत लगभग तय ही थी। पर फिर बापसा के उभार ने उसके भीतर की दिक़्क़तों को सामने लाकर रख दिया है। अब अगर उन्होंने सामाजिक न्याय, अस्मिता और उनसे जुड़े प्रतिनिधित्व के सवालों पर रूख साफ़ और बेहतर न किया तो यह ठीक वैसे अंत की शुरुआत भी हो सकती है जो उन्होंने दलित-बहुजनवादी राजनीति के उभार के साथ हिंदी पट्टी में झेला है।

आइसा-एसएफ़आई के असहज सही स्वागतयोग्य गठबंधन के लिए इन सवालों से जूझना शायद आसान नहीं साबित होने वाला। अपनी ख़ुद की प्रतिद्वंदिता का भूत छोड़ें ही, अस्मिताओं और उनमें भी जाति का सवाल उनके मातृसंगठनों के लिए भी आसान सवाल नहीं रहा है। ऐसा सवाल जिसके जवाब अस्मिताओं को छद्म चेतना कह क्रांति के बाद का कार्यभार बताने से लेकर पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे के बड़े नेता और पूर्व मंत्री सुभाष चक्रवर्ती के ख़ुद को पहले हिन्दू, फिर ब्राम्हण फिर कम्युनिस्ट बताने तक में घूमते रहे हैं।

पर फिर बापसा के उभार ने साफ़ कर दिया है कि अब वाम खेमे के पास न इस सवाल को मुल्तवी करने की सहूलियत बाक़ी बची है न ही प्रतिनिधित्व से इंकार की। भारत में जातीय गोलबंदियों के सहारे सामंतवाद से लड़ाई की राजनीति शुरू करने वाले डॉक्टर लोहिया की बात याद करें तो ज़िंदा क़ौमें पाँच साल भी इंतज़ार नहीं करतीं यहाँ तो क्रांति तक की गुज़ारिश है। दूसरे बापसा ने वाम से हम नहीं तो परिषद आ जाएगा वाला ब्रमहास्त्र भी छीन लिया है।


संदेश साफ़ है- जीत मुबारक पर सामाजिक न्याय पर कोर्स करेक्शन अनिवार्य है साथियों। वैसे भी बापसा वाम का दुश्मन नहीं स्वाभाविक सहयोगी है। हमने संदेश सुन लिया तो बचा रहेगा, बना रहेगा जेएनयू। नहीं, तो इबारत साफ़ है।